Mon. Dec 16th, 2019

‘सुंदर है विहग सुमन सुंदर, मानव तुम सबसे सुन्दरतम’ : सुमित्रानंदन पंत:

20 मई जन्मदिन विशेष
 डा‍ श्वेता दीप्ति
‘वियोगी होगा पहला कवि,
आह से उपजा होगा गान।
निकलकर आंखों से चुपचाप,
बही होगी कविता अनजान..।’

20वीं सदी के प्रारम्भ में भाषा, भाव, शैली, छंद और अलंकार के बंधनों को तोड़ कर कविताएँ लिखने वाली एक शैली का जन्म हुआ, जिसका पुरानी कविता से कोई मेल न था, इसे नाम दिया गया छायावाद। हिंदी साहित्य के इसी छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक थे सुमित्रा नंदन पंत। इस युग को जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और रामकुमार वर्मा जैसे कवियों का युग कहा जाता है। पंत झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भंवरा गुंजन, उषा किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब तो सहज रूप से काव्य का उपादान बने. उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था, गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति, लंबे घुंघराले बाल, उंची नाजुक कवि का प्रतीक समा शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था.

सुमित्रानंदन पंत का जन्म अल्मोड़ा के कैसोनी गांव (अब उत्तराखंड में) में 20 मई 1900 को हुआ था। पंत के जन्‍म के बाद ही उनकी मां का देहांत हो गया था। दादी के लाड़ प्यार में पले पंत ने अपने लिए नाम का चयन भी खुद ही किया। जी हां, पंत का वास्तविक नाम गुसाई दत्त था, जिसे उन्‍होंने बदल कर सुमित्रानंदन पंत रखा।

पंत को हिंदी साहित्य का ‘विलियम वर्ड्सवर्थ’ कहा जाता था। उन्हें ऐसे साहित्यकारों में गिना जाता है, जिनका प्रकृति चित्रण समकालीन कवियों में सबसे बेहतरीन था। उनके बारे में साहित्यकार राजेन्द्र यादव कहते हैं, “पंत अंग्रेज़ी के रूमानी कवियों जैसी वेशभूषा में रहकर प्रकृति केन्द्रित साहित्य लिखते थे।”

उनकी रचनाओं के अलावा एक और वाकया मशहूर है पंत के बारे में, कि हिंदी सिनेमा जगत के महानायक अभिनेता अमिताभ बच्चन का नामकरण पंत ने ही किया था। पंत और हरिवंश राय बच्‍चन अच्‍छे मित्र थे। जब हरिवंश जी के यहाँ बेटे का जन्म हुआ तो उन्होंने तय किया कि उसका नाम ‘इंकलाब’ रखेंगे। पर पंत को उनके बेटे के लिए ‘अमिताभ’ नाम ज्यादा भाया और हरिवंश ने भी अपने दोस्त की बात रख ली।

पंत का पहला काव्य-संग्रह ‘पल्लव’ साल 1926 में प्रकाशित हुआ। संस्कृतनिष्ठ हिंदी में लिखने वाले पंत की 28 रचनाओं में कविताएँ, नाटक और लेख शामिल हैं। जिनमें से ‘खादी के फूल’ उनका और हरिवंश राय बच्चन का संयुक्त काव्य-संग्रह है। कवि के रूप में तो उनकी ख्याति विश्वभर में फैली; लेकिन पंत ने गद्य साहित्य में भी अपना योगदान दिया था। उनके द्वारा लिखे गये कई निबन्ध, आलोचना और समीक्षा आदि प्रकाशित हुए।

हिंदी साहित्य सेवा के लिए उन्हें पद्मभूषण(1961), ज्ञानपीठ(1968), साहित्य अकादमी, तथा सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार जैसे उच्च श्रेणी के सम्मानों से अलंकृत किया गया। साल 1977 में 28 दिसंबर को पंत ने दुनिया से विदा ली ।

अमर स्पर्श
‘युगपथ’ से
खिल उठा हृदय,
पा स्पर्श तुम्हारा अमृत अभय!

खुल गए साधना के बंधन,
संगीत बना, उर का रोदन,
अब प्रीति द्रवित प्राणों का पण,
सीमाएँ अमिट हुईं सब लय।

क्यों रहे न जीवन में सुख दुख
क्यों जन्म मृत्यु से चित्त विमुख?
तुम रहो दृगों के जो सम्मुख
प्रिय हो मुझको भ्रम भय संशय!

तन में आएँ शैशव यौवन
मन में हों विरह मिलन के व्रण,
युग स्थितियों से प्रेरित जीवन
उर रहे प्रीति में चिर तन्मय!

जो नित्य अनित्य जगत का क्रम
वह रहे, न कुछ बदले, हो कम,
हो प्रगति ह्रास का भी विभ्रम,
जग से परिचय, तुमसे परिणय!

तुम सुंदर से बन अति सुंदर
आओ अंतर में अंतरतर,
तुम विजयी जो, प्रिय हो मुझ पर
वरदान, पराजय हो निश्चय!

– सुमित्रानंदन पंत

सुख-दुख

सुख-दुख के मधुर मिलन से
यह जीवन हो परिपूरन;
फिर घन में ओझल हो शशि,
फिर शशि से ओझल हो घन !

मैं नहीं चाहता चिर-सुख,
मैं नहीं चाहता चिर-दुख,
सुख दुख की खेल मिचौनी
खोले जीवन अपना मुख !

जग पीड़ित है अति-दुख से
जग पीड़ित रे अति-सुख से,
मानव-जग में बँट जाएँ
दुख सुख से औ’ सुख दुख से !

अविरत दुख है उत्पीड़न,
अविरत सुख भी उत्पीड़न;
दुख-सुख की निशा-दिवा में,
सोता-जगता जग-जीवन !

यह साँझ-उषा का आँगन,
आलिंगन विरह-मिलन का;
चिर हास-अश्रुमय आनन
रे इस मानव-जीवन का !

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