श्रीमद्भगवद गीता,ईश्वर के समीप जाने का गीता एक सरल पथ है : योगेश मोहनजी गुप्ता
योगेश मोहनजी गुप्ता, मेरठ । आज विश्व में निरंतर परिवर्तन आ रहें हैं। पुरानी वस्तुओं का महत्व समय के साथ-साथ समाप्त प्राय होता जा रहा है। कुछ वस्तुओं को हम उपयोगी समझकर धरोहर के रूप में रखते हैं तथा कुछ को व्यर्थ समझकर फेंक देते हैं। हमारे विचार भी समय के साथ परिवर्तित होते रहते हैं। भौतिक वस्तुएँ यथा फैशन, फ्रिज, टी0वी0, कपड़े, कम्प्यूटर आदि को परिवर्तित करने के साथ-साथ आज मनुष्य अपने जन्मदाता को भी निःसंकोच बदल देते हैं और पत्नि के माता-पिता अर्थात् सास-ससुर अपने माता-पिता से अधिक प्रिय लगने लगते हैं। परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है, इसलिए यह स्वाभाविक है।
हमारी पुरानी पुस्तकों को भी पुस्तकालयों भी दीमक खा जाती हंै या वे पुस्तकालयों की अल्मारियों की शोभा बढ़ाती रहती है। समाज की प्रगति के लिए पुरानी रूढ़ियों, रीति-रिवाजों को बदलना नितान्त आवश्यक है, अन्यथा समाज की प्रगति असम्भव है। यदि आज घड़े के स्थान पर फ्रिज का अविष्कार नहीं होता तो हम प्रगतिशील नहीं कहलाते और ना ही मनुष्य चाँद और मंगल पर पहुँच पाता।
परिवर्तन की प्रकृति को समझने के लिए भारतीय संस्कृति के दो नियमों को समझना अत्यधिक आवश्यक है। प्रथम – श्रुति और द्वितीय – स्मृति। श्रुति का अर्थ है सुना हुआ अर्थात् ऋषि मुनियों द्वारा साधना में लीन होकर व्यवहारिक रूप में प्राप्त किया वह ज्ञान, जो आने वाली पीढ़ी के लिए उसी प्रकार हमेशा के लिए समय समायिक रहेगा, जैसे गुरूत्वाकर्षण का नियम, यह एक ऐसा सत्य है जिसको कोई नकार नहीं सकता। वह पीढ़ी दर पीढ़ी या जब तक संसार रहेगा, यह तथ्य सर्वमान्य रहेगा। श्रुति से स्मृति होती है अर्थात् स्मृति की जनक श्रुति है। पहले मस्तिष्क कार्य करता है फिर वह लेखक का रूप लेता है। स्मृति के नियम सब के लिए भिन्न होते हैं। जैसे एक मरीज के लिए डाक्टर कुछ दवाईयाँ अपनी स्मृति से लिखता है। वह दवाईयाँ केवल उसके लिए ही सार्थक है और किसी के लिए नहीं और यह भी आवश्यक नहीं कि वह उसके लिए निरंतर सार्थक रहे, वह दवाएँ भी उसके स्वास्थ्य के अनुसार समय-समय पर बदली जाती है और एक मरीज के लिए उपयोगी दवाईयाँ हर मरीज के लिए उपयोगी नहीं होतीं।
श्री मद्भगवद गीता में कृष्ण अर्जुन से कहते है कि गांडीव उठाओं और युद्ध करो, यह स्मृति है क्योंकि युद्ध की आवश्यकता उस समय की मांग थी, जो हमेशा नहीं होगी और जब कृष्ण कहते है कि वह ही ईश्वर है और उन्होंने सब कुछ निश्चित कर रखा है कि कब क्या होना है, वह श्रुति है। श्री मद्भगवद गीता के 18 अध्यायों में कृष्ण ने जो ज्ञान अर्जुन के माध्यम से विश्व को दिया है, वह सम्पूर्ण ज्ञान श्रुति है, जिसको अब सम्पूर्ण विश्व सत्यता के साथ स्वीकार कर रहा है। विश्व में श्री मद्भगवद् गीता ही एक मात्र ऐसा ग्रन्थ है, जो सब से प्राचीन होने के पश्चात भी अप्रचलित नहीं हुआ और आज भी पुस्तकालयों में वह दिन प्रतिदिन अग्रिम स्थान प्राप्त करता जा रहा है।
गीता ज्ञान आज के परिपेक्ष्य में केवल वृद्धो को ही नहीं अपितु नई पीढ़ी को भी प्रतिदिन आकर्षित कर रहा है, क्योंकि यही एक ऐसा ज्ञान है जो व्यवहारिक है और स्वयं ईश्वर ने अपने मुर्खाविंद से विश्व को दिया है।
भगवान श्री कृष्णा के उपदेशों का सकंलन गीता ग्रंथ ना तो किसी धर्म विशेष के लिए और ना ही किसी जाति विशेष के लिए है। वह एक ऐसा ज्ञान है जिसे यदि किसी ने समझ लिया, उसको फिर किसी अन्य ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती है। गीता के ज्ञान रूपी सागर में डूबने से मनुष्य का जीवन पवित्र, निर्मल होता जाता है। यह वह समुद्र है जिसमें जो एक बार डूब गया, वह हमेशा के लिए अमर हो जाता है। इस गीता रूपी ज्ञान में डूबने की ना कोई अवस्था निश्चित है और ना ही कोई समय निश्चित है। एक शिशु से लेकर वृद्ध तक कभी भी इसमे गोता लगा सकता है। ईश्वर के इस ज्ञान रूपी सागर में सभी बराबर हैं, इसमें कोई जाति बन्धन नहीं है तथा सबका समान महत्व है। ईश्वर के समीप जाने का गीता एक सरल पथ है, एक प्रसाद है, जिसने इस प्रसाद को एक बार चख लिया वह निरन्तर चखता रहेगा। गीता एक ऐसा ग्रन्थ है जो कभी ना तो परिवर्तित और ना ही कभी पुराना होगा। यह प्रकृति के नियम से भी श्रेष्ठ और सरल है, इसको अपनाना ही स्वर्ग के द्वार पर पहुँचना है।
*योगेश मोहनजी गुप्ता*
कुलाधिपति
आई आई एम टी यूनिवर्सिटी
मेरठ, भारत

