अग्नि परीक्षा नारी ही क्यों देती है ?
जलता हुआ फूल

हीरे मोती कीमत चुका कर
ससुराल जब आती है,
सबकी सेवा करती है
फिर भी ताने सहती है ।
सुबह उठ कर,
पैर पिया के दबाती है
नयनो से नयन मिलाती है
चूड़ी छुन छुन कंगना खन खन
खींचा–तानी करती है,
मटक मटक कर चलती
देख मुझे मुस्काती है
पैर के पायल छन् छन् बाजे
आंगन घर गुँजाती है
डाल पर बैठी कोयल कुहके
वो,पनघट दौड़ी जाती है
लौटते ही, आंगन लीप–पोत कर
तुलसी पूजन करती है
चुल्हा,चौका सब वो करती
बिलकुल नहीं वो थकती है
अन्नपूर्णा बन कर सबका
पेट वो भरती है ।
सबकी पहले भूख मिटाती
फिर वो खुद खाती है ।
नौ महीने कोंख में अपने
बच्चे को वो रखती है
पालन–पोषण करते करते
लाखो दर्द सह लेती है
फिर, चीर हरण और अग्नि परीक्षा
नारी ही, क्यों देती है ?
नारी ही है, जन्मदात्री
पर, दर–दर ठोकर खाती हैं
आँचल उठाकर दिनकर से
जब करुणा करके गाती है
मेरी लाज रखो….हे मातृभूमि !
दया करो सब पर हे दिनकर
इन सबके बाद भी
नारी ही, ’राख’ क्यों होती है ?
नारी से न जाने कब वो
जलता हुआ फूल बन जाती है ।




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