Fri. Oct 4th, 2019

चीन की चिन्ता : रणधीर चौधरी

चीन की सर्बसत्तावाद की नीति से नेपाल को बचाए

हिमालिनी  अंक अगस्त , अगस्त 2019 |नेपाल एक ऐसा देश है जहाँ विभिन्न देशों के अनेकों पैमाने निर्धारण किए जाते हैं मिडिया के द्वारा । अगर नेपाल मे कोई भारतीय हाई प्रोफाइल व्यक्तित्व आ जाए तो नेपाल की मीडिया आमजनता से जुड़ी वेदनाओं के ऊपर बनने वाले समाचार को भी छोड़ देते हंै और भारतीय आगन्तुक के पीछे दौड़ पड़ते हैं । अगर समाचार लायक कुछ सामग्री ना मिले तो स्रोत का हवाला दे कर मनगढ़न्त कहानियाँ भी लिखते हैं । कहीं पर किसी भारतीय नेता, कर्मचारी, या कोई और भी कुछ मन्तव्य देते हैं तो मीडिया उनके मन्तव्य में विवादित कोण तलाश करने से पीछे नहीं हटते । अगर भारत नेपाल मे कुछ आर्थिक निवेश करे या किसी राजनीतिक दल के नेता से कोई भारतीय कूटनितिज्ञ दो बातें कर लें तो नेपाली मीडिया बारीकी से उस चीज का अध्ययन करते हंै । स्टोरी बनाते हैं और उनका अथक प्रयास रहता है कि कैसे कुछ नकारात्मक समाचार बजार में बेचा जाए । परंतु दूसरे देश के साथ ऐसा व्यवहार नहीं देखा जाता है । पर्वते समुदाय के नेता को तो चलो राजनीति की रोटी सेकने के लिए भारत को गाली देने की भद्दी आदत हो चुकी है परंतु स्वतन्त्र कहे जाने वाली मीडिया को क्या हो जाता है, यह शोध का बिषय हो सकता है !

चीन का निवेश नेपाल में बढ़ता जा रहा है । यह नेपाल के विकास मे सहयोगी भूमिका माना जा सकता है । परंतु चीन द्वारा किए जाने वाली कन्सट्रक्सन कार्यों की गुणवत्ता पर किसी की नजर नहीं होती है । चीन का एकल महत्वकांक्षी परियोजना बेल्ट रोड इनिसिएटिव में नेपाल ने हस्ताक्षर कर दिया । परंतु इस विषय पर नेपाल मे यथेष्ठ बहस ही नहीं किया गया यह मानना है यहाँ के बौद्धिक वर्गों का । परंतु मीडिया की नजर में बेल्ट रोड इनिसिएटिव मे हस्ताक्षर करना इस लिए बेहतर माना गया क्योंकि भारत इस परियोजना के पक्षधर नही है । यह कैसी भावना है मीडिया की ?

बात करें कुछ महीने पहले समाजवादी पार्टी के नेता माननीय प्रदिप कुमार यादव की । स्वतन्त्र तिब्बत से जुड़े विवादित कार्यक्रम मे भाग लेने के आरोप मे पैंतालिस दिन बाद समाजवादी पार्टी ने अपने सांसद प्रदिप यादव को छ महीने के लिए बरखास्त करने का फैसला किया था । पार्टी का आरोप था कि यादव ने पार्टी में बिना आन्तरिक जानकारी कराते हुए स्वतन्त्र तिब्बत वाले कार्यक्रम में युरोप में अपनी सहभागिता दर्ज कराई थी । यादव को आरोपित करने के बाद उन्होंने मीडिया में कहा था कि आयोजकों ने कार्यक्रम के बारे में विस्तृत जानकारी नही कराया था । परंतु कार्यक्रम मे भाग लेने के बाद जब उन्हें पता चला कि विवादित तिब्बत के मुद्दाें पर यह कार्यक्रम है तो यादव कार्यक्रम में बिना कुछ बोले और अपनी उपस्थिति के बारे में कोई हस्ताक्षर बिना किए कार्यक्रम से बाहर निकल गए थे । उन्होंने पार्टी मे अपनी माफी भी दर्ज करवायी थी, मीडिया में आए समाचार के अनुसार । परंतु उनकी किसी ने नहीं सुनी और उन पर कारबाही की गयी । गौरतलब है कि किसी भी पार्टी में आन्तरिक अनुशासन होना उचित बात है । परंतु जब कार्यकर्ता ने कोई बड़ा गुनाह न किया हो और माफी मांग ले तो उन्हें कोई कठोर दण्ड देना उचित नहीं होता । और वो भी प्रदिप यादव जैसे पार्टी के योद्धा को जिन्हाेंने मधेश आन्दोलन को एक नई उँचाई ही नहीं दिलायी थी बल्कि मध्य तराई में तत्कालीन संघीय समाजवादी पार्टी नेपाल को संगाठनिक हिसाब से एक अच्छा मजबूती भी प्रदान करवाया था । मधेश आन्दोलन के अच्छे योद्धा के रूप में अपने व्यक्तित्व को स्थापित करवाने में सफल यादव पर क्या बीत रहा होगा वो उन्हें ही पता होगा ।

अब बात करें इन मुद्दों के बीच छिपी चीनी प्रभाव की । कहा जाता है के चीन के दवाब में समाजवादी पार्टी ने यादव को दण्डित करने जैसी कठोर नीति का फैसला लिया है । चीन के लिए तिब्बत सरदर्द ही नहीं अपितु क्यान्सर है । जिस के कारण चीन को सदैव डर रहता है कि तिब्बत मुद्दा से अगर कब्जा फीका पड़ा तो चीन अस्थिर हो सकता है । भारत हो या सात समुन्द्र पार के देश, चीन तिब्बत के मसले पर किसी की नहीं सुनता है । चीन का यह मानना है कि अगर नेपाल जैसे कमजोर देश के सांसद भी तिब्बत जैसे विवादित मुद्दाें मे संलग्न होते हैं तो शक्तिशाली देशाें का मनोबल बढ़ेगा । कल के दिन में नेपाल के दूसरे नेता भी इस मामले में सक्रिय हो सकते हंै । तो क्यों न यादव को दण्डित कर एक संदेश फैलाया जाय कि अगर चीन के विरुद्ध कोई भी हरकत होती है तो उन्हें परहेज नही । परंतु चीन की इस आन्तरिक दवाव को ले कर नेपाली मीडिया का रहस्यमय मौन देखने लायक है । अगर कुछ ऐसा ही भारत की ओर से होता तो अभी नेपाली मीडिया की बैचेनी देखने लायक होती । पर क्या किया जाय बात तो यहाँ भारत विरोधी होने का है, राष्ट्रवादियों के लिए ।
किस्सा यही नहीं थमता है । कुछ ही महीना पहले नेपाल सरकार ने प्रदेश नम्बर २ के महोत्तरी जिले मे एक चीनी कम्पनी को २२ सौ बिग्घा जमीन देने जा रही थी और यह चर्चा मीडिया के लिए उतना अहम् नहीं बन पाया । स्थानीय सरकार से एक चरण का सम्झौता भी हो के फिर रद् हो चुका था । फिर इस परियोजना ने तुल पकड़ा था, संघीय सरकार के द्वारा ।

कहा जाता है कि बेल्ट रोड इनिसिएटिभ परियोजना के अन्तर्गत नेपाल के प्रदेश २ के महोत्तरी जिला स्थित गौशाला नगरपालिका के वडा नं । ८ मे हाइटेक औद्योगिक पार्क निर्माण के लिए दो पक्षीय समझौता भी हो हुआ था । यह कैसै सम्भव हुआ ? किसी भी विदेशी कम्पनी के साथ समझौता करने का अधिकार स्थानीय सरकार को नेपाल के संविधान ने प्रदान किया ही नहीं है । यह संघीय सरकार के क्षेत्राधिकार के अन्र्तगत आने वाले विषय हैं । विदेशी कम्पनी या लगानी कर्ता को स्थानीय सरकार के क्षेत्राधिकार के भीतर पड़ने वाली किसी भी प्रकार की जमीन प्रयोग करने देने का अधिकार होता ही नही है । विशेष परिस्थिति में प्रदेश वा संघीय स्वीकृति ले कर ही यह काम किया जा सकता है । नेपाल में अभी तक स्थानीय सरकार को कानून के आधार पर विदेशी के साथ सम्झौता करने का अधिकार नहीं दिया गया है । परंतु चीन के लिए कुछ भी मुमकिन माना जाता है । उनका विश्वास है कि नेपाल जैसे देश मे कानून कुछ मायने नहीं रखता । जिस देश में शासक भीतरी रूप से भारत विरोधी हो उस देश मे थोड़ा बहुत दाम दे कर नेता, कर्मचारी और मीडिया को अपने काबु में रख कर किसी भी परियोजना को आगे बढ़ाया जा सकता है । व्यवहारिक तौर पर देखा जाय तो यह एक कठोर सत्य है । सामरिक स्वार्थ का उर्वर स्थल रहे नेपाल के उत्तरी भाग मे अपना वर्चस्व जमाने मे सफल चीन आसानी से देश के दक्षिणी भाग में भी उद्योग के नाम पर अपना दबदबा बनाने में तल्लीन है । हालाँकि किसी भी देश में उद्योग धन्दा संचालन होना देश के लिए एक वरदान के रूप में माना जाना चाहिए । परंतु जब बात विकास कम और बदनियत ज्यादा दिखाई देने लगे तो हमे सचेत रहना अति आवश्यक हो जाता है ।

नेपाली मीडिया और यहाँ के कथित राष्ट्रवादियों की बैचेनी तब देखने को मिली थी जब भारत के गुप्तचर विभाग रिसर्च एण्ड एनालायसिस विंग (रअ) के प्रमुख सामन्त गोयल नेपाल आए थे । उनके आने पर मानो नेपाल का राजनीतिक पटल डगमगा सा गया था मीडिया की नजर में । परंतु उन्हें यह सोचना चाहिए था कि रअ या किसी भी खुपिया एजेन्सी का यह काम है । शायद भारत ही ऐसा देश है जो कि अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक करता होगा कि भारत के रअ प्रमुख नेपाल मे कौन है । क्या क्षेत्राधिकार है उनका । रअ को जभी भी संदिग्ध नजर से देखने से लगता है कि चीन या अन्य देश का गुप्तचर विभाग की उपस्थिति ही नहीं है नेपाल में ? मीडिया को तो अपनी उर्जा उन देशाें पर लगाना चाहिए जो अपने खुफिया एजेन्सी के बारे में आम नेपाली को सुचित न करता हो । जबकि दुनिया भर की एजेन्सी का स्वर्ग भूमि है नेपाल । साउथ एसिया को कन्ट्रोल में रखने के लिए नेपाल एक असल अखाड़ा के रूप में प्रयोग किया जा रहा है । परंतु नेपाली मीडिया के नजर मे रअ के सिवा नेपाल मे किसी की उपस्थिति ही नहीं है । ऐसी मानसिकता के कारण ही तो नेपाल भारत रिश्तों पर अक्सर असर पड़ता दिखाई देता है ।

समय अभी भी हाथ से निकला नहीं है । नेपाली मिडिया को आवश्यकता है भारत के अलावा भी सोचे और नेपाल मे बढ़ रही अनावश्यक चीन की अग्रसरताको ‘अंडर स्क्रुटनी’ रखे । और चीन की सर्बसत्तावाद की नीति से नेपाल को बचाए ।

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