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पन्द्रह दिनों तक चलेगा पितृपक्ष   

 

माला मिश्रा बिराटनगर । आश्विन मास कृष्णपक्ष महालया अर्थात पितृपक्ष के नाम से जाने जाते हैं। इस बारे में आचार्य पंडित धमेंद्र नाथ मिश्र ने बताया कि सूर्य मेष से कन्या की संक्रान्ति तक उत्तरायण और तुला राशि तक दक्षिणायन रहता है। इस दौरान शीत ऋतु का आगमन प्रारंभ हो जाता है। कन्या राशि शीतल राशि है।इस राशि के शीतलता के कारण चन्द्रमा पर रहेने वाले  पितरों के लिए यह अनुकूल समय होता है। यह समय आश्विन मास के कृष्णपक्ष के नाम से जाने जाते है। इस पक्ष में पितरगण अपनी भोजन एवं शीतलता की खोज में पृथ्वी तक आजाते हैं।इसलिए ऐसे समय पर अधिकारी मनुष्य पूर्ण श्रद्धा पूर्वक तर्पण श्राद्ध कर्म सम्पन्न करें।क्योंकि पिता के जिस शुक्राणु के साथ जीव माता के गर्भ में जाता है।उसमें 84 अंश होते हैं।जिसमें 28 अंश तो शुक्रधारी पुरुष के स्वयं के भोजनादि से उपार्जित होते हैं।और 56 अंश पूर्व पुरुषों के रहते हैं। उनमेंसे 21 अंश उनके पिता के 15अंश पितामह यानि दादा के 10 अंश परमपितामह यानि परदादा के 6 अंश चतुर्थ पुरुष के 3 अंश पंचम पुरुष के और एक षस्ठ पुरुष के होते हैं। इस तरह सात पिढियों तक वंश के सभी पूर्वजों के रक्त की एकता रहती है।अत: पिंडदान मुख्यतः तीन पिढियों तक के पितरों को ही पिंडदान किया जाता है। पितरों के ऋण उतारने के लिए पितर पक्ष में श्रद्ध कर्म  तर्पण करना हमारा परम क्रर्त्तव्य है।

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नोट

तिल, जल लेकर अपने पितरों को पिंड दान करने से पितर खुश होकर अपने की रक्षा करते हुए शुभाशीर्वाद देकर अपने लोक को लोट जाते हैं।और जो लोग पितर पक्ष में अपने पूर्वजों का तर्पण नहीं करते हैं।उन पर पितर कुपित होकर उन्हें श्राप देकर चले जाते हैं। यह पितृपक्ष 14 सिंतबर से लेकर 28 सिंतबर तक चलेगी। इस बीच कोई भी दिन अपने पितरों को पिंडदान किया जा सकता है।

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