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आरक्षण का अपहरण : अंशु झा

 

अगर यह आरक्षण की नीति इमानदारीपूर्वक कार्यान्वयन नहीं हुयी तो उत्पीडि़त वर्ग में देश प्रति वितृष्णा पैदा होगी । वह अपने आपको अपने ही राष्ट्र से अलग महसूस करेगा । देश फिर से द्वंद में जा सकता है 

हिमालिनी  अंक अगस्त , अगस्त 2019 आरक्षण का सामान्य अर्थ है पिछड़े हुये समुदाय को थोड़ी सी राहत देकर आगे की ओर बढ़ने के लिये प्रेरित करना । अर्थात् जो समुदाय विगत कई वर्षों से विभेद, हिंसा तथा अन्याय से उत्पीडि़त हैं उन समुदायों को कुछ अवसर देकर उसे भी देश के अन्य नागरिकों के बराबरी में लाना । या यों कह सकते हैं कि एक छोटा सा लालीपाप का प्रलोभन देकर उसमें भी उत्साह का संचार करना, उसमें भी आत्मबल बढ़ाना । क्योंकि वह पिछड़ा समुदाय भी राज्य का ही नागरिक होता है । यह आरक्षण नीति की आवश्यक्ता इसलिये ताकि उस उत्पीडि़त समुदाय के साथ भी अपनत्व की सृजना हो सके ।

 

आरक्षण की शुरुआत सर्वप्रथम सन् १८५१ में अमेरिका के ओक्लहोमा राज्य में रेड इन्डियन के लिये किया गया था । तत्पश्चात भारत में भी पिछडेÞ हुये वर्गों के लिये आरक्षण का पहल सन् १८८२ से होते हुये सन् १९०२ में लागु किया गया था । तत्कालीन ब्रिटिस सरकार ने मुस्लिमों और अछुतों के लिये (कम्युनल अवार्ड एक्ट )स्वशासन के अधिकार के साथ एक अलग प्रकार का प्रावधान लाया था । डा. भीमराव अम्बेडकर इस प्रावधान के पक्ष में आगे बढ़े । परन्तु महात्मा गांधी उनके इस प्रावधान के विरुद्ध में आमरण अनसन पर बैठ गये । उनके जीवन के रक्षार्थ सन् १९३२ में (पुना प्याक्ट ) हुआ । जिसके तहत आरक्षण को आगे बढ़ाने में सहमति हुयी । सन् १९४७ में भारत जब स्वतन्त्र हुआ तो संविधान के रचयिता तथा संवैधानिक समिति के सभापति अम्बेडकर द्वारा सन् १९५० में संविधान जारी किया गया । जिसमें उन्होंने दलित के लिये १५ प्रतिशत और आदिवासी कविलों के लिये ७.५ प्रतिशत आरक्षण का व्यवस्था करने में सफल हुये ।

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अब आते हैं नेपाल के आरक्षण के विषय पर । तो सबसे पहले मन में यह प्रश्न उठता है कि आखिर नेपाल आरक्षण शब्द से कब परिचित हुआ ? जी हां नेपाल में आरक्षण भारत से छ दशक बाद में आया । इसके लिये नेपाली जनता को अथक संघर्ष करना पड़ा । नेपाल में आरक्षण व्यवस्था के लिये उत्पीडि़त समुदायों के द्वारा किया गया संघर्ष का बहुत बड़ा योगदान है । विभिन्न जातीय, लैंगिक संगठन तथा नागरिक दबाब समूह ने आरक्षण की मांग की । १० वर्ष के माओवादी जनयुद्ध, १९ दिन के जनआंदोलन में उत्पीडि़त समुदाय ने अपना अभूतपूर्व बलिदान दिया । क्योंकि माओवादी का जो जनयुद्ध के समय का नारा था उसमें आरक्षण भी पड़ता था । उनलोगों की मांग यह थी कि पुराने राज्य व्यवस्था से दलित, महिला, जनजाति, मधेशी के साथ जो विभेद व बहिष्करण हुआ है, उसे आरक्षण के द्वारा समावेशी सुनिश्चित किया जाय । इसी के आधार में नेपाल में वि. सं । २०६४ में आरक्षण की नीति सफल हो पायी । और सभी निकायों में इसे लागु किया गया । पिछडेÞ हुये वर्ग में नई आश जगी और मनोबल बढ़ा । आरक्षण की नीति जब देश में लागु किया गया तो देश में समावेशिता की तस्वीर आंशिक रूप से दिखने लगी । अवसर मिलने के बाद महिला, जनजाति, मधेशी इत्यादि भी विभिन्न निकायों के उच्च पदों पर भी नजर आने लगे । राज्य संचालन करने के स्थान पर अपने जाति, लिंग तथा समुदाय को देखकर सम्बन्धित सेवाग्राही में प्रसन्नता आई तथा मनोबल बढ़ा । तो इससे स्वाभाविक है कि उनलोगों को राज्य प्रति अपनत्व का बोध होना ।

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निजामति सेवा ऐन, २०४९ के दूसरे संशोधन के अनुसार आरक्षण के लिये ४५ प्रतिशत सीट सुरक्षित की गयी है । जिसमें महिला ३३ प्रतिशत, जनजाति २७ प्रतिशत, मधेशी २२ प्रतिशत, दलित ९ प्रतिशत, अपंग ५ प्रतिशत और पिछडेÞ वर्ग के लिये ४ प्रतिशत करके कोटा दिया गया । परन्तु वही कोटा छीना जा रहा है ।

बिडम्बना तो यह है कि जो कल कह रहा था कि हमें आरक्षण नहीं विशेषाधिकार चाहिये वही आज सत्ता में आकर आरक्षण भी छीन रहा है । १० वर्ष आन्दोलन के समय यही नारा लगाते हुये घूम रहा था, उत्पीडि़तों को बहला रहा था कि हमें वह सब अधिकार मिलेगा जिसके हम हकदार हैं । परन्तु कम्युनिस्ट सरकार के कार्यकाल में ही आरक्षण के साथ छेड़ छाड़ की जा रही है । बताया जा रहा है कि देश के सभी नागरिक एक है । सबके लिये एक जैसा व्यवहार किया जायेगा । बात सही है कि सभी नागरिक समान है । पर यह भी तो सही है कि राणा शासन के अन्त होने के बाद भी अधिकांश महिला, मधेशी, जनजाति लगायत के पिछडेÞ वर्ग अभी तक विद्यालय का मुँह भी नहीं देख पाये हैं । तो स्वाभाविक है कि उनलोगों को समग्र में अगर लड़ाया जाय तो वह पीछे ही रहेगा । उसके लिये सबसे महत्वपूर्ण विषय भाषा भी है । उदाहरणस्वरूप अगर एक मोची और एक ब्राह्मण को जूता बनाने के लिये दिया जाय तो यह स्पष्ट है कि जीत मोची की ही होगी क्योंकि वह गुण उसमें जन्मजात विराजमान होता है । उसी प्रकार नेपाली भाषा जो बताया जा रहा है कि खस आर्य का है उस भाषा में भी उत्पीडि़तों को समस्या होती है । क्योंकि उसकी मातृभाषा अलग होती है । हम जानते हैं कि अपनी मातृभाषा में सम्प्रेषित करना सहज होता है । ठीक है हमने जैसे तैसे कठिन परिश्रम कर परीक्षा दिया । सभी प्रश्नों को अच्छे तरीके से हल किया पर वह उत्तर पुस्तिका भी तो उन्हीं लोगों के पास जायेगी न । हमारा मूल्यांकन भी तो वही लोग करेंगे जिनका राज्य में वर्चस्व है । इसलिये खुला प्रतियोगिता कराकर समानता कायम करने के परियोजना के तहत खस आर्य वर्चस्व को निरन्तरता दिखाने वाली राजनीति छुपी हुयी है ।

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राज्य में समानता लाने के लिये आरक्षण को निरन्तरता देना होगा । आरक्षण छीनने से राज्य के नागरिकों में अवहेलना का बीज रोपा जा रहा है जिससे राज्य को ही नुकसान होगा । राज्य का कर्तव्य यह बनता है कि आरक्षण के प्रभाव को हरेक दस दस वर्ष में समीक्षा करनी चाहिये । और देखना चाहिये कि किस जातजाति, लिंग, क्षेत्र तक समावेशिता पहुंच पायी है । इसके आधार में आरक्षण नीति को परिमार्जन भी किया जा सकता है । सिर्फ महिला समावेशिता से ही नही क्योंकि महिला के अन्तर्गत मधेशी महिला, दलित महिला, जनजाति महिला भी आती है । इसलिये समावेशिता के अन्दर समावेशिकरण पर जोर देना चाहिये । विशेष रूप से समावेशिता के साथ जोड़कर महिला, दलित, मधेशी का मांग आरक्षण नहीं, विशेषाधिकार था । क्योंकि राज्य के श्रोत, साधन और सेवा में समान रूप से हिस्सेदारी उनलोगों का नैसर्गिक अधिकार है ।

यह सम्भावित है कि अगर यह आरक्षण की नीति इमानदारीपूर्वक कार्यान्वयन नहीं हुयी तो उत्पीडि़त वर्ग में देश प्रति वितृष्णा पैदा होगी । वह अपने आपको अपने ही राष्ट्र से अलग महसूस करेगा । देश फिर से द्वंद में जा सकता है ।

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