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वाणी का संयम सुखी जीवन का मूलाधार है

हिमालिनी  अंक जुलाई २०१९ | संयत व्यवहार रेशम की एक ऐसी डोरी है, जो सभी कल्याणमयी भावनाओं को एक लड़ी के रूप में आबद्ध करती है । मानव जीवन की सफलता संयत व्यवहार में ही निहित है । लक्ष्य या किसी निश्चित उद्देश्य को लेकर अग्रसर होनेवाले मनुष्य का जीवन बोली वाणी से ही संयत और सुखी होता है ।

१. मत बोलो– यदि आप मीठा नहीं बोल सकते ।
२. मत सुनो– यदि आप अपनी एवं अपनों की बुराई, आलोचना नहीं सुन सकते ।
३. मत देखो– यदि आप अच्छा एवं कटु सत्य नहीं देख सकते ।
४. मत सोचो– यदि आप अच्छा एवं भला एवं अच्छा नहीं सोच सकते ।

५. यथासम्भव मौन रहिए– अवश्य होने पर ही न्युनतम मीठे शब्दों में अपने भाव व्यक्त कीजिए और वह भी सामने वाले की मनोदशा देख एवं समझकर । वृद्धावस्था में आपके प्रत्येक शब्द, भाव का बहुधा विपरीतार्थ लिया जाता है । वाणी का संयम सुखी जीवन का मूलाधार है ।

६. आदेशात्मक भाषा से सदैव ही बचिए । मांगने की प्रवृत्ति का यथासम्भव ही नहीं, वरन पूर्णतः त्याग करिए । अपनी देह एवं स्वास्थ्य का दायित्व उस परमपिता पर छोड़ दीजिए, वह आप की अपरिहार्य आवश्यकताओं की आपूर्ति अवश्य होगा ।

७. जब मिले, जैसा मिले और जितना मिले, बिना किसी प्रकार की आलोचना के ईश्वर का प्रसाद मानकर ग्रहण कर लेना चाहिए भोजन में किसी प्रकार का खोट न निकालना चाहिए । घृणित दृष्टि से अमृत भी विष बन जाता है ।

८. अपना एवं अपने क्रिया–कलापों का परिवार के सदस्यों पर न्यूनतम भार डालने का प्रयास कीजिए । अपनी आवश्यकताओं को घटाते रहिए, फिर देखिए घर में भी आप को वैराग्यमय जीवन का आनन्दपयोग प्राप्त होगा ।

९. उपेक्षा तथा अपमान, इन दोनों स्थितियों में यथासम्भव कोई प्रतिक्रिया मत कीजिए । मान–सम्मान जितना मिलना था, मिल गया, अब तो देहाभियान से रहित होने का समय आ गया है, इसीलिए अस्मिता बोध का परित्याग कर उस परम प्रभु की शरण ग्रहण कीजिए, जिसने आपको यहां तक पहुँचा दिया है । भजन एवं नाम जप सब प्रकार के दुःख से छुटकारा पाने का एक मात्र उपाय है ।

१०. प्रेम देकर प्रेम, शान्ति देकर शान्ति एवं मान देकर मान ले । घृणा देकर घृणा की ओर न बढ़े ।

११. अपने भीतर झाँकिए । स्वदोष देखकर उनसे यथाशीघ्र छुटकारा पा लीजिए । दूसरों का दोष दर्शन सबसे बड़ा पाप है । अपने पर इसका भार न लादिए । दूसरों में दोष देखने पर वे दोष अपने अन्दर आ जाते है, अतः दैनिक बहुत सावधान रहने की आवश्यकता है ।

१२. यथासम्भव अपने दैनिक क्रिया–कलाप में नियमितता का अनुपालन कीजिए । शक्ति के अनुसार प्रातः भ्रमण अवश्य करिए । सामथ्र्य के अनुसार प्रणायाम एवं सुक्ष्म व्यायाम आप को चुस्त एवं दुरुस्त रखने में बड़ा भारी योगदान देगा ।

१३. दृढ इच्छा शक्ति एवं सकारात्मक सोच से शारीरिक मानसिक एवं भौतिक रोगों पर विजय प्राप्त कीजिए ।

१४. मन की एकाग्रता के लिए गहरा श्वास लेते हुए उसके साथ अपने इष्ट का मन्त्र जप कीजिए । इष्ट अथवा इच्छा विग्रह का मानसिक दर्शन करते हुए हरिनाम जपिए । हरिनाम से बड़ा और कोई सहारा नहीं है ।

१५. श्री मद्भागवत गीता के बारहवें अध्याय के श्लोक संख्या तेरह–चौदह का मनन कीजिए और उसे अपने जीवन में उतारने की चेष्टा कीजिए परम शान्ति प्राप्त होगी ।

१६. निजी सामथ्र्य एवं शक्ति के अनुसार सेवा अवश्य कीजिए, जो भी कार्य करें, उसे परमपिता की सेवा मानकर उसी को समर्पित कर दीजिए । कर्तव्य बुद्धि से किया गया अपना देह संबंधी प्रत्येक कार्य भी उस परम प्रभु की सेवा ही है । सेवा ही परमो धर्म ।

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