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रिवाजों और लिहाजों के बहानों में समेटा है व्यवस्थाओं के हर जंजाल में मुझको लपेटा है : ‘तनहा’

 

हाँ मैं जिन्दगी हूँ
डा. सरोजिनी ‘तनहा’
हाँ मैं जिन्दगी हूँ
मैं बेशक जिन्दगी हूँ
तुम…
मेरी आँखों में आँखें डाल कर देखो
मेरे आगोश में
आकर ही जानोगे
कि तुमने कितने पर्दों में
मुझे कब से छुपाया है
न ही मैं हूँ पहेली
न अजूबा, न मैं मस्ती हूँ
न भूलो तुम
तुम्हारा रूप ये
मुझसे ही आया है
मैं माँ हूँ और बेटी हूँ
बहन हूँ और पत्नी भी
कभी मुझको ही
अपना दोस्त भी
तुमने बताया है
रिवाजों और लिहाजों के
बहानों में समेटा है
व्यवस्थाओं के हर जंजाल में
मुझको लपेटा है
मगर मै. वाकई इनसे परे हूँ
मेरी मानो तो
मेरी आँखों में आँखें डाल
गर तुम भी
ये जानो तो
न ही मैं बेरुखी हूँ
न कोई साजिश रचाती हूँ
न मेरी कोई है ललकार
न मैं लोरी सुनाती हूँ
न मेरी है अदा
न बेवफा मैं
न वफा हूँ मैं
हरेक पस्ती बुलन्दी की तो
केवल इन्तहा हूँ मैं
मुझे मेरी आँखों में उतर कर
देखना चाहो
मगर कैसे ?
ये मुमकिन ही नहीं है
सोचते जाओ
चाहे एक बर देखोगे
चाहे सौबार देखोगे
कहो कैसे …
मुझे मेरी हदों के पार देखोगे
हदों में आओगे मेरी
तो तुम मुझमें समाओगे
मगर ये राज मेरा
फिर भी न तुम जान पाओगे
मै. शाशवत सत्य हूँ
मैं सृष्टि हूँ
तुम्हारी जात
मेरी जात से आगे नहीं है
मेरे बारे में दुनिया को
भला कैसे बताओगे
मैं ऐसी इन्तहा हूँ
है नहीं
जिससे परे कुछ भी
फकत तन्हाई है
जो खुद यहाँ
मैं ने बिखेरी है
सभी को मुझसे आना है
मुझी में लौट जाना है
सुनो ! फिर भी मैं ‘तनहा’ हूँ
जमाने में यही नायाब सी
पहचान मेरी है ।

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