Sat. Oct 19th, 2019

स्त्री विमर्श के क्षेत्र में महिला लेखिकाएँ : मौसमी सिंह

हिमालिनी, अंक मार्च 2019 | स्त्री विमर्शः एक नारीवादी सिद्धान्त है । जिसके द्वारा स्त्री की समाजिक स्थिति, पारिवारिक स्थिति आर्थिक स्थिति, राजनैतिक स्थिति और उनकी सहभागिता, उनका अस्तित्व तथा सशक्तिकरण इत्यादि को दर्शाया जाता है । सन् १८४७ में पश्चिमी देशों से आयतित एक विचार के रूप में प्रवाहित स्त्री विमर्श स्त्री के स्वतंत्रता और उनके अधिकारों को सुनिश्चित करने का एक मार्ग है । स्त्री सशक्तिकरण के जो भी प्रश्न समाज में प्रकट हो रहे है, साहित्य उनसे निरपेक्ष नहीं रह सकता । हर काल में स्त्रियों के बलिदान के प्रश्न बदलते रहते है । आज स्त्रियाँ लिंगभेद, महिलाओं पर हिंसा को रोकना निजी कानूनों से संशोधन महिला, स्वास्थ्य तथा आर्थिक दशा आदि मुद्धों से जुझ रही हैं । स्त्रियों को समाज की अग्रगामी धारा में जोड़ने के लिए महिला अांदोलन द्वारा उठाए गए मुद्दे प्रमुखता से उभरे हैं ।
लेखन के क्षेत्र में स्त्रियों का आगमन बाद में हुआ है, पर उनकी सृजनशीलता अत्यंत प्राचीन है । जब वे साक्षर नहीं थी, तब मौखिक रूप से उनकी रचनाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी चलती थी । लोकगीत के रूप में पुरूष जब भी स्त्री यातना पर लिखता है हमदर्द बनकर स्त्री को सब्जेक्ट बनाकर उसकी पीड़ा का अनुमान करता है । परन्तु जब स्त्री रचनाकार कलम चलाती है तब अपना दर्द बखान करने के लिए तो उसे दूरगामी परिणाम भोगने पड़ते है । शायद मूल्यांकन के नजरिया का हीं दोष हो । स्त्री लेखने पर यह आरोप लगाया जाता है कि यह सीमित यथार्थ को लेकर चलता है । चार दीवारियों के बीच की घुटन या कुंठा की संज्ञा देते हैं । परन्तु यह भी सच है कि जितना घटनाओं का सटीक वर्णन और रोजमर्रा की जिन्दगी का वर्णन महिला लेखिकाओं की लेखनी में होती है उतना पुरूष के लेखन में नहीं हो सकता ।
महिला लेखिकाओं में सबसे पहला नाम महादेवी वर्मा का आता है । उनकी लेखनी के साथ हीं स्त्री जीवन और समस्याओं से जुड़ी बातें स्त्री पुरूष की संबंध की बातें स्त्री अस्तित्व और अस्मिता की तलाश शुरू हुई हैं । महादेवी वर्मा की रचना श्रृंखला की ‘कडि़या’ नामक निबन्ध संग्रह है । इन निबन्धों में व्यक्त विचार वर्तमान स्त्री लेखने को एक रचनात्मक उर्जा प्रदान करती हैं ।
प्रेमचन्दोत्तर युग में बड़ी संख्या में महिला लेखिकाओं की रचना मिलती है । जिनमें कृष्णा सोबती मन्नु भण्डारी, पदमा सचदेवा, मृदुला गर्ग उषा प्रियंबदा, मृणाल पांडे, चित्रा मुग्दल मैत्रयी पुष्पा, नासिरा शर्मा, प्रभा खेतान, गीतांजली, श्री मनीषा, जयंती आदि महिला मुद्दों पर कलम चलाती है । इनके अलावा और भी महिला लेखिकाएँ है । मृणाल पाँडे, मृदुला गर्ग कात्यायनी अनामिका आदि की स्त्री विषयक पुस्तके काफी चर्चित हैं । स्त्री विषय पर पुरूष लेखक की अपेक्षा महिला लेखिकाओं की रचना कम है किन्तु वे स्त्री लेखक के क्षेत्र में अमूूल्य निधि समझी जाती हैं ।
ममता कालिया का उपन्यास ‘बेघर’ १९७१ में प्रकाशित हुआ था । इस उपन्यास में लेखिका ने स्त्री की स्थिति को भलिभांति उभारा है । एक स्त्री की वास्तविकता तथा पुरूष की मानसिक स्थिति को भलिभांति उजागर किया है लेखिका ने । एक ऐसा मनोविज्ञान पुरूष का सामने उभर कर आया है जो पुरूष के जन्मजात स्वभाव को दर्शाता है । इस उपन्यास के नायक परमजीत की प्रेमिका संजीवनी जब उसके सामने आत्मसमर्पण करती है और उसे पता चलता है कि वह उसके जीवन का पहला पुरूष नहीं है तो वह पूरे जीवन इसी भय से अव्रmांत रहता है कि कहीं वह पत्नी व प्रेमिका पहले भी तो किसी से……” इस बात से यह साबित होता है कि पुरूष और स्त्री दोनों के दृष्टिकोण अलग है समाज में । पुरूष दोहरी मानसिकता से घिरा है । विवाह पूर्व देह संबंधों के बारे में अनेक शोध अनुभव से पता पता चलता है कि पुरूष कुँवारी लड़कियों से विवाह करना ही बेहतर समझते है । पर खुद को कुवाँरा होना उतना महत्व नहीं रखता है । इस मामले में स्त्री के पसंद व नापसंद कुछ खास महत्व नहीं रखता है । यानि जो जैसा पुरूष उसके जीवन में आता है उसके साथ समझौता करना पड़ता है । औरत के जीवन में मर्द पहला पुरूष का दर्जा पाने की मानसिकता से ग्रसित बातों को दर्शाना मुख्य उदेश्य है ।
कृष्णा सोबती का उपन्यास ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ उपन्यास में कम उम्र की बालिका पर बलात्कार की त्रासदी है । यह उपन्यास सन् १९७२ में प्रकाशित हुआ था । यह उपन्यास सिर्पm हिन्दी में हीं नहीं अन्य भारतीय भाषाओं में भी शायद पहला और इकलौता सशक्त उपन्यास है । नाबालिग के साथ ऐसा जघन्य अपराध से सिर्पm परिवार वाले हीं नहीं समाज भी त्रसित रहता है । मानवता को शर्मसार करता यह अपराध उस समय से अधिक अभी चिंता का विषय है । स्त्री का कुँवारापन हीं वह हथियार है जिससे उसे पूरे जीवन लहुलुहान किया जा सकता है । आदर्शों की भव्यता से हटकर सूरजमुखी अंधेरे के यथार्थ और सत्य के निरूपण की वह असधारण सत्य–कथा है जिसका सत्य कभी मरता नहीं ।
महिला लेखिकाओं में मन्नु भण्डारी तथा उषा प्रियंवदा की रचनाओं में स्त्री विमर्श की प्रचुरता पाई जाती है । स्त्री की कुंठा छटपटाहट बेचैनी के साथ समलिङ्गी होने के नाते उनकी समस्याओं को उभारने में सफल रही है ।
उषा प्रियंवदा के उपन्यास ‘पचपन्न खंभे लाल दीवारें’ में एक स्त्री की कथा छटपटाहट और बेचैनी की त्रासदी है । वह स्त्री पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते – निभाते कुँवारी रह जाती है तथा अपना घर नहीं बसा पाती है । पुरूषों द्वारा बिलकुल भी शोषित नहीं है वह, वह तो खुद अपनी हीं पारिवारिक जिम्मेदारीयों के बोझ तले दब कर रह जाती है । इस उपन्यास में एक मध्यमवर्गीय सुशिक्षित, आत्मनिर्भर स्त्री भी अपने बारे में स्वतंत्र निर्णय नहीं ले पाती हैं, पारिवारिक दबाब के कारण । आखिर इसके पीछे कारण क्या है ? लेखिका क्या संदेश देना चाहती है ? एक सबल महिला को स्वतंत्र निर्णय लेने की भी छूट नहीं है ? इसके लिए जिम्मेदार कौन है ? परिवार, समाज या स्त्री खुद, जैसी समस्याओं पर आधारित इनके उपन्यास हैं । एक स्त्री होने के नाते स्त्री मन की व्यथा को भलिभांति अपने उपन्यासों में दर्शाने में सफल रही है, उषा प्रियंवदा । शेष यात्रा और रूकोगी नहीं राधिका इत्यादि उपन्यास आपके द्वारा लिखित है ।
इनकी समकालीन लेखिका मन्नु भण्डारी का अपना एक अलग हीं अंदाज है, लेखन के क्षेत्र में ‘आप का बंटी’ की स्त्री पात्रा निर्णय लेने में स्वतंत्र हैं । उनके उपर किसी भी प्रकार के बन्धन हावी नहीं होते उन तमाम समस्याओं से जुझते हुई वह अपने बारे में स्वतन्त्र निर्णय लेने में सफल होती है । पारिवारिक विघटन के लिए अकेली स्त्री हीं सिर्पm जिम्मेवार नहीं होती है पुरूष भी उतना हीं दोषी होता है जितनी की स्त्री ‘एक इंच मुस्कान’ इत्यादि उपन्यास आपकी रचना है । मृदुला गर्ग का ‘उसके हिस्से की धूप’, ‘ वंशज चितकोबरा’, ‘कठगुलाब’, ‘मै और मै’ इत्यादि प्रसिद्ध रचना है ।
१९७५ में प्रकाशित ‘उसके हिस्से की धूप’ में लेखिका ने स्त्री स्वतंत्रता की बात लिखी है । उन्होंने अपना पहला उपन्यास में हीं लीक से हटकर बहुत कुछ लिखा है । उन दिनों विवाहित और संबंधों में अपराधबोध होना जरूरी माना जाता था । इस उपन्यास की नायिका अपने पति को छोड़कर प्रेमी के पास चली जाती है । अपने पति से तलाक लेकर शादी कर लेती है । अंत में उसे एहसास होता है कि जिस चीज की प्राप्ति के लिए वह अपने पति को छोड़कर प्रेमी के पास गई थी, उस चीज से भी उसे ऊब होने लगती है । अपनी खुशियों की तलाशकर एक के पीछे भागने में बुद्धिमता नहीं है और उसे यह भी एहसास होता है कि वह गलत थी । बदलाव अपने आप में लाती है । नासिरा शर्मा की रचनाओं में स्त्री विमर्श संबंधी रचनाओं की प्रचुरता पाई जाती है । कहानी उपन्यास, नाटक और अनूदित रचनाओं की प्रति भावना लेखिका की एक अलग हीं पहचान है । आधुनिक हिन्दी कथा–साहित्य की बहु चर्चित लेखिका चित्रा मुग्दल की पहली कहानी स्त्री–पुरूष के संबंधों पर छपी थी । उनके अब तक तेरह कहानी संग्रह और तीन उपन्यास है ।
समकालीन कहानी में स्त्री जीवन के जितने विविध पक्ष उजागर हुए हैं उनमें स्त्री का संघर्ष और विद्रोह, नाराजगी और तिक्तता, प्रेम, घृणा और पश्चाताप के भाव का रंग अधिक गहरा होता हुआ दिखाई देता है । पहले स्त्री–पुरुष के परस्पर सम्बन्धों का आधार ‘विवाह’ होता था किन्तु ‘विवाह’ संस्था की जटिलताएँ कहें या सम्बन्धों की स्वच्छंदता का हवाला दिया जाए अथवा स्त्री–पुरुष के मध्य बदलते प्रेम सम्बन्धों का सवाल हो, रिश्ते अब उतने सहज, ईमानदारी से भरे और एकनिष्ठता की ओर बढते हुए प्रतीत नहीं होते हैं । मानवीय व्यवहार की माँग कर रही स्त्री के साथ यह एक असामाजिक तौर पर किया गया धोखा और छल ही है कि जब प्रेम और विवाह के सम्बन्ध बनते हैं तब उसके भागीदार स्त्री–पुरुष दोनों ही होते हैं, किन्तु जब प्रेम असफल होता है, वैवाहिक बंधन टूटता है या विवाहेतर सम्बन्ध बनते हैं तब कठघरे में ‘स्त्री’ को ही खडा किया जाता है । इतना होने पर भी ‘प्रेम’ पर केन्द्रित जितनी अधिक संख्या में कहानियाँ लिखी गयी हैं उनसे यह तो सिद्ध होता है कि स्त्री और पुरुष के जीवन में ‘प्रेम’ का निषेध नहीं है किन्तु जो दैहिक भूख, शारीरिक थकान, संत्रास और पीडा का बोध है वह प्रेम के बदलते हुए स्वरूप के कारण ही है ।
महिला लेखन अर्थात महिलाओं की समस्याओं को आधार बनाकर महिलाओं द्वारा रचित साहित्य समकालीन हिन्दी साहित्य में महिला लेखन पृथक एवं अपने आप में एक अलग महत्व रखता है । महिला लेखन रोचक होने के साथ—साथ लोकप्रिय भी है । स्त्री की प्रति पुरूष अधिपत्य हमेशा से नकारता आया है । साहित्य के क्षेत्र में भी यह बात अपवाद नहीं रहीं । लेखिकाओं के योगदान को दूसरी कोटि का सिद्ध करना उनके साहित्य को द्वितीय श्रेणी का उदघोषित करने का प्रयास हिन्दी लेखन के क्षेत्र में भी जारी है । लेकिन स्वातंत्र्योतर कालीन लेखिकाओं की प्रतिभा ने यह सिद्ध किया है कि वे कई दृष्टियों से पुरूष से आगे है । गद्य लेखन के क्षेत्र में भी लेखिकाओं का योगदान महत्वपूर्ण रहा है । हिन्दी उपन्यास की आत्मवत्ता को नया मोड देने में और गहरी अंर्तदृष्टि से उसे चेतनायुक्त बताने में जो प्रयास महिला लेखिकाओं के द्वारा हुआ है, वह सराहनीय है ।

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