Wed. Oct 23rd, 2019

संघीय लोकसेवा का विज्ञापन संघीयता पर एक और प्रहार : रणधीर चौधरी

हिमालिनी अंक जुन २०१९ |संविधान को देश का मूल कानून माना जाता है । संविधान अगर न हो तो कानूनी शासन की परिकल्पना भी नही की जा सकती है । किसी भी देश के कानूनी शासन का अपना महत्व होता है । कानूनी शासन अपने आप मे एक बड़ा सिद्धान्त है । कानूनी शासन ऐसे शासन को दर्शाता है जिस में हरेक व्यक्ति, सार्वजनिक तथा निजी संस्थाओ के ऊपर अन्तराष्ट्रीय मानवाधिकार के नीति और मापदण्ड से मेल खाता हो और सार्वजनिक रूप मे अनुमोदित तथा समान रूप में किए गए कानूनी दायित्व के अन्तर्गत आता हो ।

कानून की सर्बोच्चता, कानून के दृष्टि में समानता, कानून के प्रति दायित्व, कानून लागु करने का दायित्व, कानून लागु करते वक्त समानता, शक्तिपृथकीकरण, निर्णय मे सहभागिता, कानूनी निश्चितता, स्वेच्छाचारिता का त्याग और कार्यविधि एवं कानूनी पारदर्शिता जैसे सिद्धान्तो का मेलखाना आवश्यक होता है ।

नेपाल मे संविधान है । कुछ मायने मे विश्व के कई देशो की तुलना में यहाँ कानूनी शासन बना रहे उसके अनेकन प्रयास भी जारी रहतेण् हैं । परंतु सुक्ष्म तरीके से देखा जाय तो यहाँ कानूनी शासन का चीरहरण अकसर किया जाता है । ताजी अवस्था यह है कि संघीय लोकसेवा आयोग ने स्थानीय तह में कर्मचारी भरती के प्रयोजन से विज्ञापन का आह्वान किया है । उस विज्ञापन मे नेपाल के संविधान मे उल्ल्ेख किए गए समावेशी समानुपातिक व्यवस्था के साथ खिलवाड़ किया है । जिसके कारण मधेश के युवाओं मे आक्रोश का उफान देखा जा रहा है । सिर्फ मधेशी ही नही आदिवासी जनजाति, दलित, अपंग, महिला एवं पिछड़ा वर्ग अर्थात आरक्षण पाने वाले सभी स्तर के संबैधानिक अधिकार का कुठाराघात किया गया है लोकसेवा आयोग की तरफ से ।

नेपाल के निजामती सेवा ऐन २०४९ का परिच्छेद ३ के दफा ७ के उपदफा ७ को आधार माना जाय तो कुल सीटो का ४५ प्रतिशत एलोकेट कर उस मे महिला के लिए ३३ प्रतिशत, आदिवासी जनजाति को २७ प्रतिशत, मधेशी को २२, दलित को ९, अपंग को ५ और पिछडा वर्ग को ४ प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गयी है । और संघीय लोकसेवा आयोग ने इस संबैधानिक व्यवस्था को न सिफ अनदेखा किया है अपितु वंचितिकरण में परे समुदाय के संवैधानिक अधिकार से खेलने की धृष्टता की है ।

नेपाल के संविधान के धारा २८५ (२) में उल्लेख किया गया है कि संघीय निजामती सेवा लगायत सभी संघीय सरकारी सेवा मे पदपुर्ति करने के लिए ली जाने वाली प्रतियोगात्मक परीक्षा मे कानुन बमोजिम खुला और समानुपातिक समावेशी सिद्धान्त के आधार पर लिया जाएगा  । वैसे ही संविधान की ही धारा ३८(४), ४०(१),४२(१) को देखा जाय तो महिला, दलित और समग्र में सामाजिक न्याय की हक प्राप्ति जैसे पवित्र व्यवस्थाओ से मजाक किया है संघीय लोकसेवा आयोग ने । क्या यह नेपाल मे कानूनी शासक के ऊपर किया गया गैर संवैधानिक प्रहार नही है ? समावेशी लोकतन्त्र को धीरे धीरे प्रतिगमन के रास्ते पर ले जाने का नापाक प्रयास नहीं है ?

संघीय लोकसेवा आयोग की तरफ से दलील यह दिया जा रहा है कि समायोजन एन के तहत हरेक स्थानीय तह के लिए अलग–अलग विज्ञापन करने की आवश्यकता के कारण समावेशी सीट कम पड़ गया । सवाल यह आता है कि किस स्थानीय तह की तरफ से संघीय सरकार को पुकार लगाया था विज्ञापन के लिए ? नेपाल के संविधान की धारा २४४ ने प्रदेश लोकसेवा आयोग सम्बन्धी व्यवस्था किया है । और संघीय व्यवस्था वाले देशों में यह इस बात का  स्पष्टीकरण है कि स्थानीय तह मे कर्मचारी भर्ना जैसी व्यवस्था प्रदेश सरकार मातहत से किया जाता है । अर्थात प्रदेश सरकार की क्षेत्राधिकार की विषयवस्तु है ।

नेपाल मे संघीयता के मूल आधार ही सहकारिता, सहअस्तित्व और समन्वय होता है । यहाँ संघ, प्रदेश और स्थानीय तह के बीच सहकारिता का विशेष अभाव देखा जा रहा है । संघ तो प्रदेश के अस्तित्व को स्वीकार करने को तैयार ही नही है । और तीनों तह के बीच समन्वय का सदाबहार सूखा है । अभी लाए गए विज्ञापन का अगर बात करे तो यह तथ्य स्पस्ट होता है । प्रदेश २ सरकार के तरफ से प्रदेश लोकसेवा आयोग और प्रदेश निजामती सेवा विधेयक प्रदेश सभा मे दर्ता कराया है । कुछ ही हफ्तों में यह विधेयक पास होने को है, मुख्यमन्त्री मोहम्मद लालबाबु राउत के अनुसार । प्रदेश २ सरकार ने संविधान मे किए गए व्यवस्थानुसार आरक्षण प्राप्त करने वाली सभी क्लस्टर के लिए आरक्षण कोटा का एलोकेसन किया गया है । इतना ही नही, प्रदेश २ की सरकार ने सामाजिक न्याय को मद्दे नजर रखते  हुए प्रदेश मे किए जाने वाली हरेक नियुक्ति  में महिलाओ के लिए पचास प्रतिशत महिला कोटा की व्यवस्था की है । जो की अत्यन्त ही प्रशंसनीय कदम के रूप में लिया जा रहा है और लेना भी चाहिए । इतना ही नही महिलाओं को प्रदेश प्रहरी भरती मे भी पचास प्रतिशत का आरक्षण तय है । अभी जिस तरह से गैरसंवैधानिक तरीके से संघ के द्वारा अनावश्यक शक्ति का अभ्यास किया जा रहा है । उसके कारण न सिर्फ समावेशी सिद्धान्त पर प्रहार किया है बल्कि संघीयता के मूल मर्म कहा जानेवाला अपना शासन अपना प्रशासन पर धावा बोला है ।

वर्तमान सरकार ने आरक्षण व्यवस्था को अन्तरात्मा से स्वीकार नही किया है, करे भी कैसे । आखिर उनको लगता है कि इस देश का मालिक वही है । यही कारण है की न सिर्फ आरक्षण बल्कि संघीयता ही उनके नजर में गलत है । सरकार से भी एक कदम उपर नेपाल की स्थायीसत्ता अर्थात कर्मचारीतन्त्र उनको भी संघीयता बर्दास्त नही हो पा रहा है । यथास्थिति में देश को बंधक बनाकर लूटते आ रहे देश के कर्मचारीतन्त्र राजनीतिक दल के अन्धभक्त जैसा प्रस्तुत होती आ रही है । अभी के असमावेशी एवं गैरसंवैधानिक लोकसेवा विज्ञापन मे नेकपा, नेपाली कांग्रेस और कर्मचारीतन्त्र के नापाक इरादों का नतीजा है ।

नेपाल के स्थायीसत्ता को भलीभाँति पता है कि आन्दोलन से स्थापित संघीयता को अगर सीधे खारिज किया गया तो देश फिर से आन्दोलित हो सकता है । इसलिए विभिन्न रणनीति के तहत इसको पहले कमजोर करने का लगातार प्रयास जारी है । प्रमुख जिला अधिकारी (सिडीओ) को दिया गया अनावश्यक अधिकार को इसी कड़ी मे जोर कर हमे समझना होगा । नया संघीय प्रहरी एन समय से न बनाना संघीयता को कमजोर करने की ही तो रणनीति है ।

दुख की बात तो यह है कि अधिकार के  नाम पर आन्दोलन करके उदय हुए राजनीतिक दल भी अपनी नीयत को बयान नही कर पा रहे हैं । बात करें मधेश आन्दोलन से जन्म लिए राजनीतिक शक्ति राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल और समाजवादी पार्टी नेपाल की । यह जो विज्ञापन आया है यह विज्ञापन लाने का आधार संघीय लोकसेवा आयोग के वर्तमान मन्त्रिमण्डले के निर्णय के बाद प्राप्त हुआ है । यह वही क्याबिनेट है जिस के एक अहम हिस्से के रूप मे उपप्रधानमन्त्री और स्वास्थ्य मन्त्री के रूप में समाजवादी पार्टी के नेता उपेन्द्र यादव भी हंै । इन दलो को भी समझ पाना मुश्किल है । या तो अभी के नेकपा सरकार के समाने यह कुछ बोल नही पाते है या तो इन्हे संविधान का ज्ञान नही है । दूसरा कारण अगर कुछ हो सकता है तो मुझे नही पता । दूसरी पार्टी है राजपा, इनका तो जबाव ही नही है । राजपा की लाचारी के उपर कुछ टिप्पणी करें तो टिप्पणी की ही बदनामी है ।
वर्तमान युग समावेशी लोकतन्त्र का युग है । विधिशास्त्र के अनुसार, प्राप्त अधिकार की परिधि से बाहर जा कर किसी को कोई फैसला नही लेना चाहिए । जैसे कि किसी हेडमास्टर को गलत कहने बाले विद्यार्थी को दो हप्ते तक निष्काशित करने का अधिकार है तो बिद्यार्थी को एक महीने के लिए निष्कासित नहीं किया जा सकता है । अभी कुछ ऐसा ही हुआ है । संघीय सरकार को प्रदेश लोकसेवा के लिए संघीय संसद के द्वारा कानून बनाकर आधार और मापदण्ड निर्धारण करने का अधिकार है । इसका मतलब ये नही होता की संघ को प्रदेश चलाने का अधिकार दे दिया गया है । संघीयता का मतलब राजा महेन्द्र द्वारा लाया गया अंचल का  नमूना नही है । नेपाल मे संघीयता का मोडेल का मतलब है कि प्रदेश मे स्वशासन और संघ के शासन मे साझेदारी दानों चीजों  की ग्यारेण्टी  और इसी मोडेल को लागू कर संघीयता को सफल कराया जा सकता है ।

अगर ऐसा नही होता है तो नेपाल में दिख रही मुर्दा शान्ति को चिर शान्ति में कभी भी तबदील नही किया जा सकता है । और यह अवस्था यथास्थिति में मस्त झूम रही स्थायी सत्ता को भारी पड़ सकता है । अतः सरकार के द्वारा जो संविधान की प्रस्तावना के मूल मर्म पर प्रहार किया गया है उसको सुधारना उचित होगा । सामाजिक न्याय के लिए लड़ने वाली ताकताें को एकजुट होने की आवश्यकता है ।

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