Tue. Jul 23rd, 2019

हम जो कुछ कर रहे हैं, उसे भगवान देख रहे हैं

हिमालिनी अंक मई २०१९ |भगवान के स्वरूप का ज्ञान न होने पर भी भगवान की सत्ता में जो विश्वास है, उससे भी परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है । किंतु यह विश्वास पूर्ण रूप से होना चाहिए । मनुष्य के मन में भगवान के अस्तित्व का विश्वास ज्यों–ज्यों बढ़ता जाता है, त्यों ही त्यों वह भगवान के समीप पहुँचता जाता है । किसी को भगवान के सगुण–निर्गुण, साकार–निराकार किसी भी स्वरूप का वास्तविक अनुभव नहीं है, किंतु यह विश्वास है कि भगावन और वे सब जगह व्यापक है, वे सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, परम प्रेमी और परम दयालु है, वे पतितपावन और अन्तर्यामी है, हम जो कुछ कर रहे हैं, उसे भगवान देख रहे है, जो कुछ बोल रहे है, उसे वे सुन रहे हैं तथा जो कुछ हमारे हृदय में है, उसे भी वे जान रहे हैं । इस प्रकार विश्वास हो जाने पर उस साधक के द्वारा झूठ, कपट, चोरी, बेईमानी, हिंसा, व्यभिचार आदि भगवान के विपरित आचारण नहीं हो सकते । इस विश्वास की उत्तरोत्तर वृद्धि होने पर विरुद्ध आचरण की तो बात ही क्या है, उसके द्वारा यज्ञ, दान, तप, तीर्थ व्रत, उपवास, सेवा, जप, ध्यान, पूजा, पाठ, स्तुति, प्रार्थना, सत्संंग, स्वाध्याय आदि जो कुछ सत–चेष्टा होगी, वह भगवान के अनुकूल और उनकी प्रसन्नता के लिए ही होगी ।

उसके हृदय में क्षमा, दया, शान्ति, समता, सरलता, संतोष, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य आदि भाव भगावन के अनुकूल और उत्तम से उत्तम होंगे । भगवान के अस्तित्व में जो भक्तिपूर्वक विश्वास है, इसका नाम ‘श्रद्धा’ है । भगवान, गुण, प्रभाव, तत्व, रहस्य को समझने से जब साधक की भगवान में परम श्रद्धा हो जाती है, तब उसके हृदय में प्रसन्नता और शान्ति उत्तरोत्तर बढते चले जाते है । कभी कभी तो शरीर में रोमांच और नेत्रों से अश्रुपात होने लगते हैं, तथा हृदय प्रफुलित हो जाता है । कभी–कभी विरह की व्याकुलता में वह अधीर–सा हो जाता है । उसके हृदय में यह भाव आता है कि जब भगवान है तो हम उनसे वंचित क्यों ? भगवान की ओर से तो कोई कमी हैं ही नहीं, जो कुछ विलम्ब होता है, वह हमारे साधना की कमी के कारण ही होता है ओर उस साधन की कमी में हेतु है विश्वास की तथा विश्वास की कमी में हेतु है अज्ञता यानि मुर्खता ।

अतः एवं हमको यह विश्वास बढ़ाना चाहिए कि भगवान निश्चय है, वे अब तक बहुतों को मिल चुके हैं, वर्तमान मिलते हैं एवं मनुष्य मात्र का उनकी प्राप्ति में अधिकार है । अपात्र होने पर भी दयामय भगवान ने मुझ को मनुष्य–शरीर देकर अपनी प्राप्ति का अधिकार दिया है । ऐसे अधिकार को पाकर मैं भगवान की प्राप्ति से बंचित रहूँ तो यह मेरे लिए बहुत ही लज्जा और दुःख की बात हैं । बार–बार इस प्रकार सच समझने पर भगवान के होने में उत्तरोत्तर भक्तिपूर्वक विश्वास बढ़ता–चला जाता है, जिससे उसके मन में भगवान को प्राप्त करने की आकांक्षा का उदय हो जाता है, तदन्तर आकांक्षा में तीव्रता आते–आते उसको भगवान का ना मिलना असह्य हो जाता है, एवं वह फिर भगवान की प्राप्ति से वंचित नहीं रहता । तीव्र इच्छा उत्पन्न होने पर भगवान उससे मिले बिना रह नहीं सकते । जो भगवान से मिलने के लिए अत्यन्त आतुर हो जाता है, उसके लिए एक क्षण का भी विलम्ब भगवान कैसे कर सकते हैं ? अत एवं भगवान के अस्तित्व में विश्वास उत्तरोत्तर तीव्रता के साथ बढ़ाना चाहिए । इस भक्तिपूर्वक विश्वास की पूर्णता ही परम श्रद्धा है । परम श्रद्धा के उदय होने के साथ ही भगवान की प्राप्ति हो जाती है, फिर एक क्षण का भी विलम्ब नहीं हो सकता । हमारे श्रद्धा–विश्वास की कमी ही भगवान की प्राप्त में विम्ब होने का एक मात्र कारण है ।

शास्त्र औरर महात्माओं पर विश्वास होने पर भी परमात्मा की प्राप्त शीघ्रतिशीघ्र हो सकती है । शास्त्र कहते हैं कि भगवान हैं और महात्मा भी कहते हैं कि भगवान है । शास्त्र के वचन अनकूल ही वे कहते हैं कि भगवान है, और इस विषय में शास्त्र प्रमाण है तो इस प्रकार का वचन महात्मा का वचन तो शास्त्र के समान ही है, कुछ महात्मा लोग जो व्यक्तिगत स्वार्थ में लग कर समुदायों को बदनाम कर दिया है, जो साधुओं के नाम पर अपनी डफली बजा रहा है, इस का मतलब यह नहीं है कि सारे का सारे महात्मा गलत हैं, वेद कुछ जानता ही नहीं, ऐसी बात नहीं है ।

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