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बाबा नागार्जुन भारतीय मिट्टी के आधुनिक कवि

 

जन्मदिन विशेष

डा‍ श्वेता दीप्ति

हिन्दी के आधुनिक कबीर नागार्जुन की कविता के बारे में डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है, ‘जहां मौत नहीं है, बुढ़ापा नहीं है, जनता के असंतोष और राज्यसभाई जीवन का संतुलन नहीं है, वह कविता है नागार्जुन की. ढाई पसली के घुमंतू जीव, दमे के मरीज, गृहस्थी का भार- फिर भी क्या ताकत है नागार्जुन की कविताओं में! और कवियों में जहां छायावादी कल्पनाशीलता प्रबल हुई है, नागार्जुन की छायावादी काव्य-शैली कभी की खत्म हो चुकी है. अन्य कवियों में रहस्यवाद और यथार्थवाद को लेकर द्वन्द्व हुआ है, नागार्जुन का व्यंग्य और पैना हुआ है. क्रांतिकारी आस्था और दृढ़ हुई है, उनके यथार्थ चित्रण में अधिक विविधता और प्रौढ़ता आई है.’

बाबा नागार्जुन का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था लेकिन वे अपनी मातृभाषा मैथिली में ‘यात्री’ नाम से लिखा करते थे. यह उनका खुद का चुना हुआ उपनाम था. इसकी भी एक कहानी है. बचपन में अपने पिता के साथ यजमानी के लिए घूमने-फिरने वाले नागार्जुन ने एक बार मूल रूप से पाली में लिखी गई राहुल सांकृत्यायन की किताब ‘संयुक्त निकाय’ का अनुवाद पढ़ा था. इसे पढ़कर उनके मन में जिज्ञासा जागी कि इसे मूल भाषा में पढ़ना चाहिए. इसी को लक्ष्य बनाकर वे श्रीलंका पहुंच गए और यहां एक बौद्धमठ में रहकर पाली सीखने लगे. बदले में वे बौद्ध भिक्षुओं को संस्कृत पढ़ाते थे. यह उनकी यायावरी प्रवृत्ति का एक अद्भुत उदाहरण है और इसीलिए उन्होंने खुद को ‘यात्री’ नाम दिया था. श्रीलंका में ही वैद्यनाथ मिश्र बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए और उन्हें नया नाम मिला – नागार्जुन. वहीं उनकी रचनाओं से प्रभावित पाठकों ने उन्हें ‘बाबा’ कहना शुरू कर दिया और आखिरकार वे बाबा नागार्जुन हो गए.

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बाबा नागार्जुन के व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन करें तो पाएंगे कि वे एक व्यक्ति या कवि व्यक्तित्व न होकर अपने आप में एक संस्था का प्रतिरूप ही बन गए। संस्था भी ऐसी कि जिसमें साहित्य, समाज की उदात्तकामी भविष्य योजनाएं, यथार्थ को खंगालते हुए, हर स्तर के अन्याय व अत्याचार को रौंदते हुए, अपनी निर्धारित राहों पर चलने को उद्यत है। और वह भी जन-मन को झकझोड़-जागृत कर अपने साथ लेकर चलती हुई। उनकी कविता को भारतीय परम्परा का जीवंत रूप माना जाता है। ऐसा अनायास ही नहीं हुआ अपितु इसके लिए उनका गहन अध्ययन तथ्यों को गहराई से जानने-बूझने में सहायक रहा। कालिदास, विद्यापति की रचनाओं का गहन मनन, बौद्ध और मार्क्सवाद का अध्ययन, विभिन्न भाषाओं का ज्ञान ले उनके साहित्य से परिचित होना, विभिन्न देशी-विदेशी स्थानों पर भ्रमण कर वहां की सांस्कृतिक धरोहर से ज्ञानार्जित करना, अपनी यायावरी प्रवृत्ति के तहत नए-नए स्थानों और लोगों से मेलजोल बढ़ा कर उनके दुःख-सुख को जानना; उनकी इन प्रवृतियों ने उनमे लोक संस्कृति और लोक हृदय की गहरी पहचान करवाई और उनका अपना जीवन-दर्शन “बहुजनोन्मुखी दर्शन” बन गया। बाबा नागार्जुन को मैथिलि, हिन्दी, संस्कृत में अधिकारिक ज्ञान के साथ पाली, प्राकृत, बांग्ला, सिंहली, तिब्बती, अंग्रेजी अनेक भाषाओं का ज्ञान था।

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जन-जन के हृदयों पर अपनी जन-भाषा की सहज-स्वाभाविक कविताओं की गहन छाप अंकित करने वाले ‘बाबा’ के नाम से प्रख्यात जन कवि नागार्जुन हिन्दी साहित्य की वह थाती बन गए है, जिनकी रचनाएँ जन-जीवन के छोटे-बड़े सरोकारों की यथार्थ, स्पष्ट-सपाट व व्यंग्य की तीखी धार से युक्त, तथ्यों-सत्यों को उघाड़ती हुई भी पाठक एवं श्रोताओं का न तो मनोरंजन करने में पीछे रही और न ही शोषण-विद्रूपताओं के प्रति झकझोरने में। ऐसी विलक्षण प्रतिभा से संपन्न बाबा नागार्जुन का जन्म ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा को 30  जून 1911 को बिहार में दरभंगा ज़िले के सतलखा गाँव में अपने नाना के घर हुआ जबकि उनका पुश्तैनी निवास स्थान बिहार में मधुबनी ज़िले के गाँव तौरानी में था। नागार्जुन का मूल नाम वैद्य नाथ मिश्र था। उनकी आरंभिक शिक्षा तौरानी के स्थानीय संस्कृत विद्यालय से प्रारम्भ हुई और फिर उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए वाराणसी और कलकत्ता में अध्ययनरत रहे। घुमक्कड़ी प्रवृत्ति के कारण 1930 से लेकर 1940 तक अधिकतर समय विदेशी यात्राएँ की।

बाबा नागार्जुन को भारतीय मिट्टी के आधुनिक कवि भी माना जाता है। उनके काव्य में सामाजिक सरोकारों का कोई भी पहलू अछूता नहीं रहा। भाषाई सन्दर्भों में लें तो मैथिलि में काव्य रचना करने से प्रारम्भ कर हिन्दी, संस्कृत, बंगला में अबाध रूप से साहित्य रचनाएँ पुस्तक रूप में उपलब्ध हैं। काव्य के अनेक रूपों की बात करें तो व्यंग्य कविता में तो धाक जमाई ही, इसके साथ ही कविता में हर प्रकार के नए-नए प्रयोग भी किए; बाल साहित्य, प्रकृति-सौंदर्य वर्णन, मन्त्र कविता, छंद-बद्ध गीत, नवगीत, स्थानीय लोक शैली पर आधारित गीत, छंद मुक्त कविताएँ, गद्य में -उपन्यास, बाल कथाएं, निबंध आदि सभी साहित्यिक रचनाओं में इतनी रवानगी कि समग्र जीवन का लेखा-जोखा मानव की दिन-दैन्य के कार्य-कलापों के बिंब रूपों में चमत्कारपूर्ण ढंग से ढाल दिया। उनकी साहित्यिक भाषा अपनी नितांत अपनी पहचान लिए है, थोड़े शब्दों में कहें तो उनकी भाषा तीखी, व्यंग्याधारित, संस्कृत प्रभावयुक्त, बोलचाल की भाषा, अद्भुत रवानगी लिए, स्थानीयता-जनपदीय लहज़े वाली, मुखर, सीधी-सपाट, निर्द्वन्द्व और आर-पार के संघर्षों से जूझती निडर भाषा है।
जनकवि की सहज-स्वाभाविक उपाधि से विभूषित बाबा नागार्जुन को सर्वप्रथम ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ मैथिली काव्य-संग्रह पर साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। उत्तर प्रदेश सरकार ने ‘भारत भारती पुरस्कार से अलंकृत किया। मध्य प्रदेश से ‘मैथिली प्रसाद गुप्त’ पुरस्कार प्राप्त हुआ, बिहार सरकार से ‘राजेन्द्र प्रसाद’ पुरस्कार अर्जित किया तथा दिल्ली की हिंदी अकादमी ने शिखर सम्मान से विभूषित किया।

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जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं
जन कवि हूँ मैं साफ कहूँगा क्यों हकलाऊं|

जन कवि बाबा नागार्जुन की ये पंक्तियां उनके जीवन दर्शन, व्यक्तित्व एवं साहित्य का दर्पण है। अपने समय की हर महत्वपूर्ण घ्टना पर तेज तर्रार कवितायें लिखने वाले क्रान्तिकारी कवि बाबा नागार्जुन एक ऐसी हरफनमौला शख्सियत थे जिन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं और तथा कई भाषाओं में लेखन कर्म के साथ-साथ जनान्दोलनों में भी बढ चढ़कर भाग लिया और उनका नेतृत्व भी किया 

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