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रहस्यों से भरी रेडियो की दुनिया : प्रकाश प्रसाद उपाध्याय

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हिमालिनी  अंक  नवंबर  2019 | आम नेपाली के लिए ‘ऑल इंडिया रेडियो’ आकाशवाणी के रूप में एक सु–परिचित नाम है । एक समय ऐसा भी रहा कि निष्पक्षीय सूचना और समाचार के लिए ऑल इंडिया रेडियो सुनने के लिए नेपाली लोग लालायित भी रहते थे । उस वक्त नेपाल में ‘रेडियो नेपाल’ तथा सरकारी सञ्चार माध्यम के अलावा अन्य कोई भी संचार माध्यम नहीं था । रेडियो नेपाल सरकारी संचार संस्था होने के कारण कई लोगों को लगता था कि यह सरकार–पक्षीय सूचना ही प्रसारित करती है । इसीलिए निष्पक्ष समाचार के लिए नेपालवासी भी भारतीय रेडियो संचार संस्था ‘‘ऑल इंडिया रेडियो’ सुनते थे, जहाँ नेपाली भाषा में समाचार एवं मनोरञ्जनात्मक सामाग्री प्रसारित होता था । उसी रेडियो में अपना पूरा जीवन (४२ साल) बितानेवाले व्यक्तित्व हैं– प्रकाश प्रसाद उपाध्याय । हाँ, रेडियो पत्रकारिता क्षेत्र में आप सबसे पुराने और गिने–चुने पत्रकारों में से एक है । रेडियो पत्रकारिता आपने करीब से देखी है । रेडियो में आवाज के द्वारा  आप लाखों–करोड़ों श्रोताओं के बीच पहुँचे हैं । आप एक कुशल लेखक भी हैं । आपकी नेपाली और हिन्दी में ९ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । ऑल इंडिया रेडियो से सेवा निवृत्त होने के बाद जीवन के एक कालख०८ में आप राजनीति से भी जुड़े  । आप सबके समक्ष प्रस्तुत है– प्रकाश प्रसाद उपाध्याय जी का जीवन–सन्दर्भ– प्रस्तुतिः लिलानाथ गौतम

प्रकाशप्रसाद उपाध्याय, रेडियो पत्रकार

बाल्यकाल
मैं अपने माता–पिता श्रीमती अरुणा देवी और श्री अग्नि प्रसाद उपाध्याय का जेष्ठ पुत्र हूँ । हमारे पिता जी एक दयालु हृदय के उदार व्यक्ति थे । लगभग ८५ वर्ष की उम्र में उनका देहांत हुआ । उसके कुछ वर्ष बाद ही माता जी भी स्वर्ग सिधार गईं । मेरे पिता जी अपने पिता के मझले बेटे थे । महुआ और मंसापुर की जमीनदारी के निलामी के बाद कुछ वर्ष उन्हें आर्थिक कठिनाई से जुझना पड़ा । पर सरकारी नौकरी में आने के बाद जीवन ने सामान्य गति प्राप्त की ।

मेरा जन्म ११ नवम्बर १९४३ ई. को सप्तरी जिले के सदरमुकाम राजविराज में हुआ । पर लालन–पालन सदरमुकाम से लगभग ३ कोस दक्षिण में अवस्थित गोविन्दपुर गांव के एक घर में हुआ । भारतीय सीमा से सटा यह गांव वर्तमान सन्दर्भ में उन दिनों एक पिछड़ा और अविकसित गांव था, जहां सभी प्रकार की असुविधाएं और कमियां थीं । पर इन कमियों और असुविधाओं के बीच भी हमें असीम आनन्द प्राप्त होता, जब हम गांव के बच्चे एक साथ पास के तालाब में नहाने जाते, पानी में उछल कूद मचाते, तैरते, कभी तालाब में लगे कमल के फूलों के बीज तोड़ते तो कभी मखानों के बीच से गरी निकालकर खाते । सांयकाल में दस गजे में जाकर फुटबॉल खेला करते । बागानों में कोयलों की कूक की आवाज के साथ आवाज निकालने, आम तोड़ने और उछल–कूद करने का तो आनन्द ही कुछ और होता । प्रातःकाल अखाड़ों में अपने समकक्षियों के साथ कुश्ती के दाव–पेंच सीखने, खेतों में धान की फसलों को कटाने और बाढ़ के दिनों में कोशी नदी की उफनती जलधारा को निहारने का एक अलग सुख मिलता था ।

उफनती बाढ़ की चर्चा करते हुए एक दो घटनाएँ याद आती हैं । वर्षा याम में सुबह जब सोकर उठते तो आँगन पानी से भरा मिलता । पिताजी पानी को देखकर कहते– ‘लो रात को कोशी की बाढ़ आ गई ।’ मां कहती– ‘अब तो इसी में पैर भिगोकर रसोई में जाना आना पड़ेगा ।’ (क्योंकि रसोईघर अलग कमरे में था) । गांव में दूर–दूर तक पानी का साम्राज्य दिखायी पड़ता । एक दिन सबेरे–सबेरे शोर मचा– बाढ़ में बहकर अजगर आया है ।’ हम लोगों ने गांव में गेहुँमन, करेंत, धामन, हरहरा आदि साँप तो देखा था, पर अजगर के बारे में सुना था कि वह एक विशाल और मोटा साँप होता है और बड़े–से बड़े जीव को भी निगल जाता है । अतः अजगर देखने की उत्सुकता से निकल पड़ा, कुछ दोस्तों के साथ । वहां पहुँचने पर पाया कि गांववालों ने उसे अपने–अपने डंडों से मार डाला । इसी प्रकार एक दिन हिरण का मेमना बाढ़ में बहकर हमारे आँगने में विचरण करता हुआ पाया गया, जिसे पिताजी ने बड़े ही जतन से पाला–पोसा । जब वह बड़ा हुआ, तब उसे वन विभाग के एक अधिकारी के हाथों सौंप दिया । मौज–मस्ती से भरे दिन तब वेदनापूर्ण भी हो उठते, जब स्कूल की पढाई पूरी न करने या गृहकार्य संपन्न न कर पाने पर शिक्षक महोदय, जिन्हें हम मास्टर साहेब कहा करते थे, हरे बांस की डंडी से हाथों का अच्छी तरह से इलाज किया करते थे ।
शिक्षारंभ
शिक्षा का प्रारंभिक ज्ञान मुझे गांव के ही एक शिक्षक नागेश्वर लाल मल्लिक से हुआ, जो कमतौल(बिहार) से आए थे और हमारे घर के एक पड़ोसी जमींदार के यहां निवास करते थे । वह उनके ही आंगन में गांव के बच्चों को पढ़ाया करते थे । इस प्रकार मैं उनके मार्गदर्शन में चौथी कक्षा तक पढ़ाई करता रहा । मेरे साथ मेरी दीदी कौशल्या देवी और छोटे दो भाई (राजेन्द्र और शंकर) भी इन्हीं के निर्देशन में शिक्षा प्राप्त किया करते रहे । पाँचवीं कक्षा में नागेश्वर लाल मास्टर साहेब से शिक्षा प्राप्त करने के दिनों में निकटवर्ती गांव सखड़ा में, जहां छिन्नमस्ता भगवती का प्रसिद्ध शक्तिपीठ है, एक माध्यमिक स्कूल की स्थापना हुई, जहां मैंने छठी क्लास तक की पढ़ाई की । ७वीं कक्षा और उसे आगे की शिक्षा के लिए मैं सदरमुकाम राजविराज गया । वहां के पी.बी. हाई स्कूल से सन् १९५८ में एस.एल.सी. की परीक्षा पास की ।
जिन दिनों मैं ९वीं कक्षा का छात्र था, मेरे पिताजी सरकारी नौकरी के सिलसिले में राजविराज आए और राजविराज हम लोगों का तब तक आवासीय नगर रहा, जब तक मधेश आन्दोलन के दुष्प्रभाव और उत्पन्न–आतंक के कारण पैतृक घर को बेचने की स्थिति उत्पन्न नहीं हुई । यूं कहें तो मधेश आन्दोलन के कारण ही हम लोग स्थायी निवास सप्तरी को छोड़कर काठमांडू आ गए ।

किशोरोवस्था में दिल्ली यात्रा

सुख–दुःख, संघर्ष–सफलता, अनुकुलता–प्रतिकूलता कभी अभाव, धूप और छांव की तरह जीवन के अभिन्न अंग रहे । इन्हीं वातावरण में एसएलसी से आगे की शिक्षा के लिए भारत की राजधानी दिल्ली जाने का सुनहरा अवसर प्राप्त हुआ । उन दिनों मेरे चाचा हरिप्रसाद शर्मा जी दिल्ली में भारत सरकार की सेवा में कार्यरत थे । उन्हीं के बुलाने पर मुझे दिल्ली में शिक्षार्जन करने का अवसर मिला । मेरे ताऊजी की चाह थी कि मैं ईंजीनियर बनूँ । मेरे पिताजी अपने बड़े भाई दामोदर प्रसाद शर्मा की बातों को सहर्ष माना करते थे । अतः ७वीं और १०वीं की शिक्षा का मेरा विषय विज्ञान था । उन दिनों अंग्रेजी की पढ़ाई ९वीं कक्षा से हुआ करती थी और शिक्षा का माध्यम हिन्दी हुआ करता था । इस प्रकार एसएलसी तक की शिक्षा हिन्दी माध्यम से हुई । दिल्ली पहुँचने पर जब पाया कि आगे की विज्ञान की शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है, तब मेरा दिल घबड़ाने लगा । ३–४ महीने के अध्ययन के उपरांत लगा कि विज्ञान की शिक्षा मेरे अनुकूल नहीं है । अतः चाचाजी से अनुमति लेकर मैंने विषय परिवर्तन की और कला–विद्या में अध्ययन करते हुए दिल्ली विश्व विद्यालय से स्नातक के रूप में उत्तीर्ण हुआ । यद्यपि उन दिनों परीक्षा में सेमेष्टर प्रणाली का सूत्रपात नहीं हुआ था और तीन वर्ष के सम्पूर्ण कोर्स की परीक्षा एक साथ ही देनी होती थी । छोटे से गांव में पला, अल्पविकसित नगर से स्कूल की औपचारिक शिक्षा पाकर भारत जैसे विशाल देश की राजधानी के कॉलेज में अंग्रेजी माध्यम से तीन वर्ष के संपूर्ण कोर्स की परीक्षा एक साथ देना यद्यपि लोहे के चने चबाने के समान था, पर मेहनत रंग ले ही आई ।

शिक्षार्जन के साथ नौकरी
बी.ए. द्वितीय वर्ष के अध्ययन के दिनों मुझे ऑल इंडिया रेडियो के नेपाली कार्यक्रम में आकस्मिक कलाकार के रूप में कार्य करने का अवसर मिला । उन दिनों भारत में टेलिविजन युग का सुत्रपात नहीं हुआ था । अतः रेडियो प्रसारण का एक आकर्षण था । रेडियो से अपनी आवाज निकाल पाना सौभाग्य की बात होती थी । फिर यह भी सोच थी कि ऑल इंडिया रेडियो से प्रसारण का थोड़ा–बहुत अनुभव स्वदेश लौटने पर वहां की प्रसारण संस्था के लिए अतिरिक्त ज्ञान और अनुभव माना जाएगा  । प्रारम्भ में मिलनेवाला एक महीने का करार पत्र ६ महीने के कार्यकाल के बाद ३ वर्ष के लिए विस्तारित किया गया । जो मेरे लिए एक दूसरा सुनहरा अवसर था । इस अवधि में मेरी एम.ए. तक की शिक्षा पूरी हो जाएगी, यह सोच कर इसे स्वीकार तो कर लिया पर बी.ए. की अंतिम वर्ष की परीक्षा के लिए जब मैंने अवकाश के लिए आवेदन दिया, तब एक समस्या आ पड़ी ।

मुझे इस बात की जानकारी नहीं थी कि नौकरी करते हुए शिक्षार्जन करने के लिए कार्यालय से अनुमति लेनी पड़ती है, न ही मेरे विभागीय अधिकारी वर्ग ने मुझे यह जानकारी दी थी । अतः जब तीन वर्षों के कोर्स परीक्षा देने के लिए लंबी अवधि की अवकाश की आवश्यकता पड़ी और इसके लिए आवेदन पेश किया, तब स्पष्टीकरण देने की नौबत आयी । पर अंततः अवकाश प्रदान की गयी ।

इस प्रकार बी.ए. तक की शिक्षा पूरी हुई । अब आगे की शिक्षा के लिए जब अनुमति चाही तो नकार दिया गया । पर अगले वर्ष का प्रयास रंग ले आया और मेरी इस प्रतिबद्धता पर अनुमति दी गई कि मैं त्रिभुवन विश्व विद्यालय काठमांडू से प्राइवेट छात्र के रूप में एम.ए. की परीक्षा दूँगा और मेरा यह अध्ययन मेरे प्रसारण की ड्युटी में कोई बाधा उत्पन्न नहीं करेगा । आवास में फुर्सत के क्षणों में अध्ययन करता रहा, परीक्षा की तैयारी भी होती रही, पर फिर व्यवधान आ पड़ा । दो शिफ्ट की ड्युटी में सुबह–शाम प्रसारण कार्य हेतु जाना पड़ता था, आठ घंटे की ड्यूटी के अलावा समय–समय पर प्रसारण भवन बाहर जाकर रेकॉर्डिग करने का दायित्व रहा । स्वास्थ्य बिगड़ने लगा और परीक्षा नहीं दे पाया । दूसरे वर्ष गृहस्थ जीवन का दायित्व एक अतिरिक्त कारण बना, जिस वजह से मैं एम.ए. की शिक्षा पूरी नहीं कर पाया । पर नौकरी के प्रति लगनशीलता और निष्ठा भावों के कारण करार की अवधि बढ़ाकर ५ वर्ष की कर दी गई । इसी प्रकार मैं ४२ वर्ष तक अनवरत रूप से ऑल इंडिया रेडियो से नेपाली भाषा और साहित्य की सेवा करता रहा ।
रेडियो की ड्यूटी का आकर्षण भी पृथक होता है । विशेष प्रसारण हेतु उस दिनों प्रधानमन्त्री और मन्त्री तक रेडियो स्टेशन के स्टूडियो में आया करते थे । गीत–संगीत की इस दुनिया में देश के बड़े–बड़े संगीतज्ञ, गायक, जहां गीत–गायन और रेकॉर्डिग के लिए आया करते थे, सिने–कलाकार, कवि, साहित्यकार, भेटवार्ता देने के लिए पहुँचा करते थे । नेपाल से दिल्ली जानेवाले साहित्यकार, गायक, कवि आदि भी वहां निमन्त्रित किए जाते थे । इस सिलसिले में मुझे नाट्य सम्राट बालकृष्ण सम, राष्ट्रकवि माधव प्रसाद घिमिरे, प्रसिद्ध चित्रकार लैनसिंह बांग्देल, कवि केदारमान व्यथित, सांस्कृतिविद् सत्यमोहन जोशी, डॉ. ईश्वर बराल, प्राज्ञ देवेन्द्रराज उपाध्याय, योगी नरहरि नाथ और भवानी भिक्षु जैसे प्रसिद्ध व्यक्तियों से वार्ताएं, भेटवार्ताएं रेकार्ड करने का सु–अवसर मिला । समान रूप से गायन क्षेत्र से संबद्ध कुमार बस्नेत, गंगा देवी, सुमन कुमार नेपाली, ध्रुव के.सी., सनत कुमार मैनाली, नृत्यांगना विमला श्रेष्ठ आदि के गीतों को रेकार्ड करने का अवसर भी प्राप्त हुआ । नेपाल के राजा या प्रधानमन्त्री की दिल्ली यात्रा काल में उनके सन्निकट पहुँचकर रेकॉर्डिग करने पर असीम आनंद प्राप्त होता था । इसी सिलसिले में राजा महेन्द्र, उनके पुत्र अर्थात् तत्कालीन अधिराजकुमार ज्ञानेन्द्र शाह, प्रधानमन्त्री वी.पी. कोइराला, मनमोहन अधिकारीके साथ संक्षिप्त भेटवार्ता रेकर्ड करने और भारत के उप–राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, पं. जवाहर लाल नेहरु और श्रीमती इन्दिरा गांधी के सन्निकट पहुँचने का अवसर प्राप्त होता रहा ।

उद्घोषक के रूप में गीत–संगीत बजाने का भी एक अपना ही आनंद होता है । गीतों के रेकॉर्ड को बजाने के लिए तैयार करते और बजाते हुए और गीतों को सुनते हुए निराशा के भाव कभी धूमिल हो उठते तो कभी जीवन में मधुरता उत्पन्न हो उठता और स्टूडियो से निकलते समय गीतों के धुन और लय होठों पर थिरकने लगते । गीतों को सुनने और सुनाने के अलावा दिल्ली विश्व विद्यालय और जवाहर लाल नेहरु विश्व विद्यालय के प्राचार्यों के लेख और हिन्दी जगत के प्रख्यात कथाकारों से प्राप्त वार्ता आदि को अनुवाद करते हुए जीवन में साहित्यिक रसों का संचार भी होता ।

भारत–पाकिस्तान युद्ध का अनुभव
मेरे कार्यकाल में हुए चीन–भारत युद्ध, भारत और पाकिस्तान के बीच के तीन–तीन युद्ध और बांगलादेश का उदय ऐसी घटनाएं थी, जिसके दुष्प्रभावों का मैं भुक्तभोगी भी रहा । इस युद्ध के सन्दर्भ में एक बात जो मेरे दिल और दिमाग में हमेशा उभरती रहती है, वह है सन् १९६५ के युद्धकाल में पाकिस्तान के एक विमान को भारतीय विमानभेदी तोपों के द्वारा गिराया जाना । प्रातः काल का समय था । लगभग ५ बजा होगा । मैं ड्युटी में जाने के लिए तैयार होकर अपने होस्टल से बाहर सरकारी गाड़ी की प्रतीक्षा में खड़ा था । तभी एकाएक नजर पहुँची आकाश पर, जहां लगा कि आग का एक गोला तीव्र गति से किसी वस्तु का पीछा कर रहा है । कुछ क्षण के अन्दर ही पुलिस की एक गाड़ी आई । उसमें यात्रा कर रहे एक अधिकारी ने मेरे संबंध में जानकारी लेनी चाही– मैं कौन हूँ और इस वक्त यहां क्यों खड़ा हूँ ? मैंने कहा– ‘मैं ऑल इ०ि८या रेडियो की गाडी की प्रतीक्षा में खड़ा हूँ और ड्युटी में जा रहा हूँ ।’ इस पर उन्होंने पूछा कि इधर आसपास किसी छाताधारी को उतरते हुए तो नहीं देखा ? मेरे द्वारा अनभिज्ञता प्रकट किए जाने पर उन्होंने कहा– अगर दिखाई पड़े तो ऑफिस पहुँचकर फोन करना । उन दिनों मोबाइल फोन प्रचलन में नहीं था । उनकी बातों को सुनकर मैं हैरान हो रहा था । खैर ! जब गाडी आई, तब मैं ऑफिस पहुँचा । लगभग आधे घंटे के बाद समाचार अनुवाद करते हुए पता चला कि दिल्ली के निकटवर्ती उत्तर प्रदेश राज्य में अवस्थित भारतीय वायुसेना के अड्डे से विमानों ने पाकिस्तान के आक्रमणकारी हवाईजहाज पर तोप से गोले दागे थे, जिसके कारण पाकिस्तान का वह विमान ध्वंस्त होकर दिल्ली के कुछ दूरी पर जा गिरा ।

समान रूप से सन् १९७२ की भारत–पाकिस्तान युद्ध के दिनों में इसी प्रकार ब्ल्याकआउट (घरों में जलती बत्ती को बुझाकर अड़ोस–पड़ोस के वातावरण को अंधकारमय कर देना) सामान्य हुआ करती थी । जगह–जगह बंकर (गड्डे) बनाए गए थे ताकि शत्रु की ओर से गोलाबारी होने पर उन बंकरों में छिपा जा सके । पर छिपने की नौबत नहीं आई । हांलाकि उन दिनों भी हवाई हमलों के संकेत देनेवाले साइरन की आवाज रात के वक्त सुनाई पड़ती रहती ।

इसीतरह सन् ६० के दशक में अफ्रीका के कई देश एक के बाद एक स्वतन्त्र होते गए, जिनका प्रसारण समाचार वाचक के रूप में करने का भी अवसर मिला । नेपाल की राजनीतिक घटनाओं, विशेषकर प्रजातान्त्रिक आन्दोलन के संबंध में समाचार प्रसारित करने के कारण कई नेपाली राजनीतिज्ञों की नजरों में आने का अवसर मिला । एक बार तो नेपाल के मन्त्रिपरिषद् के एक उपाध्यक्ष मेरे समाचार प्रसारण से इतना क्रुद्ध थे कि वह तत्कालीन भारतीय प्रधानमन्त्री नेहरु जी से मेरी शिकायत करने को अग्रसर हो रहे थे । लेकिन उन्हें किसी के द्वारा यह समझाए जाने पर कि समाचार का प्रसारण में इस व्यक्ति का निजी दखल नहीं होता और जो सामग्री उसे दी जाती है, उसे ही वह प्रसारित करता है, तब जाकर वह शान्त हुए । और उन्हें यह भी बताया गया कि वह नेपाली नागरिक है और बिहारी नहीं है ।

रेडियो प्रसारण, समाज के सभी वर्गो को द्रूत गति से समाचार पहुँचाने और मनोरंजन प्रदान करने का एक उत्तम माध्यम है । लेकिन युद्ध, चुनाव और राजनीतिक उथल–पुथल की घटनाओं के अवसर पर रेडियो के स्रोताओं की समाचार सुनने की जिज्ञासा और उत्सुकता अधिक हो जाती है और वे ताजी घटनाओं को जानने और सुनने को उन्मुख हो उठते हैं । ऑल इ०ि८या रेडियो के देशांतर प्रसारण प्रभाग के अंतर्गत प्रसारित नेपाली कार्यक्रम ने भी सन् ६० के दशक में उस समय लोकप्रियता की अत्यधिक ऊँचाई प्राप्त की, जब तत्कालीन राजा महेन्द्र ने वी.पी. कोइराला के सरकार के बरखास्त कर देश का शासन भार अपने हाथ में लिया । कार्यक्रम की लोकप्रियता का एक कारण था– रेडियो नेपाल से प्रसारित होने वाले समाचार बुलेटिन का सेंसर होना । हां, रेडियो नेपाल से सरकारी पक्ष की बातें ही प्रसारित होती थी । जबकि ऑल इ०ि८या रेडियो से प्रसारित समाचार पीटीआई, रायटर, एएफपी जैसे समाचार एजेंसियों से प्राप्त समाचारों पर आधारित होते और नेपाल के राजनीतिक विद्रोहियों के क्रियाकलापों को भी उजागर किया करते थे । फलस्वरूप, यह भी सुनने को मिलता कि ऑल इ०ि८या रेडियो के नेपाली कार्यक्रम के प्रसारण की सुनवाई नेपाल के प्रधानमन्त्री के निवास से लेकर राजमहल तक हुआ करती है । नेपाली कार्यक्रम की लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने सन् ६५ के मध्य में भारत–पाकिस्तान युद्ध के अवसर पर दिवा सेवा और सन् ७१ के महीनों में संध्याकालीन सेवा शुरु की । सायंकालीन सेवा में भारतीय सेना में कार्यरत गोर्खा सैनिकों के संदेश उनके परिवारजनों के नाम प्रसारित किये जाते । सैनिकों के सन्देश का यह कार्यक्रम भी श्रोताओं के मध्य अत्यन्त लोकप्रिय रहा । आज भी जब मेरी मुलाकात वरिष्ठ लोगों से होती है, तब वह इस कार्यक्रम की चर्चा करना नहीं भूलते ।

रहस्यों से भरी रेडियो की दुनियां
रेडियो का नाता अधिकांशतः प्रसारक, उद्घोषक, गायक, गायिका और स्रोताओं से संबंद्ध रहता है । अतः श्रोतावर्ग अपने मन में अपने मनपसंद प्रसारक, उद्घोषक, गायक–गायिका आदि की छबि बनाया करते हैं । मैं प्रकाश प्रसाद के नाम से समाचार पढ़ता था । अतः मेरे अपरिचित श्र्रोताओं के मन में मैं बिहार, उत्तर प्रदेश या मध्य प्रदेश का कायस्थ जाति का व्यक्ति था । नेपाल के स्रोता जब किसी कार्यवश दिल्ली जाते तब रेडियो स्टेशन देखने और नेपाली कार्यक्रम के कर्मचारियों से मिलने आया करते थे । ऐसे अवसरों पर मेरी मुलाकात एक दो बार कुछ श्रोताओं से हुई । जब उन्होंने जाना कि मैं नेपाली नागरिक हूँ, तब वह दंग हो उठे । और पूछने लगे– ‘आप अपने नाम के साथ उपाध्याय क्यों नहीं प्रसारित करते ? हम लोग तो कुछ क्षण पहले तक आपको बिहार का व्यक्ति ही समझ रहे थे ।’ एक बार काठमांडू यात्रा काल में मेरी मुलाकात एक वरिष्ठ पत्रकार से हुई । परिचय के क्रम में जाना कि मैं तराईबासी नेपाली हूँ, तब कहने लगे– ‘रेडियो से आपकी आवाज में समाचारों को सुनते हुए मैं हैरान होता कि बिहार का एक व्यक्ति कितनी स्वच्छ नेपाली बोल रहा है । अब आपसे मिलने पर मेरी मन की उत्सुकता जाती रही ।’
वास्तव में  रेडियो की दुनिया रहस्यों से भरी होती है । आजकल टेलिविजन का युग है । सभी गायक, प्रसारक, कलाकार, टेलिविजन के पर्दे पर दिखाई पड़ते हैं, जो रेडियो पर संभव नहीं है । मैंने भी जब तक रेडियों में प्रवेश नहीं किया था, तब मेरी कल्पना के हिंदी समाचार वाचक और गायकों की छबि मिलने पर अलग दिखाई पड़ी ।
लेखन कार्य
इन रहस्यों के बीच जीवन बिताते हुए लेखक के रूप में लेखनी भी चलती रही । सन् ६० के दशक की बात है । मेरे पड़ोसी में एक अग्रज और गोरखाली भाषा में प्रकाशित होनेवाली पत्रिका ‘सैनिक समाचार’ के एक अधिकारी एच.सी. जयद्रथ रहा करते थे । जब भी मेरी उनसे मुलाकात होती, वह मुझसे किसी कहानी आदि की माग किया करते । मैं स्नातक स्तर का छात्र था । रेडियो की नौकरी और शिक्षा के भार के कारण मैं उनकी चाह पूरी करने में असमर्थ रहता । वैसे भी मैं किसी लेखक वर्ग में नहीं पड़ता । पर वह मुझे हमेशा कहा करते– ‘आप चाहो तो लिख सकते हो, विश्वविद्यालय स्तर के छात्र हो, कल्पनाशील युवक हो । रोज थोड़े ही लिखनी है । जब कॉलेज से अवकाश का समय मिले, लिख डाला करो ।’ फिर कहने कहने लगे ‘अच्छा, आप एक–दो  लिखकर दो, मैं देख लूंगा ।’ उन्ही ंकी प्रेरणा पाकर मैंने दो प्रेम कथाएं लिखी और उन्हें दी । कुछ समय पश्चात् वह सैनिक समाचार की एक प्रति लेकर आए और कहने लगें– एक बार इसे देख लेना । प्रेरणा मिलेगी ।’ पत्रिका खोलकर देखता हूँ तो मेरी कहानी का प्रकाशन । खुशी से झूम उठा और उन्हें धन्यवाद देने लगा । इस पर कहने लगे– ‘मुझे पता था, आप लिख सकते हो ।’ कुछ समय पश्चात मेरे नाम से पारिश्रमिक के रूप में सैनिक समाचार से १५ रूपये का मनिऑर्डर भी प्राप्त हुआ । एक तो कहानी का छपना और उस पर परिश्रमिक की राशि । फिर क्या था, कहानी लिखने का दौर शुरु हुआ और सेवानिवृत्ति की अवधि तक सैनिक समाचार का मैं नियमित लेखक बना रहा ।
इससे प्रोत्साहित होकर हिंदी भाषा में भी लिखने लगा । हिन्दुस्तान टाइम्स की बाल पत्रिका ‘नंदन’ में भी यदा–कदा कहानी भेजा करता । साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ली से पुरस्कृत एक नेपाली कृति ‘वीर जाति को अमर कहानी’ का हिन्दी अनुवाद करते हुए अकादेमी को सौपा, जिसे अकादेमी ने प्रकाशित की । इस प्रकार लिखने का दौर जो सन् ६० के दशक से शुरु हुआ था, वह आज तक जारी है ।

 

सेवा निवृत्ति के बाद का जीवन
सेवा से अवकाश पाने के बाद काठमांडू लौटा और यहीं रहने की सोच बनायी । देश की राजधानी होने के कारण यहां जो सुविधाएं है, वह मेरे गृहनगर में नहीं है । सेवानिवृत्ति का प्रारम्भिक काल गृह निर्माण एवं स्वास्थ्योपचार में बीता । उन दिनों काठमांडू राजनीतिक दृष्टि से तरंगित था । युगान्तकारी घटनाएं हो रही थी । राजतन्त्र के स्थान पर गणतन्त्र की स्थापना हुई । इसी क्रम में मुझे देश के अग्रणी गणतन्त्रवादी नेता रामराजा प्रसाद सिंह से मिलने, उनकी पार्टी का केन्द्रीय सदस्य होते हुए प्रवक्ता होने और राष्ट्रपतीय निर्वाचन में उनके लिए दौड़धूप करने का अवसर मिला । इस प्रकार सेवानिवृत्ति का प्रारम्भिक काल उमंगों से भरा रहा । राजनीतिक वातावरण में स्थिरता उत्पन्न होने पर लेखन कार्य में समय बिताने लगा । इस अवधि में हिमालिनी पत्रिका के लिए हिंदी में लिखने का नियमित क्रम जारी रहा तो अन्य राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों के लिए विभिन्न विषयों में लिखता रहा । पर इसके अतिरिक्त नेपाल के क्रान्तिकारी नेता गणेशमान सिंह की जन्म शताब्दी के अवसर पर हिन्दी में उनके जीवन पर आधारित ‘वीर गणेशमान की संघर्ष गाथा’ की रचना की । इस प्रकार लेखन कार्य करते हुए समय बिता रहा है । कुछ महीने पहले एक और कृति छपी, जिसका शीर्षक है– ‘गणतन्त्र का प्रणेता रामराजा प्रसाद सिंहसँगको अन्तरङ्ग कुराहरू’ ।
लेखन की दुनिया भी रहस्यों से भरी होती है । पाठकों के हाथों में जब कोई कृति, पत्रिका या समाचार पत्र होते हैं, तब वे रचना पढ़ते हुए उस लेखक या लेखिका की छबि अपने मन में बनाने लगते हैं, यदि उस रचना के साथ उसका या उसकी तसवीर छपी नहीं होती है, छपे होने पर भी पाठक की मुलाकात जब यदा–कदा उस लेखक या लेखिका से होती है, तब वह उनसे मिलने पर होने वाली खुशी का इजहार करने से नहीं चूकता ।

जीवनः दुःख और सुःख का सम्मिश्रण
जीवन का सिद्धान्त रहा– कर भला होगा भला । अतः पशुपतिनाथ की कृपा से आज तक किसी बात पर पश्चाताप करने की घड़ी नहीं आई है । जीवन में दुःख के कई क्षण आए । बाल्यवस्था में जमीनदारी छीने जाने पर अभाव की स्थिति के कारण कई किस्म के दुःख उठाने पड़े । पर मेरी दिल्ली यात्रा और वहां के ४६ वर्ष के प्रवास काल ने जो सुखद क्षण प्रदान किए, उससे अब दुःख की घटनाएँ भी सुहानी लगती हैं ।
एक ब्राह्मण परिवार में जन्मा, पला । अतः पूजा–पाठ को दिनचर्या के रूप में शिरोपर कर कर्तव्यपथ पर अग्रसर होता रहा । किसी की सहायता को ही धर्म के रूप में स्वीकार करता रहा । कभी गांधी जी के प्रिय भजन– ‘वैष्णवजन तो तेने कहिये जो पीर परायी जाने रे’ गुनगुनाते, तो कभी ‘जब घबराये दिल अनमोल और हृदय हो डाँवाडोल, तब मानव तुम मुख से बोल बुद्धम्, शरणम् गच्छामि, धम्मम् शरण गच्छामि, संघ शरणम् गच्छामि’ के बोल गाते हुए जीवन पथ पर चलता रहा हूँ । धार्मिक अनुष्ठानों में शरीर होने पर आनंद का बोध होता है ।
जीवन एक सम्मिश्रण है– प्रेम और उल्लास का, संयोग और वियोग का, सुख और दुःख का । वियोग से दुःख मिलता है । पर मिलन के साथ जुदाई उसी प्रकार जुड़ी है, जिस प्रकार धूप के साथ छाँव । अतः जीवन को सकारात्मक सोच और सृजनशील कार्य के द्वारा सार्थकता प्रदान करने की निरंतर कोशिश रही । हाँ, एक–दो बार धोखा जरूर खाया ।

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