Fri. Oct 23rd, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

जनकपुर प्रकरण : मधेश या मधेशियाें के लिए प्रहरी का संयम क्याें टूट जाता है ?: श्वेता दीप्ति

 

डा श्वेता दीप्ति । एक ओर जहाँ नेपाल पुलिस अपने ‘प्रहरी मेराे मित्र’ अभियान को बढ़ावा दे रही है, वहीं बार बार मधेसी व्यक्ति के साथ छेड़छाड़ करने वाले कई पुलिस कर्मियों के वीडियो साेशल नेटवर्क पर सामने आते रहे हैं, चाहे राजधानी की सडकाें पर फूटपाथ पर फलफूल विक्रेता की बात हाे गाेलगप्पे वाले के खाेमचे काे ताेडने या फेकने की बात हाे प्रहरी की ज्यादती की बात सामने आती रही है । देखने वाली बात यह हाेती है कि पीडित प्रायः मधेशी मूल के हाेते हैं जिसकी वजह से विभेद और मनमानी का सवाल उठता रहा है । बार बार प्रहरी का कार्य ही कटघरे में उसे खडा करता है । आखिर मधेशी ही क्याें ? कुछ दिनाें पहले सरलाही में प्रदर्शन कर रहे मधेशियाें पर हवाई फायर की गई परन्तु ये हवाई फायर मधेशियाें के लिए ऐसी हाेती है जिसमें सीधे उनकी जान जाती है । पर आश्चर्य ताे यह है कि काठमान्डाै के सडकाें पर हुए समूह पर प्रहरी ऐसा नही करते अभी रवि लामिछाने प्रकरण में भी प्रहरी का धैर्य सराहनीय था । पर यही धैर्य मधेशियाें के लिए नही हाेता यह कई बार जाहिर हाे चुका है ।

हाल में हुई जनकपुर की घटना एक बार फिर जाेरशाेर से चर्चा में है । जहाँ नारियल बेचने वाले काे प्रहरी ने पीटा और इस प्रकरण का जब वीडीयाे सामने आया ताे वीडियाे बनाने वाले के साथ भी जबरदस्ती और हाथापाई की गई ।

यह भी पढें   बाजुरा के अमकोट भूस्खलन नियंत्रण और सड़क सुधार के लिए 52 करोड़ 31 लाख रुपये का बजट आवंटित

वीडियो को फिल्माए जाने वाले पत्रकार घनश्याम मिश्रा के अनुसार, जनकपुर के जानकी मंदिर में जानकी पुलिस स्टेशन में बुलाने के बाद पुलिस ने एक सामाजिक प्रचारक सुशील कर्ण को पकड़ लिया। कर्ण ने पहले मंदिर परिसर की सफाई करते समय एक नारियल विक्रेता की पिटाई करने के लिए पुलिस कर्मियों का सामना किया था। मिश्रा ने कहा कि पुलिस ने तब उसे खुद को पुलिस स्टेशन में पेश करने के लिए कहा था। जब मिश्रा थाने पहुंचे, तो पुलिस कर्मी और कर्ण में गरमागरमी हाे रही थी, जब अचानक एक अधिकारी ने कर्ण को थप्पड़ मार दिया। स्थिति बिगडने लग गई और मिश्रा ने वीडियो रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया।

वीडियो में, पुलिस कर्मियों के एक समूह को कर्ण पर धक्का देते और खींचते हुए देखा जा सकता है, जबकि उसके दोस्त उसे पुलिस से बचाने का प्रयास करते हैं। मिश्रा और सिंह ने पुलिस अधीक्षक शेखर खनाल और मुख्य जिला अधिकारी प्रदीप राज कांडेल को बुलाकर पुलिस को अधिकारी, पर्यटक पुलिस सहायक उप-निरीक्षक बीरेंद्र यादव को जिला पुलिस कार्यालय में वापस बुलाने के लिए कहा। यादव को कर्ण से माफी मांगने को कहा गया।

यह घटना तराई में पुलिस की ज्यादती का मात्र एक उदाहरण है, जिसकी मानवाधिकार संगठनों द्वारा बार-बार आलोचना की गई है। हाल ही में देश भर की विभिन्न जेलों में किए गए एक अध्ययन के अनुसार, तराई में जातीय समुदायों के बंदियों पर पुलिस के हाथों अधिक अत्याचार और दुर्व्यवहार की घटना देखी जा रही है।

यह भी पढें   सुपर टाइफून चांपी ने मौसम वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ाई, 296 किमी/घंटे की रफ्तार, प्रलय बना चांपी

पिछले साल अगस्त में राम मनोहर यादव को उपप्रधान उपेंद्र यादव के विरोध में काले झंडे दिखाने के आरोप में बर्दिया के गुलरिया से गिरफ्तार किया गया था। दस दिन बाद, यादव के परिवार को बताया गया कि पुलिस हिरासत में उनकी मृत्यु हो गई है। जब पुलिस ने यह सुनिश्चित किया कि यादव की पहले से मौजूद स्वास्थ्य की स्थिति थी, जिसके कारण उनकी मृत्यु हो गई, उनके परिवार, दोस्तों और अधिकार कार्यकर्ताओं ने जेल में बदसलूकी का आरोप लगाया। यादव की पत्नी सुनीता ने आरोप लगाया है कि उनके पति को मौत के घाट उतार दिया गया। शव परीक्षण रिपोर्ट को कभी सार्वजनिक नहीं किया गया।

इन उदाहरणों से पुलिस के खिलाफ आलोचनाओं का एक व्यापक प्रसार हुआ है, अधिकारियों को बेहतर व्यवहार का आश्वासन देने के लिए प्रेरित किया गया है। किन्तु हाल हुऐ इस घटना से नही लगता कि प्रहरी संयमित हाे रहे हैं ।

लाेग डर रहे हैं और प्रहरी से विश्वास उठ रहा है । हालाँकि अभी यह भी चर्चा में है कि इन हालाताें में विडियाे बनाने या फाेटाे खींतने की इजाजत कानून देता है या नहीं । पर जब कानून के हाथाें ही कानून की धज्जियाँ उडाई जाएगी ताे तकनीकि की दुनिया में जनता चुप या अंधी ताे नहीं बन सकती । सार्वजनिक जगहाें पर अगर दुर्व्यवहार या ज्यादती हाेगी ताे आज के समय में जब हर जेब में माेबाइल है ताे घटना छुप नही सकती ।

यह भी पढें   बाढ़ और भूस्खलन से बेनी–जोमसोम–कोरला सड़क को भारी नुकसान, पुनर्निर्माण के लिए 3 से 4 अरब रुपये की जरूरत

जानकाराें के  अनुसार कतिपय अवस्था में तसवीर लेने या वीडियाे बनाने पर प्रतिबन्ध है । मुलुकी अपराध (संहिता) ऐन, २०७४ के दफा २९३ अनुसार दट्ठरे की बात सुनने या रिकार्डिंग करना अपराध है ।

दफा २९३ के उपदफा-१ के अनुसार, “किसी एक या एक से अधिक व्यक्तियाें के बीच में हुई किसी भी बातचीत काे अधिकारप्राप्त अधिकारी की अनुमति के बिना या बातचीत करने वाले की अनुमति के बिना किसी यान्त्रिक उपकरण का प्रयोग अवैधानिक है  ।”

किन्तु सार्वजनिक रूप में दिए गए भाषण या वक्तव्य के हक में उक्त दफा लागु नहीं हाेता है ।

व्यक्तिगत गोपनीयता हनन हाेने की स्थिति में  दाे वर्ष की कैद वा २० हजार रुपैया जुरमाना की सजा निर्धारित है ।

इसी तरह मुलुकी अपराध संहिता के दफा २९५ अनुसार अनुमति के बिना किसी व्यक्ति की तसवीर लेना या बिगाडना अपराध माना गया है । किन्तु जनकपुर की घटना में यह सब दफा लागू नही हाेता है ।

हालाँकि सम्बन्धित प्रहरी पर कार्यवाही की गई है फिर भी यह ताे चिंता का विषय अवश्य है कि अगर कानून के हाथाें ही बार बार ऐसी घटना हाेगी ताे आम जनता किस पर यकीन कर सकती है । आखिर किसी समुदाय विशेष के लिए धैर्य क्याें नहीं हाेता ?

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com