जो विरह की हिचकी में भी सुनाई देती है,यही रिश्ता साहिर से भी था, इमरोज़ से भी है:अमृता प्रीतम
डा श्वेता दीप्ति
वियतनाम के राष्ट्रपति हो ची मिन्ह भारत दौरे पर थे । नेहरू से उनकी अच्छी दोस्ती थी. हो ची मिन्ह के सम्मान में कार्यक्रम हुआ तो लेखिका अमृता प्रीतम को भी बुलाया गया जो साहित्य के लिए नाम कमा चुकी थी.
हो ची मिन्ह की छवि उस नेता की थी जिन्होंने अमरीका तक को धूल चटाई थी. 1958 की उस शाम दोनों की मुलाक़ात हुई.हो ची मिन्ह ने अमृता का माथा चूमते हुए कहा, “हम दोनों सिपाही हैं. तुम कलम से लड़ती हो, मैं तलवार से लड़ता हूँ.”
हो ची मिन्ह की इस बात में कोई शक़ नहीं कि 100 बरस पहले 31 अगस्त 1919 को पाकिस्तान में जन्मी अमृता प्रीतम कलम की सिपाही थी जिन्होंने पंजाबी और हिंदी में कविताएँ और उपन्यास लिखे.
अमृता प्रीतम को 1947 में लाहौर छोड़कर भारत आना पड़ा था और बंटवारे पर लिखी उनकी कविता ‘अज्ज आखां वारिस शाह नूँ’ सरहद के दोनों ओर उजड़े लोगों की टीस को एक सा बयां करती है कि दर्द की कोई सरहद नहीं होती
इस कविता में अमृता प्रीतम कहती हैं, “जब पंजाब में एक बेटी रोई थी तो (कवि) वारिस शाह तूने उसकी दास्तान लिखी थी, हीर की दास्तान. आज तो लाखों बेटियाँ रो रही हैं, आज तुम कब्र में से बोलो ..उठो अपना पंजाब देखो जहाँ लाशें बिछी हुई हैं, चनाब दरिया में अब पानी नहीं ख़ून बहता है. हीर को ज़हर देने वाला तो एक चाचा क़ैदों था, अब तो सब चाचा क़ैदों हो गए.”
बंटवारे के दौरान अमृता प्रीतम गर्भवती थी और उन्हें सब छोड़कर 1947 में लाहौर से भारत आना पड़ा. उस समय सरहद पर हर ओर बर्बादी के मंज़र था. तब ट्रेन से लाहौर से देहरादून जाते हुए उन्होंने काग़ज़ के टुकड़े पर एक कविता लिखी.
उन्होंने उन तमाम औरतों का दर्द बयान किया था जो बंटवारे की हिंसा में मारी गईं, जिनका बलात्कार हुआ, उनके बच्चे उनकी आँखों के सामने क़त्ल कर दिए गए या उन्होंने बचने के लिए कुँओं में कूदकर जान देना बेहतर समझा.
यूँ तो अकसर अमृता प्रीतम का ज़िक्र गीतकार-शायर साहिर लुधियानवी और चित्रकार इमरोज़ से जुड़े किस्सों के लिए होता रहता है.
लेकिन इससे इतर अमृता प्रीतम की असल पहचान थी उनकी कलम से निकली वो किस्से कहानियाँ जो स्त्री मन को बेहद ख़ूबसूरती से टटोलती थीं…
अमृता प्रीतम का जन्म 31अगस्त 1919 में गुजरांवाला (पंजाब) में हुआ था। बचपन लाहौर में बीता और शिक्षा भी वहीं पर हुई। उन्होंने पंजाबी लेखन से शुरुआत की। किशोरावस्था से ही कविता, कहानी और निबंध लिखना शुरू किया। अमृता जी 11 साल की थीं, तभी इनकी मां का निधन हो गया। इसलिए घर की जिम्मेदारी भी इनके कंधों पर आ गई। यह उन विरले साहित्यकारों में से हैं, जिनका पहला संकलन 16 साल की आयु में प्रकाशित हुआ।
फिर आया 1947 का विभाजन का दौर। उन्होंने बंटवारे का दर्द सहा और इसे बहुत करीब से महसूस किया। इनकी कई कहानियों में आप इस दर्द को महसूस कर सकते हैं। विभाजन के समय इनका परिवार दिल्ली आ बसा। अब उन्होंने पंजाबी के साथ-साथ हिंदी में भी लिखना शुरू कर दिया। उनका विवाह 16 साल की उम्र में ही एक संपादक से हुआ, ये रिश्ता बचपन में ही मां-बाप ने तय कर दिया था। यह वैवाहिक जीवन भी 1960 में, तलाक के साथ टूट गया।
तलाक के बाद से अमृता ने वैवाहिक-जीवन के कड़वे अनुभवों को अपनी कहानियों और कविताओं के ज़रिए बयां करना शुरू किया। इससे उनकी रचनाएं धीरे-धीरे नारीवाद की ओर रुख करने लगीं। अमृता प्रीतम के लेखन में नारीवाद और मानवतावाद दो मुख्य विषय रहे है, जिसके जरिए उन्होंने समाज को यथार्थ से रू-ब-रू करवाने का सार्थक प्रयास किया।
हिंदी-पंजाबी लेखन में स्पष्टवादिता और विभाजन के दर्द को एक नए मुकाम पर ले जाने वाली अमृता प्रीतम ने समकालीन महिला साहित्यकारों के बीच अलग जगह बनाई। अमृता जी ने ऐसे समय में लेखनी में स्पष्टवादिता दिखाई, जब महिलाओं के लिए समाज के हर क्षेत्र में खुलापन एक तरह से वर्जित था। एक बार जब दूरदर्शन वालों ने उनके साहिर और इमरोज़ से रिश्ते के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, दुनिया में रिश्ता एक ही होता है-तड़प का, विरह की हिचकी का, और शहनाई का, जो विरह की हिचकी में भी सुनाई देती है – यही रिश्ता साहिर से भी था, इमरोज़ से भी है……।
लिव-इन की जिस परिपाटी को आज हम फलता फूलता पा रहे हैं, अमृता ने इसकी नींव 1966 में ही रख दी थी. तब उनकी जगहंसाई तो होनी ही थी, पर इससे उनके रिश्ते पर कभी न कोई फर्क आना था न आया. और न ही उनकी जिंदगी पर इसका कभी कोई असर रहा. साहिर और इमरोज से अपने रिश्ते को बयान करती हुई अमृता कहती हैं – ‘साहिर मेरी जिन्दगी के लिए आसमान हैं, और इमरोज मेरे घर की छत.’ इमरोज से बेपनाह प्यार के बावजूद भी वे अगर साहिर से अपने प्यार को भूल नहीं सकीं तो बस इसलिए कि स्त्रियां अपने हिस्से के सुख-दुख को कभी विदा नहीं करतीं. एक यह भी कारण हो सकता है कि अपने लाख बगावती तेवर के बावजूद वे अपनी पहली शादी से मिले पति के नाम प्रीतम, यानी प्रीतम कौर के प्रीतम को जिन्दगी भर साथ लेकर चलती रहीं.
अमृता जी की बेबाकी ने उन्हें अन्य महिला-लेखिकाओं से अलग पहचान दिलाई। जिस जमाने में महिलाओं में बेबाकी कम थी, उस समय उन्¬होंने स्पष्टवादिता दिखाई। यह किसी आश्चर्य से कम नहीं था।
अपनी आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ की भूमिका में अमृता प्रीतम लिखती हैं – ‘मेरी सारी रचनाएं, क्या कविता, क्या कहानी, क्या उपन्यास, सब एक नाजायज बच्चे की तरह हैं. मेरी दुनिया की हकीकत ने मेरे मन के सपने से इश्क किया और उसके वर्जित मेल से ये रचनाएं पैदा हुईं. एक नाजायज बच्चे की किस्मत इनकी किस्मत है और इन्होंने सारी उम्र साहित्यिक समाज के माथे के बल भुगते हैं.’ अपनी रचनाओं का यह परिचय न सिर्फ अमृता प्रीतम के विद्रोही तेवर को बताता है, बल्कि साहित्यिक समाज के लिए उनके विक्षोभ और दुख को भी दिखाता है. हालांकि यह सच अमृता के हिस्से का सच होते हुए भी कुछ मायने में अंशतः ही सच है. यह ठीक है कि उनके बगावती तेवर उन्हें हमेशा मुश्किल में डालते रहे. अपनी मातृभाषा में उन्हें तब वह मनोवांछित सम्मान भी नहीं मिल रहा था पर अनुवादों के ज़रिये अमृता तब की एक ऐसी अकेली लेखिका ठहरती हैं जिनके प्रशंसक देश-विदेश में फैले हुए थे.
पितृसत्तात्मक समाज में, परिवार के पुरुष सदस्यों पर महिलाओं की आर्थिक-निर्भरता होती है, जिसकी वजह से वे अपने वजूद को पुरुषों के तले सीमित मानती थीं। अमृता प्रीतम ने समाज की नब्ज को कुशलता से पकड़ा और अपनी रचनाओं के जरिए उस जमी-जमाई सत्ता पर सेंध मारते हुए महिलाओं के मुद्दों को सामने रखा। जिन्हें हम उनकी किताब- पिंजर, तीसरी औरत और तेरहवें सूरज जैसी रचनाओं में साफ देख सकते है।
अमृता में सामाजिक वर्जनाओं के विरूद्ध जो भावना थी, वह बचपन से ही उपजने लगी थीं। जैसा वे स्वयं लिखती हैं – सबसे पहला विद्रोह मैने नानी के राज में किया था। देखा करती थी कि रसोई की एक परछत्ती पर तीन गिलास, अन्य बर्तनों से हटाए हुए, सदा एक कोने में पड़े रहते थे। ये गिलास सिर्फ तब परछत्ती से उतारे जाते थे, जब पिताजी के मुसलिम दोस्त आते थे और उन्हें चाय या लस्सी पिलानी होती थी और उसके बाद मांज-धोकर फिर वहीं रख दिए जाते थे।
अपनी शर्तों पर जीना आज के जमाने में कई लड़कियों के लिए महज सपना ही है लेकिन 20 वीं सदी में एक ऐसी साहसी साहित्यकार थी जिन्होंने उस जमाने में भी अपनी शर्तों पर जिंदगी गुजारी। हम बात कर रहे हैं अमृता प्रीतम की, उन्होंने अपनी कविता संग्रह, कहानी, आत्मकथा और निबंध मिलाकर 100 से ज्यादा किताबें लिखी हैं। आज उन्हीं अमृता प्रीतम का जन्मदिन है।

