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पर्यटकीय संभावनाओं का केंद्र स्थल जनकपुर यानि मिथिला : अजयकुमार झा

हिमालिनी पत्रिका, अंक जून २०१९ | जनकपुर वो पवित्र स्थान है जिसका धर्मग्रंथों, काव्यों एवं रामायण में उत्कृष्ट वर्णन है । उसे स्वर्ग से ऊँचा स्थान दिया गया है जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम रामचंद्र एवं आदर्श नारी सीता का विवाह संपन्न हुआ ।

सनातन संस्कृति तथा धर्मावलंबियों के लिए एक आधारभूत स्थल के रूप में परिचित यह मिथिला भूमि अपने आप में गौरव और गरिमा गाथा को लिए हुए हैं । सांस्कृतिक रूप से संपन्न और उत्कृष्ट यह प्रदेश धार्मिक पर्यटक के लिए भी विश्वभर में विशेष महत्व रखता है । जनकपुर, हिन्दू धर्मावलम्बियों का प्रधान तीर्थ है । ‘शतपथ ब्राहमण’, ‘तैतिरीय ब्राहमण’, ‘वृहदारण्यक’ उपनिषद् इत्यादि में इसकी चर्चा अनेक बार आयी है । ‘वृहद्विष्पुराण’ के अनुसार तीर्थाटन की पूर्णाहुति यहीं जाकर होती थी ।

इसी प्रकार (धनुषा) जनकपुर का जानकी मन्दिर, राम मन्दिर, दुलहा–दुलही मन्दिर, जनक मन्दिर धार्मिक धनुषसागर, गंगासागर, रत्नसागर, विहारकुण्ड,अग्निकुण्ड, ज्ञानकुप, अंगराज सरोवर, दशरथ सागर, गोरधोई, पापमोचन सर, छत्रधारिणी पोखरी, तेलदिधकी सर, देवान पोखरी, डबरा पोखरी, पापमोचनी सर, पुण्यधन सर, वाल्मिकी सर, भुतही पोखरी, मुरलीसर, रामसागर, लक्ष्मणसर, सीताकुण्ड, सूर्यकुण्ड, विषहरा पोखरी, महाराज सागर, रुकमिणी सर, पार्वती सर, विडाल सर सहित ‘५२ कुटी और ७२’ कुण्ड के रामायणकालीन प्रमाण पर्यटकों के स्वागत को तत्पर है 

वृहद् विष्णु पुराणः
गंगा हिमवतोर्मध्ये नदी पञ्च दशांतरे ।
तैरभुक्तिरिदति ख्यातो देशः परम पावनः । ।
देवी भागवत
एवं निमिसुतो राजा प्राथतोजनकोऽभवत् ।
नगरी निर्मिता तेन गंगातीरे मनोहरा ।
मिथिलेति सुविख्याता गोपुराट्टाल संयुता
देवी भागवत–
वंशेऽस्मिन्येऽपि राजानस्ते सर्वे जनकास्तथा ।
विख्याता ज्ञानिनः सर्वे वेदेहाः परिकीर्तिताः । ।
वर्षद्वयेन मेरूंच समुल्लङ्घ्य महामतिः ।
हिमालये च वर्षेण जगाम मिथिलां पति । ।
प्रविष्टो मिथिलांमध्ये पश्यंसर्वर्द्िधमुतम् ।
प्रजाश्चः सुखिता सर्वाः सदाचाराः मुखंस्थिताः । ।
श्रीमद् भागवत–
एते वै मैथिला राजन्नात्म विद्याविशारदाः
योगेश्वरं प्रसादेन द्वन्दैमुक्ता गृहष्वेपि

यहाँ प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु आते है । प्राचीनकाल में यह मिथिला की नाभिभूमि या राजधानी थी जहां जनक से कर्मयोग के व्यवहारिक ज्ञान हेतु देश विदेश के जिज्ञासु आते थे । यह विवेकियों का गढ़ था । आज भी यहाँ के लोगो में अध्यात्म और भक्ति रस का संगम सहज में देखा जा सकता है । साधू संत और ओशो सन्यासियों के गढ़ के रूप में आज भी जनकपुर सम्मानित है । परन्तु यहाँ के राजनीति कर्मी और सामाजिक जन जीवन में जो आधुनिकता और वैज्ञानिकता होना चाहिए उसमे कमी दिख रही है ।

और कमी की पूर्ति के लिए आवश्यकता है मानसिक और बैचारिक एकाग्रता का । यहां के बुद्धिजीवी व्यापारी और समाज सेवीयों को इस दो नंबर प्रदेश में पर्यटकीय स्थलों और धार्मिक सांस्कृतिक तथा परंपरागत क्रियाकलाप, त्योहार और उत्सवों को आधुनिकता के साथ प्रस्तुत करने का । इसके लिए एक सबल और सुव्यवस्थित संगठन की आवश्यकता है, जो प्रदेश दो के प्रत्येक जिला में और उसकी छोटी–छोटी शाखाएं प्रत्येक पालिकाओं में सांगठनिक रूप का निर्माण तथा संवाद का वातावरण सृजना कर सके । पौराणिक काल से प्रतिष्ठित मिथिला की राजधानी जनकपुर वह पूण्य भूमि है, जहाँ प्रतिवर्ष भारत लगायत विश्व के विभिन्न देसों से २० लाख से अधिक की संख्या में धार्मिक पर्यटक आते हैं । परन्तु सरकारी उदासीनता, व्यापारिक संकीर्णता तथा भौतिक अस्तव्यस्तता के कारण जनकपुर हर प्रकार से दलदल और जर्जर होता जा रहा है । विद्वान् लोग हिंदी मैथिली और नेपाली भाषा के चक्रव्यूह में उलझे हुए हैं वही समाजसेवी तथा राजनीति कर्मी मधेसवाद और खासवाद के चक्कर में भस्मासुर बने हुए है । सत्ताधारी और कर्मचारी को लूटने से फुर्सत नहीं है । फिर भी इतनी विषमता और विडम्बनाओं के बीच इस भूमि के सम्मान और स्वतंत्रता हेतु युवा बलिदानी के लिए पीछे नहीं हट रहे हैं । मिथिला के पुनः निर्माण और गरिमा मंडन हेतु यही से एक भरोसा और आत्मविश्वास जागृत होता है । क्योंकि यह यह भूमि राजर्षि जनक के प्रज्ञा, सीता के शालीनता, याज्ञवल्क्य के तपोनिष्ठा, गार्गी के सरलता, सुकदेव के शुद्धता,मैत्रेयी के माधुर्य,वाचस्पति के वचन बद्धता,अष्टावक्र के वोध, बुद्ध के बौद्धिकता, उर्मिला के धैर्य, मधेसियों के अरमान और शहीदों के शहादत से सिंचित है । इस हेतु यह भविष्य के संभावना रूपी अनेक द्वारों को खोलेगा । अतः सतर्कता और दूरदृष्टि के साथ आगे बढ़न की जरुरत है ।

नेपाल के ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के भण्डार प्रदेश नं . दो को एक विशिष्ट पर्यटकीय स्थल और गन्तव्य के रुपमें बड़ी ही सहजता और सरलता के साथ विकसित किया जा सकता है । आठ जिलाओं के संयोग से संगठित इस प्रदेश का अक्षांश और देशान्तर में लगभग एकरुपता है । यह प्रदेश समृद्र सतह से लगभग ६०.९ देखि ६०७.९५ मिटर उंचाई में अवस्थित है ।

मिथिला के प्रवेश द्वार महोत्तरी जिला के अन्तर्गत एतिहासिक और पौराणिक गरिमा से सुशोभित पर्यटकीय स्थल के रुपमे पद्म पुराण में वर्णित राजर्षि जनक द्वारा पूजित जलेश्वरनाथ महादेव अवस्थित हैं । जल शयन होने के कारण उन्हें जलेश्वरनाथ महादेव कहा गया है । कारिक बाबा पडौल, कन्चनवन, ध्रुवकुण्ड, गिरिजा स्थान, मालिवारा, निवुआटोल माइस्थान, सिद्धिनाथ मन्दिर, सोनामाई स्थान, टुटेश्वरनाथ महादेव, रौजा मजार, मंगलनाथ महादेव, नेपाल नरेश के गुरुद्वारा मटिहानी स्थान, तसमैया बाबा के द्वारा स्थापित दिव्य खन्ती भी सुरक्षित है,साथहि जलसागर पोखरी अपनी दिव्यता लिए सृजना हेतु प्रतीक्षारत है ।

इसी प्रकार (धनुषा) जनकपुर का जानकी मन्दिर, राम मन्दिर, दुलहा–दुलही मन्दिर, जनक मन्दिर धार्मिक धनुषसागर, गंगासागर, रत्नसागर, विहारकुण्ड,अग्निकुण्ड, ज्ञानकुप, अंगराज सरोवर, दशरथ सागर, गोरधोई, पापमोचन सर, छत्रधारिणी पोखरी, तेलदिधकी सर, देवान पोखरी, डबरा पोखरी, पापमोचनी सर, पुण्यधन सर, वाल्मिकी सर, भुतही पोखरी, मुरलीसर, रामसागर, लक्ष्मणसर, सीताकुण्ड, सूर्यकुण्ड, विषहरा पोखरी, महाराज सागर, रुकमिणी सर, पार्वती सर, विडाल सर सहित ‘५२ कुटी और ७२’ कुण्ड के रामायणकालीन प्रमाण पर्यटकों के स्वागत को तत्पर है ।
इसी प्रकार पर्सा में बौद्ध धर्माम्बलम्बी राजा अशोक द्वारा निर्मित स्थल भिश्वाचौक एतिहासिक है, घरिहर्वा पोखरी, विन्द्यवासिनी मन्दिर, दिव्येश्वर महादेव और विद्यापति चौक पर्यटकीय क्षेत्र के रुपमे विकसित किया जा सकता है ।
सर्लाही के सागरनाथ, मूर्तिया बाबाधाम, हरिहर महादेव प्रमुख पर्यटकीय स्थल तो है ही राज वारहैया, बौधीमाई, बाल्मिकी आश्रम, चर्तुभुजेश्वर महादेव् इन स्थानों को भी विशेष योजनाओं के तहत पर्यटक के लिए आकर्षण का केंद्र बनाया जा सकता है । सिरहा के सलहेश फूलवारी, बालासुन्दरी भगवती र । सप्तरी हनुमाननगर, गोबरगाड्डा, छिन्नमस्ता–सखडेश्वरी भगवती, राजा मानदेव के प्रशासनिक एकाई चन्द्रभागा भगवती १५ वी शताब्दी के राजा चन्द्रकेतु के द्वारा स्थापित राजा बनौली द्रोणवार राजा पुरादित्य के राजधानी और महाकवि विद्यापतिद्वारा लिखनावली लीखागया स्थल, गिद्धखोरा, चुरेपहाड पर विष्णुमन्दिर, रुपनगर में लक्ष्मीनारायण मन्दिर, मौवाहा में १५० वर्ष पुरानी शम्भुनाथ मन्दिर, दिनाभद्री इन क्षेत्र को केंद्रीकृत किएजाने की आवश्यकता है ।
रौतहट के शिवनगर मन्दिर, बडेवाताल, भरथर ताल, राजदेवी मन्दिर पर्यटकीय स्थल है ।
ऐसे ही बारा के बरियारपुर, गढीमाई, चिडियामाई, रतनपुर जंगल, विन्द्यवासिनी मन्दिर प्रमुख पर्यटकीय स्थलों में है ।
जनकपुर के चारों ओर शिलानाथ, कपिलेश्वर, कूपेश्वर, कल्याणेश्वर, जलेश्वर, क्षीरेश्वर और मिथिलेश्वर रक्षक देवताओं के रूप में शिव मंदिर अभी भी मौजूद हैं । साथ ही इस प्राचीन धार्मिक तीर्थ के चारों ओर विश्वामित्र, गौतम, वाल्मीकि और याज्ञवल्क्य ऋषि के आश्रम थे, जो अभी भी किसी न किसी रूप में मौजूद हैं ।
जनकपुर के २५ कि.मी । के भीतर अवस्थित आज भी कुछ ऐसे दिव्य स्थान है जहा का सौन्दर्य और पवित्रता विश्व को लुभानेवाली है । जनकपुर से १४ की.मी । दक्षिण में जलेश्वर नाथ महादेव विराजमान हैं ।
द्वादस लिंगो के जे गुरु लिंग महालिंगो जलेश्वर नाथ ।
र्सवसिद्धि करं लिङ्गम्
वारुणाख्यां जलेश्वर नाथ । ।
विष्णु पुराण और पदम् पुराण में वर्णित यह जलेश्वर नाथ द्वादस लिंगो के गुरु लिंग तथा स्वयंभू हैं ।
माता शक्ति के शरीर पतन के वाद भगवान् माहादेव ने अपनी कोप को शान्त करने के लिए इस गुफा को चयन किए थें । प्रमाण के रूप में आज भी यहाँ से कोई भक्त खाली हाथ नहीं लौटते हैं । महादेव की उपस्थिति का अनुभव सहज प्राप्त होता रहता है । श्रावण के सोमबारी और शिवरात्री में यहाँ भक्तों और श्रधालुओं की भीड़ हजारों की संख्या में देखे जा सकतें हैं । हर रविवार और सोमबार को भी हजारों लोग दर्शन हेतु आते हैं । पूर्णिमा के दिन तो सत्यानारायण भगवान के पूजा हेतु समूह के समूह पंक्तिबद्ध देखे जाते हैं । परन्तु यहाँ भक्तों के विश्राम और सुविधा हेतु भौतिक व्यवस्था नहीं होने के कारण धार्मिक पर्यटक को आकर्षित करने में कठिनाई हो रही है ।
एक ही काल खण्ड में ठीक ९० डिग्री के कोण में स्थापित (जलेश्वरनाथ, मटिहानी स्थान और गिरिजा स्थान) तीनो अपनी पौराणिकता और दिव्यता के लिए विख्यात है । परन्तु सरकार तीनों के प्रति उदासीन रुख अपनाए हुए है ।
इसी प्रकार तत्कालीन राजा रणबहादुर शाह से लेकर गीर्वाण युद्धविक्रम शाह तक संरक्षण प्राप्त और जानकी मंदिर से भी पुराना मंदिर के रूप में प्रतिष्ठित जलेश्वर से तीन कि.मी । उत्तर रानीरतबारा के लक्ष्मीनाराण मंदिर आज रामायण के पात्र अहिल्या की तरह अपनी उद्धारक की प्रतीक्षा में नयन बिछाए हुए है । कभी सात सौ बीघा के मालिक यह मंदिर आज एक पोखरी और ग्यारह बीघा में सिमटी हुई है । उसमे भी संरक्षण और दूरगामी सृजनात्मक सोच के अभाव में दिनप्रतिदिन जर्जर होते जा रहा है । केन्द्र सरकार के मधेस प्रति के कुदृष्टि और प्रदेस सरकार के पहुँच से बाहर होने के कारण अबतक यहाँ के लोग निराश ही नजर आते हैं । मंदिर परिसर भुत वंगला और खण्डहर के रूप में तबदील हुए दिखाई देता है । जबकि मिथिला परिक्रमा आज भी इस मंदिर में दो घंटे के लिए विश्राम लेती है । भजन कीर्तन पूजापाठ होता है । रताबारा वासी उन्हें जलपान कराते हैं । जन साधारण में आज भी आस्था कम नहीं हुई है । सिर्फ सरकार मुख मोड़े हुए है ।
अब मैं इसी राह से अब ऋषि मांडव्य के आश्रम वर्त्तमान के (मरई ग्राम) की ओर बढ़ना चाहता हूँ जहाँ पहली बार (प्रदेस नं दो के प्रमुख न्यायाधिवक्ता श्री दीपेन्द्र झा) जिनकी जन्मभूमि भी यही ग्राम है । उन्होंने अपने प्रयास से ऋषि मांडव्य के सम्मान में आश्रम निर्माण हेतु रकम विनियोजन करबाए हैं । मरई ग्राम वासी खुश ही नहीं, बल्कि उन्हें आशीष भी प्रदान कर रहे हैं । स्मरण रहे मिथिला परिक्रमा का दिन का पड़ाव इसी मांडव्य ग्राम में होता है । और मेरे यहाँ की सेवा और सम्मान सन्तों को लुभाते भी हैं । यह सब विशेष स्थल सरकारी उदासीनता के कारण मरण शैय्या पर है ।
मरई से सिर्फ छह कि.मी । उत्तर पडौल स्थान है । जो कारिख बाबा के स्थान से पुजित है । यह वह शक्ति केन्द्र है जहाँ वर्ष के चैत्र, भादों और पूष महीने को छोड़कर बांकी सभी सोमबार और शुक्रबार को विशेष पूजा होती है । इस पूजा में टनों लड्डू और सैकड़ो पशुओं की बलि प्रदान किया जाता है । यहाँ भारत और नेपाल के हजÞारों श्रद्धालु प्रत्येक सोमबार और शुक्रवार को पहुंचते हैं । ट्रैक्टर, जीप, टेम्पू, माइक्रोबस,और निजी सवारी के साथ ही सार्वजानिक सवारी से लोग पहुंचते हैं । तंत्र मन्त्र जादू टोना लगायत के हजारों समस्या से मुक्ति लगायत मनवांछित फल प्राप्ति का यह ज्वलंत प्रमाण भी है ।
यहाँ से सीधे पश्चिम सोनामाई स्थान और सोनमा ग्राम है, जो अपने भीतर इतिहास का गौरव गाथा समेटे हुए है । सोनामाई स्थान जहाँ दशहरा के सप्तमी से भूत प्रेत प्रभावित लोगों के लिए एक विशेष अवसर होता है । मंदिर के प्रांगण में एक खम्भा है जिसमे प्रेत बाधा से दुखी लोगों को स्पर्श मात्र से मुक्ति मिल जाती है । वहां भी हजारों के संख्या में प्रभावित लोग आते हैं और दर्शनार्थी तथा अनुसन्धाताओं की तो कहना ही क्या याद रहे, यह एक अनुसंधान का विषय भी है । साथ ही सोनमा ग्राम, जहाँ आल्हा और उदल का जन्म हुआ था । ये वही आल्हा और उदल की बात है, जिसकी वीरता का गुणगान पूरा उत्तर भारत और दक्षिणी नेपाल अबतक गाता आ रहा है । आल्हा उदल के वीर गाथा गानेवाले आज भी लोगों के दिलो पर राज कर रहे हैं । जिसने एकबार सुना फिर वह अपनी सारी वीर रस के कविताओं को तिलांजलि दे देता है । चाहे वह किसी भी भाषा में सिर्जित क्यों न हो । इतनी सारी विविधता और सांस्कृतिक, धार्मिक धरोहरों से परिपूर्ण यह क्षेत्र अपनी पौराणिक गरिमा तथा विशिष्टताओं के कारण आज भी यहाँ के लोक संस्कृति में जीवित है, जीवन चर्या में जीवित है, आम जनमानस के हृदय में धड़क रहा है ।

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