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सुशासन के तहत नागरिक सुरक्षा : अंशु झा

हिमालिनी अंक मई २०१९ | सामान्य अर्थ में राष्ट्र के आर्थिक तथा सामाजिक विकास के लिये सरकार को प्राप्त अधिकार का समुचित सदुपयोग ही सुशासन है । नवीनतम शासकीय अवधारणा अनुसार सुशासन असल शासन की मान्यता को आत्मसात करते हुये समग्र नागरिक अधिकार स्थापित करने की व्यवस्था है ।

किसी भी राज्य का शासकीय उद्देश्य होता है ( समग्र देश के नागरिकों को सुरक्षा और समृद्धि सुनिश्चित करना । इसी उद्देश्य पूर्ति के लिये जनता और सरकार के बीच एक बजबूत विश्वास का वातावरण बनाया जाता है ताकि कार्य सन्चालन में सहजता हो । इस अर्थ में साध्य के रूप में सुशासन तभी ही स्थापित हो सकता है जब सुशासन का प्रमुख पक्ष मानव सुरक्षा के दूरगामी और स्थायी प्रत्याभूति करेगा । सन् १९९७ में (यूएनडीपी) ने विश्व बैंक प्रतिवेदन के प्रस्तुत विषयों में संश्लेषण करते हुये सुशासन के अनिवार्य विभिन्न तत्वों को दर्शाया था – पारदर्शिता, सहभागिता, जबाबदेहिता, सहमति, प्रभावकारिता, कानूनी शासन, समता, भ्रष्टाचार नियन्त्रण आदि । परन्तु इन सारी बातों से अत्यधिक महत्वपूर्ण है मानव सुरक्षा । फिलहाल अभी तक हमलोग विश्व बैंक द्वारा प्रतिपादित सूत्रों के सहारे ही सुशासन स्थापित करने या कराने का कार्य वर्षों से करते आ रहे हैं । पर वास्तविक अर्थ में नागरिक सुशासन को अभी तक महसूस नहीं कर पाया है । अर्थात् वैसा सुशासन अभी तक स्थापित नहीं हो पाया है जिसे नागरिक महसूस कर सके । हां, सुशासन का तत्व और विशेषता को पढने, पढाने, लिखने तथा प्रतिवेदन देने के काम में प्रशस्त रूप में प्रयोग किया जा रहा है ।

जनता को केन्द्रविन्दु में रखकर शासन करना ही सुशासन कहलाता है । अर्थात् जनता की हरेक आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति सुशासन के अन्तर्गत आता है । जिसमें नागरिक सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है । जब तक नागरिक सुरक्षा को प्रथम केन्द्र में रखकर कार्यक्रम बनाकर उसे व्यवहार में नहीं लाया जायेगा तब तक नागरिकों को सुशासन की अनुभूति नहीं हो सकती है ।
मानव सुरक्षा का अर्थ ः देश के प्रत्येक नागरिक को परम्परागत सुरक्षा से अलग उनके स्वतन्त्रता तथा अधिकार की रक्षा करते हुये मानवीय आवश्यकता की परिपुर्ति करना है । मानव दो बातों से अपने आपको सुरक्षित रखना चाहता है जिसमें एक है – गरीबी के चक्र से निकल कर अपनी रोजीरोटी का बन्दोबस्त कर सुखद जीवनयापन करना । और दूसरा है – किसी भी हिंसात्मक गतिविधि से प्रभावित नहीं होना । यह हिंसात्मक गतिविधि उसके व्यक्तिगत व सामुदायिक विकास में बाधा पहुंचाता है । इसलिये उनकी यह इच्छा रहती है कि ऐसा गतिविधि निस्तेज तथा नियन्त्रित हो ।

विश्व बैंक ने सन् १९९० के दशक में यह तथ्य प्रस्तुत किया है – दक्षिण अफ्रीका में विकास नहीं होने का कारण वहां सुशासन का अभाव रहा । सुशासन के साध्य के रूप में गतिशील कार्य के माध्यम से स्थापित करना राज्य का दायित्व होता है । प्रत्येक नागरिक के चेहरे पर मुस्कान लाने के उद्देश्य से स्थानीय स्तर से लेकर केन्द्र स्तर तक मानव सुरक्षा की प्रत्याभूति होनी चाहिये । अपहरण, बलात्कार, चोरी डकैती, ठगी इत्यादि फौजदारी अभियोग माना जाने वाला कार्य मानव सुरक्षा को चुनौती दे रहा है । गलत प्रवृति का पक्ष इसका पृष्ठपोषक बने हुये हैं । वो सेवाग्राही नागरिकों को सुरक्षा नहीं दे रहे हैं बस पीडादायक बने हुये हैं । ऐसे ही प्रवृति को लेकर नागरिक सुशासन में अपनी सुरक्षा ढूंढ रहे हैं । आखिर सुशासन के अन्तर्गत नागरिक कितना सुरक्षित है ? यह प्रश्न प्रत्येक नागरिक के अन्र्तमन में उठ रहा है । क्योंकि हमारे देश का नागरिक बहुआयामिक और बहुक्षेत्रगत पक्ष से सदैव अपने आपको असुरक्षित की अनुभूति कर रहे हैं । सबसे पहले तो आर्थिक असुरक्षा, जहां व्यक्ति दो वक्त का भोजन जुटाने के लिये असमर्थ हैं । सुबह का खाना खाते रहते हैं और शाम के खाना के लिये चिंतित रहते हैं । फिर आकास्मिक दुर्घटनाओं से बचने के उपाय में आभाव, जैसे ) २०७२ साल में आए महाभूकम्प का त्रास अभी तक नागरिकों में मौजुद है । इसके बाद हाल फिलहाल प्रदेश नम्बर दो के बारा परसा में आए भयानक चक्रवात का भय । क्या इन सबका निवारण सुशासन के अन्तर्गत नहीं नहीं आता है ?

खाद्य सुरक्षा का पक्ष मनुष्य को जितना ही चिंतित बनाता रहता है उतना ही स्वस्थ्य सुरक्षा को लेकर भी जनता दुखी रहते हैं । ग्रामीण क्षेत्र में तथा सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य संबंधी कमजोर व्यवस्थापन के कारण नागरिक अपने आपको असुरक्षित महसूस करते हैं । निजी अस्पताल के मंहगाई के कारण सर्वसाधारण वहां तक पहुंचने में असमर्थ होते हैं । दुर्भाग्यवश उनकी मृत्यु निश्चित होती है ।
राजनीतिक सुरक्षा, नागरिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण अंग है । व्यक्ति के अधिकार का संरक्षण तथा सम्बद्र्धन करना सुशासन के अन्तर्गत आता है । नागरिक या राजनीतिक अधिकार एक ऐसा अधिकार है जिसमें सरकार, सामाजिक संगठन या निजी व्यक्ति द्वारा उलंघघन के कारण व्यक्ति के स्वतंत्रता की रक्षा किया जाता है । इसमें बिना किसी भेदभाव तथा दबाब के समाज के नागरिक और राजनीतिक जीवन में हिस्सा लेने की क्षमता को सुनिश्चित किया जाता है । नागरिक अधिकार लिंग, रंग, उमर, राजनीतिक संलग्नता, जातीयता, धर्म, शारीरिक दुर्वलता के आधार में होने वाले भेदभाव से सुरक्षा प्रदान करता है । नागरिक या राजनीतिक अधिकार अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार का एक हिस्सा है । इतने सारे परिभाषाओं के बाबजुद भी अधिकांश नागरिक अपने आपको असुरक्षित महसूस करते हैं । सही अर्थ में जहां मानव सुरक्षा बजबूत होती है वहां का सुशासन भी अत्यधिक बजबूत होता है । अगर सुशासन मानव सुरक्षा का मांग करता है तो मानव सुरक्षा सुशासन की प्रत्याभूति देती है । मानव सुरक्षा के लिये दो तत्वों का प्रयोग किया जाता है ः सशक्तिकरण और संरक्षण । सशक्तिकरण हमेशा नीचे से ऊपर की ओर जाता है और संरक्षण ऊपर से नीचे की ओर । अर्थात् राष्ट्र, समाज, समुदाय, वर्ग, लिंग, जाति और अन्त में केवल व्यक्ति । इस प्रकार सुशासन को मजबूत बनाया जाता है ।

समग्रतः जिन जिन तत्वों से व्यक्ति और समुदाय असुरक्षित है, सबसे पहले राज्य को उन अवांछनीय तत्वों का सफाया करना अति अवाश्यक है । त्रसित व्यक्ति को त्रास से मुक्ति दिलाना, गरीब को रोजगार देना, पीडित वर्ग को पीडा से उवारना । अर्थात् अपने राज्य के नागरिकों को सम्भवतः सुरक्षित रखना राज्य का ही दायित्व होता है । ताकि राज्य विकास के तरफ अग्रसर हो सके । नागरिक और राज्य के बीच अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है । अगर हमारे राज्य का प्रत्येक व्यक्ति सुरक्षित तथा स्वस्थ्य होंगे तभी जाकर हमारा राज्य सुरक्षित तथा शांत बनेगा । पारदर्शिता, जनसहभागिता, उत्तरदायित्व तथा पूर्वानुमानयोग्यता इसे सुशासन का चार स्तम्भ के रुप में माना जाता है अतः इसमें नागरिक सुरक्षा को महत्वपूर्ण ढंग से समेटना चाहिये । सुशासन देखने की वस्तु नहीं है इसे अनुभूति किया जाता है ।

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