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धर्म और संस्कृति का समन्वय स्थल नेपाल : श्वेता दीप्ति

डॉ. श्वेता दीप्ति, हिमालिनी  अंक  नवंबर  2019 | रुपन्देही लुम्बिनी, नेपाल की पहचान बुद्ध देश के रूप में होती है । विश्व को शांति का संदेश देने वाले महात्मा बुद्ध की जन्मस्थली है रुपन्देही । राजा शुद्धोदन की रानी और गौतम बुद्ध की माँ मायादेवी कोलिय राजकन्या थी । उनका जन्म देवदह के भवानीपुर में हुआ था । मायादेवी का एक नाम रूपादेवी भी था सम्भवतः इसलिए रुपन्देही नाम पड़ा होगा । लुम्बिनी वह पावन स्थल है जहाँ बुद्ध का जन्म हुआ । यह स्थल विश्वविख्यात है और पर्यटकीय तथा धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण भी । लुम्बिनी ग्राम रुपन्देही के दक्षिण पश्चिम में अवस्थित है, जहाँ मायादेवी मन्दिर, अशोक स्तम्भ तथा पुरात्त्व विभाग की खुदाई में प्राप्त ५०० ई.पू । की कई भग्नावशेष मौजूद हैं जो उत्सुकता और कौतुहल का विषय है । रुपन्देही जिले में बसडिलवा सिद्ध शिव मन्दिर, नारायण मन्दिर, अमारी के मनौरी शिवलिंग, चंचलामाइृ, कोटी माई, कटैया के काली माई स्थान, मर्चवारी माई आदि कई प्राचीन धरोहर हैं जो आज भी मौजूद हैं पर इनकी सुरक्षा और संवृद्धि के लिए उचित ध्यान देने की आवश्यकता है ।

यहीं कपिलवस्तु भी है जो कपिलमुनि के नाम से जाना जाता है । शाक्यवंशीय राजा शुद्धोदन की राजधानी यहीं पर है । राजकुमार सिद्धार्थ से जुड़े अनेकों ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल यहाँ मौजूद हैं । वाणगंगाा से पूर्व, कोठी से पश्चिम, भारतीय सीमा से उत्तर और महेन्द्र राजमार्ग से दक्षिण के बीच के क्षेत्र में ही बुद्ध से सम्बन्धित १३८ ऐतिहासिक स्थलों की पहचान की गई है जो सैलानियों के लिए और इतिहास के छात्रों के लिए जिज्ञासा और अध्ययन का विषय है । तिलौराकोट तौलिहवा में राजा शुद्धोदन के राजधानी का भग्नावशेष है । तिलौराकोट दरबार से ५०० मीटर उत्तर जोड़ा स्तूप है । कपिलवस्तु संग्रहालय और लुम्बिनी के संग्रहालय में बुद्धकालीन धातु, मिट्टी और पत्थर के हथियार आदि दर्शनीय सामग्री रखे हुए हैं । तौलिहवा से दो किलोमीटर दक्षिण कुदान में माना जाता है कि बुद्ध निर्वाण प्राप्ति के बाद पहली बार अपने पिता से मिले थे । यहीं कोइलीवन है, वहीं से थोड़ी दूर पर रामदतिवन स्थान है माना जाता है कि १४ वर्ष वनवास के क्रम में राम वहाँ रुके थे । वहीं पर चट्टान पर कुछ निशान है जिन्हें राम के तलवे के निशान के रूप में जाना जाता है । तौलिहवा से पाँच किलोमीटर दक्षिण गोटिहवा में अशोक स्तम्भ है, जिसे फाहिआन के अनुसारक्रकुच्छन्द बुद्ध द्वारा निर्वाण प्राप्त करने पर अपने पिता से मिलने की जगह पर बनाया गया था । तौलिहवा से सात किलोमीटर की दूरी पर निगाली सागर और निग्लिहवा अशोक स्तम्भ है । ऐसे ही कई स्थल यहाँ आसपास में है जो अपने अन्दर इतिहास समेटे हुए है । लुम्बिनी में विश्व के कई देशों के बुद्ध मंदिर हैं जो सौन्दर्य और कला की दृष्टि से अद्भुत हैं और पर्यटकों का मन मोहते हैं ।

काठमान्डौ से लुम्बिनी जाने के लिए बस और हवाई मार्ग दोनों की सुविधा है । यह क्षेत्र देश के अन्य भागों से सड़क मार्ग से जुड़ती है । भारत के उत्तर प्रदेश की सीमा यहाँ से जुड़ी हुई है । गोरखपुर से सुनौली क्रास करते हुए भैरहवा होते हुए लुम्बिनी आया जाता है । पर्यटकों के लिए यहाँ सारी सुविधाएँ उपलब्ध हैं । मंहगे और सस्ते दोनों प्रकार के होटल यहाँ आसानी से मिल जाते हैं । बौ४ अनुयायियों की यहाँ वर्षभर भीड़ लगी रहती है । प्राकृतिक सौन्दर्य जहाँ आँखों को तुष्ट करती है वहीं बौद्ध मंत्रोच्चारण और शांत वातावरण आत्मा को सुकून देती है

धनुषाः मिथिला क्षेत्र की पवित्र धर्मस्थली

राजा जनक द्वारा आयोजित स्वयंवर में श्रीराम के द्वारा तोड़े गए धनुष के नाम पर नेपाल के इस जिले का नाम धनुषा रखा गया है । जनकपुरधाम, मटिहानी, धनुषा और भारत स्थित सीतामढ़ी रामायण से सम्बन्धित क्षेत्र हैं और मिथिला संस्कृति के पोषक और परिचायक हैं । इस सम्पूर्ण क्षेत्र को मिथिला क्षेत्र कहा जाता है । नेपाल के तराई क्षेत्र में अवस्थित जनकपुर किसी परिचय का मुहताज नहीं है । जनकपुरधाम से १५ किलोमीटर उत्तर पूर्व में धनुषा गाँव है । यहाँ आज भी पत्थरों के टुकड़े और शिलालेख हैं जो इतिहास से हमें परिचित कराते हैं । दधिचि की हड्डी से बने हुए धनुष को यहीं श्रीराम के द्वारा तोड़ा गया है ।

 

१७वीं सदी में स्वामी चतुर्भुज गिरी ने राम मंदिर की स्थापना की । उसके कुछ समय बाद महात्मा सुरकिशोरदास ने जानकी जन्मस्थल निश्चित किया और वहाँ राजा माणिक सेन ने वि.सं । १७८४ में १४०० बीघा जमीन देकर जानकीमन्दिर की स्थापना की । उसके कुछ समय बाद लक्ष्मण मंदिर, जनकमंदिर आदि बने । यहाँ सीता कु०८, विवाहकु०८, धनुष सागर, गंगा सागर, विषहरा पोखर, राजदेवी मंदिर आदि का निर्माण हुआ जो आज भी विद्यमान है ।
जनकपुर एक ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहर है जिसकी संवृद्धि और सुरक्षा की आवश्यकता है । जनकपुर राजा जनक की राजधानी है । इसे तालाबों की नगरी भी कहा जाता है । जनकपुर में ही राजदेवी मंदिर है । जानकी मंदिर की छटा अपूर्व है । स्थापत्यकला का सुन्दर नमूना है जानकी मंदिर । जानकी मंदिर मुगलकला और हिन्दुकला का सम्मिलित उदाहरण है । जनकपुरधाम से कुछ पूर्व कपिलेश्वर महादेव स्थान पर उत्खनन से कुमार और योगमाया की प्राचीन मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं पुरातत्व विभाग के अनुसार ये मूर्तियाँ १०वीं और ९वीं सदी की हैं । जनकपुर के आसपास कई ऐसी जगहें हैं जिनपर अनुसंधान की आवश्यकता है । इतिहास से सम्बद्ध कई महत्वपूर्ण जानकारी इससे प्राप्त हो सकती हैं । जनकपुर नेपाल के किसी भी जगह से सड़क मार्ग से जाया जा सकता है । काठमान्डू से हवाईयात्रा की भी सुविधा है । यहाँ रहने और खानेपीने की अच्छी व्यवस्था है । इसकी सीमा भारत के बिहार राज्य से जुड़ी हुई है । वर्ष में लाखों की संख्या में यहाँ दर्शनार्थी आते हैं । नवम्वर महीने–कार्तिक शुक्ल पंचमी) में विवाह पंचमी के अवसर पर यहाँ की छटा देखते ही बनी है । माँ जानकी के विवाह के अवसर पर हजारों की संख्या में भारत के अयोध्या से बाराती आते हैं जिनका भरपूर स्वागत यहाँ किया जाता है । हर शाम गंगा आरती होती है । जनकपुर का छठ महोत्सव भी प्रसिद्ध है । किन्तु विवाहपंचमी के समय तो यहाँ की छटा ही निराली होती है । रामनवमी में भी यहाँ काफी संख्या में दर्शनार्थी आते हैं ।

 

जनकपुर के पास ही मटिहानी ग्राम है जिसका अत्यन्त महत्व है । मटिहानी पंचकोशी परिक्रमा के अन्तर्गत अवस्थित है । माना जाता है कि माँ जानकी का मटकोर–विवाह में होने वाला एक संस्कार) यहीं हुआ था । मिथिला महात्म में इस जगह को मृत्खनी अर्थात् मिट्टी कोड़ने की जगह बताया गया है । यहाँ की मिट्टी को इतना महत्वपूर्ण माना गया है कि कहा जाता है कि यहाँ आने से या वास करने से सम्पूर्ण जीवनचक्र से मुक्ति मिल जाती है । फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा में होने वाले परिक्रमा में जमात एक दिन के लिए मटिहानी में विश्राम करते हैं जिसमें यहाँ के निवासी जी खोलकर हिस्सा लेते हैं । माना जाता है कि त्रेतायुग में माँ जानकी का जहाँ जहाँ डोला रुका था वहाँ वहाँ परिक्रमा का डोला भी रुकता है जिसमें मटिहानी भी है । इस क्षेत्र के आसपास कई दर्शनीय स्थान हैं । तसमैया कूप, मृतखनी तालाब, विरजा नदी, दुग्धनदी, यमुना नदी आदि । इन नदियों की उत्पत्ति के विषय में कहा जाता है कि ये माँ जानकी की सेवा के लिए अवतरित हुई थीं । मृतखनी तालाब के पास ही वि.सं ।१७६६ में मकवानी राजा माणिकसेन के द्वारा यहाँ लक्ष्मीनारायण का मंदिर निर्माण किया गया था । जो आज भी वहाँ है । सरोवर के नैऋत्य कोण में नागा निर्वाण स्थल है । मिथिला क्षेत्र की यह धरती तपोभूमि के रूप में जानी जाती हैं । यह वैष्णवपीठ है मठाधीश की परम्परा की शुरुआत यहीं से मानी जाती है ।

 

यहीं जलेश्वर नामक स्थान है । जलेश्वर तालाब के विषय में कहानी है कि इस तालाब मेें आज भी नाग नागिन का वास है । जो समय समय पर निकलते हैं । यहीं शुकदेव मुनि का तप स्थल है जिनके नाम पर इस जगह का नाम सुगा पड़ा है । भार्गव सरोवर शुकदेव सरोवर और भृगु सरोवर यहीं हैं जिनमें स्नान करने की महत्ता है ।

 

मिथिला का यह सम्पूर्ण क्षेत्र एक गौरवशाली अतीत को अपने अन्दर समेटे हुए है । किन्तु सरकार की उपेक्षा की वजह से इस जगह को जो प्रसिद्धि और महत्ता मिलनी चाहिए थी वो नहीं मिली है । पर्यटन की भरपूर सम्भावना यहाँ है अगर इसे बढ़ावा दिया जाय तो इस क्षेत्र का रंगरूप ही बदल जाएगा । विश्व के मानचित्र पर जनकपुर या धनुषा जिला को ख्याति दिलाने के लिए सरकार को जो प्रयास करने चाहिए वो नहीं हो रहे हैं ।

हलेसी महादेव

काठमान्डू से २० से २५ घंटे की कष्टपूर्ण यात्रा या फिर ३० मिनट की हवाई यात्रा कर के हलेसी महादेव स्थान पहुँचा जा सकता है । पर्यटन की अत्यधिक संभावना से भरपूर है नेपाल किन्तु सरकार की उदासीनता या सरंक्षण की कमी के कारण कई ऐसे क्षेत्र हैं जो संकटग्रस्त हैं तथापि दर्शनार्थियों और धर्मावलम्बियों की भीड़ कठिनाइयों से जूझते हुए भी वहाँ तक पहुँचती हैं । ऐसी ही एक नैसर्गिक र्सौंदर्य से भरपूर जगह है हलेसी महादेव स्थान, जो खोटांग जिला के रापुरी में अवस्थित है । प्राकृतिक सौंदर्य का जीता जागता उदाहरण है खोटांग जिला, जिसके कण कण में सौंन्दर्य का वास है । खोटांग समुद्री तल से १५२ से ३६२० की ऊँचाई पर अवस्थित है । मनोरम पर्वत श्रृंखला और जलश्रोत बरवश आपको अपनी ओर खींचते हैं । पर्वतों की चोटियों से अठखेलियाँ करते बादल के टुकड़े और उनकी ओट से झाँकता सूर्य मन मस्तिष्क को सम्मोहित करने के लिए काफी हैं ।

हलेसी महादेव स्वनिर्मित गुफा में स्थित हैं । अपने विचित्र आकार प्रकार की वजह से यह गुफा अनायास ही सबको आकर्षित करती है । इस गुफा की बनावट को देखकर ईश्वर की संरचना पर व्यक्ति विस्मित हो जाता है । कुछ क्षण तक इस की अजीबोगरीब बनावट को देखने में मन रम जाता है । गुफा में प्रवेश करने से पहले भगवान गणेश का मंदिर है, भक्तगण पहले यहाँ पूजा करते हैं तत्पश्चात् गुफा के अन्दर प्रवेश करते हैं । भीतर जाने पर माँ पार्वती की प्रतिमा है उसके बाद गर्भगृह में भगवान शिव की २ फीट ऊँची शिवलिंग है, जो पत्थर से स्वनिर्मित है । गर्भगृह में प्रवेश करना कठिन नहीं है, नीचे उतरने के लिए सीढियाँ बनी हुई हैं । किन्तु दिन के भरपूर उजाले के बाद भी गुफा में पर्याप्त रोशनी की कमी होती है । बिजली की व्यवस्था होने के बाद भी आपूर्ति नहीं होती इसकी वजह से भक्तजन और दर्शकों को गुफा अवलोकन में कठिनाई होती है । गुफा के अन्दर चमगादड़ो की ध्वनि और कबूतरों की गुटरगुँ एक संगीतमय वातावरण तैयार करता है, जो भक्तगणों का प्रवेश करते के साथ ही स्वागत करते हैं ।
गुफा के अन्दर शिवलिंग के अतिरिक्त पंचमुखी पशुपतिनाथ, गणेश, पार्वती और भगवती आदि कई देवी देवताओं की मूर्तियाँ हैं । साथ ही प्रकृति द्वारा निर्मित कई अजीबोगरीब आकृतियाँ देखने को मिलती हैं जो किसी न किसी रूप का आभास कराती है । माना जाता है कि शिवलिंग के नीचे जलाशय है और शिवलिंग के ऊपर गौमुख आकार बना हुआ है, जिसके लिए किंवदंती है कि वह कामधेनु की आकृति है और प्राचीन काल में वहाँ से अविरल दुग्ध धार बहा करती थी । यहाँ की पूजा महंत मनोहर गिरी के पंचधर अविवाहित लड़के पंचोपचार विधि से सुबह शाम किया करते हैं । विश्वास है कि यह मंदिर परापूर्व काल से है किन्तु, इसकी विधिवत पूजा का प्रारम्भ राजा रण बहादुर द्वारा १८४० में गठित गुठी के द्वारा शुरु हुई है । यह क्षेत्र किरात जनजाति बाहुल्य क्षेत्र है । इसलिए किरातों के द्वारा उनके पारम्परिक तौर तरीकों से भी यहाँ पूजा अर्चना की जाती है । उनके पारम्परिक वेशभूषा और नृत्यगान सभी का मन मोहते हैं ।
हलेसी गुफा के भीतर पत्थरों से निर्मित पाँच द्वार हैं जिसे पाप और पुण्य के भाव से जोड़कर देखा जाता है । माना जाता है कि जो इन सभी द्वारों से होकर निकल आते हैं वो पुण्यात्मा होते हैं । पहले दो द्वार तो भक्त आसानी से पार कर जाते हैं लेकिन उसके बाद यह आसान नहीं होता है । अंतिम द्वार स्वर्ग द्वार है जिसे पार करना सम्भव नहीं है । इस गुफा के बाद बसहा गुफा है जिसका प्रवेश मार्ग संकरा है लेकिन आगे जाकर इसकी चौड़ाई बढ़ जाती है । इस गुफा में सिद्धि प्राप्त करने हेतु संत तपस्या करते हैं ।
गुफा के करीब ही बौद्ध धर्मावलम्बियों का गुम्बा है । हिन्दु धर्म और बौद्धधर्म के आपसी सहिष्णुता और ऐतिहासिक सम्बन्ध का परिचायक है यह स्थान । जितनी श्रद्धा से भक्त शिवलिंग की पूजा आराधना करते हैं, उतनी ही श्रद्धा से भगवान बुद्ध के चरणों में भी सर झुकाते हैं । यहाँ बौद्ध धर्म से जुड़े शिक्षार्थी शिक्षा ग्रहण करने हेतु आते हैं । वातावरण उनके द्वारा उच्चारित मंत्रों से गुंजित होता रहता है । बौद्ध गुरु पद्मसम्भव ने यहीं तपस्या की थी और सिद्धि प्राप्त की थी । इसलिए इस जगह को मानवदिका कहा जाता है । यह एक तिब्बती शब्द है जिसका अर्थ होता है कुमार्ग से सुमार्ग की ओर, असत्य से सत्य की ओर, कठिन से सरल की ओर और अधर्म से धर्म की ओर ।
इतनी महत्ता को समेटे यह क्षेत्र संरक्षण की कमी के कारण असुरक्षित होता जा रहा है । गुफा के ऊपर वृक्षों की जड़ें फैलती जा रही हैं, जिसकी वजह से गुफा क्षतिग्रस्त हो रहा है और प्रकाश की उचित व्यवस्था नहीं होने से कभी भी कोई दुर्घटना होने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है । सम्बन्धित निकाय, मंदिर व्यवस्थापन और सरकार का ध्यान इस ओर जाना अत्यावश्यक है ।

स्वर्गद्वारी

उत्तर पूर्व हिमालय की तलहटी में बसा एक छोटा और सुन्दर सा देश है नेपाल । कला, धर्म और प्राकृतिक सम्पदाओं का धनी एक प्राचीन राष्ट्र । एक तरफ चीन की सीमाओं और दूसरी तरफ भारत जैसे विशाल साम्राज्य से सटा हुआ नेपाल भले ही भू भाग में इन दोनों देशों के समकक्ष न हो किन्तु प्राचीन सांस्कृतिक विरासत में यह किसी भी अन्य देशों से कम नहीं है । इसी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत से जुड़ा नाम है स्वर्गद्वारी ।
गगनचुम्बी हिमशिखर की गोद में अवस्थित, प्राकृतिक सौंदर्य के आँचल में जडि़त पवित्र मणि है स्वर्गद्वारी । यह अपने सौंदर्य में अद्वितीय है । स्वर्गद्वारी प्यूठान जिला के सदरमुकाम खलंगा से करीब २६ किलोमीटर पश्चिम में अवस्थित है । यह नेपाल के प्राचीन सम्पदाओं में से एक है । यहाँ परापूर्व काल में ऋषि मुनि तपस्या किया करते थे । साधना की भूमि है स्वर्गद्वारी । यहाँ से जुड़ी कई मान्यताएँ है । माना जाता है कि यहाँ का ऐतिहासिक अग्निखंड गुफा, महादेव स्वर्ग जाने का रास्ता, यहाँ पाली गईं गायों और महाप्रभु के दर्शन से अत्यन्त पूण्य की प्राप्ति होती है । वैशाख पूर्णिमा, उभोली पर्व और बुद्ध जयन्ती के अवसर पर यहाँ मेला लगता है । समुद्री सतह से दो हजार एक सौ इक्कीस मीटर ऊँचाई पर है स्वर्गद्वारी । पर्यटकीय दृष्टिकोण से यह नेपाल का एक मुख्य स्थल है । यहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता, ऐतिहासिक मनोरम तालाब, आश्रम की यज्ञशाला, महाप्रभु ने जहाँ तपस्या की थी वह गुफा, वि । सं ।१९५२ से संचालित वेद पाठशाला, गोवद्र्धन पहाड़ यहाँ का मुख्य आकर्षण है जो पर्यटकों का मन मोहती है । वि । सं । १९५२ में वेद मंत्र द्वारा प्रगट किए गए अग्नि से संचालित यज्ञकु०८ यहाँ का विशेष आकर्षण है । वि । सं । १९५० में उत्खनन में प्राप्त पूजा सामग्री मिलने के बाद आश्रम का निर्माण किया गया । माना जाता है कि उक्त पूजा सामग्री महाभारत काल में पा०८व के द्वारा किए गए यज्ञ का है । यह १०९ वर्ष से निरन्तर महायज्ञ होम संचालन होनेवाला एकमात्र धार्मिक स्थल है । १९१६ श्रावण शुक्ल पुत्रदा एकादशी को श्री १०८ महाप्रभु का यहाँ अवतरण हुआ था । मिथक है कि भगवान शंकर से उन्हें शिक्षा मिली थी । यहीं प्रभु ने मानव कल्याणार्थ १९५२ में अख०८ यज्ञ कराया था तभी से यह यज्ञकु०८ प्रज्वलित है । यहाँ का मंदिर बिल्कुल साधारण है किन्तु इसकी मान्यता बहुत है । नेपाल सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए कि इसे पयंटकीय दृष्टिकोण से कैसे सजाया और सँवारा जाय । रहने के लिए धर्मशाला की व्यवस्था है । किन्तु पानी की किल्लत है ।
स्वर्गद्वारी पहुँचने के लिए बुटवल से १७० किलोमीटर पश्चिम और लमही से १७ किलोमीटर पूर्व जाया जाता है । रोल्पा, चकचके होते प्यूठान जाया जाता है । जहाँसे भालुआंग बाजार से ७५ किलोमीटर पहाड़ी रास्ता राप्ती नदी के किनारे किनारे तय करना पड़ता है । भृंगी से आधा किलोमीटर का रास्ता कच्चा है जो चढ़ाई का है इसे पैदल तय करना पड़ता है । घोड़े की सवारी की व्यवस्था है जो महंगी है । यहाँ का मौसम ठ०८ा होता है इसलिए जाने से पहले इसकी तैयारी कर लेनी चाहिए । तथा आवश्यक सामान से ज्यादा सामान नहीं ले जाना चाहिए क्योंकि उस स्थिति में पैदल रास्ता तय करना कठिन हो जाता है । आवागमन के लिए बस या फिर अपनी सवारी की ही सुविधा है । सवारी साधन ज्यादा नहीं हैं किन्तु असुविधा नहीं होती । एक सुविधा सम्पन्न पर्यटन स्थान बनाने हेतु पर्यटन विभाग को इस ओर अवश्य ध्यान देना चाहिए ।

पापनाशनी गोसाईकुण्ड


प्राकृतिक खजाने का मालिक है नेपाल, देवताओं और ऋषि मुनियों की भूमि है नेपाल । ऊपर वाले ने अपरिमित सौंदर्य दिया है नेपाल को । कण–कण में ईश्वर हैं और इसी क्रम में गोसाईंकु०८ की भी चर्चा होती है । यह रसुवा जिले में अवस्थित है । यहाँ ईश्वरीय सौन्दर्य और शांति प्राप्त होती है मानव को । पर्यटन, नैसर्गिक सौदर्य और धर्मस्थल के रूप में गोसाईकु०८ जाना जाता है । यहाँ तक पहुँचने के लिए आत्मबल और ईच्छाशक्ति दोनों की आवश्यकता है क्योंकि रास्ता सहज नहीं है ।
काठमान्डौ से जाने के लिए बालाजु से बस द्वारा अथवा अपनी निजी सवारी से नुवाकोट, त्रिशुली होते हुए धुन्चे नामक जगह पर पहुँचना पड़ता है । यहाँ तक की दूरी लगभग ११७ किलोमीटर की है जिसे तय करने में ८ से ९ घंटे लगते हैं । रात्रि विश्राम धुन्चे में करना पड़ता है उसके बाद का सफर पैदल तय करना होता है । सीधी चढ़ाई चढ़नी होती है । खन्दी, ढिमसा से चन्दनबारी पहुँच कर एक रात वहाँ भी गुजारनी पडतÞी है । तीसरे दिन च्योलांगपाटी, लौरीविना उकाली, बुद्ध डाँडा से होते हुए कु०८ पहुँचा जाता है । यहाँ तक पहुँचने में ६ से ८ घंटे पैदल चलना पड़ता है । इस तरह यहाँ तक पहुँचने में तीन दिन लग जाते हैं । पहाड़ी रास्ता होने के कारण कठिनाई तो होती है फिर भी हिमालय के सौन्दर्य को निहारते हुए रास्ता सहज हो जाता है । रास्ते में जगह–जगह पर रहने और खाने पीने की व्यवस्था है । कभी–कभी बारिश की वजह से पहाड़ से मिट्टी या चट्टान के गिरने से रास्ता बाधित हो जाता है तब यात्री को पैदल ही रास्ता तय करना पड़ता है । वैसे तो सुन्दरीजल होते हुए ठाडेपाटी, सूर्यकु०८ के रास्ते से भी गोसाईंकु०८ जाया जा सकता है लेकिन इससे ज्यादा अच्छा रास्ता धुन्चे वाला है । यहाँ दैनिक दो हजार तक रुपए खर्च हो जाते हैं । बस की सुविधा नहीं होने के कारण सामान ढुवाइ के लिए खच्चर मिल जाते हैं । वृद्धों और असमर्थों के लिए घोड़े की सवारी उपलब्ध है ।
हिन्दु धर्मशास्त्र में गोसाईं कुंड को भगवान शिव से सम्बन्धित माना जाता है । कहा जाता है कि जब देव और दानव में युद्ध हुआ तो दानवों की विजय हुई । फलस्वरूप अत्याचार का बोलवाला हो गया । अंततः देवगण भगवान विष्णु के पास पहुँचे और अपनी समस्या सुनाई । तब भगवान विष्णु ने उन्हें दानवों के साथ समुद्र मंथन की सलाह दी । देवताओं ने लोक कल्याण हेतु बहला फुसला कर दानवों को समुद्र मंथन के लिए तैयार कर लिया । जब मंथन हुआ तो कई बहुमुल्य वस्तु समुद्र से निकला । उसी क्रम में विष भी मिला जिसके पान से देव और दानव मरने लगे । उनकी सुरक्षा हेतु भगवान शिव ने विष पान किया । जिसके बाद उन्हें प्यास लगी । प्यास बुझाने के लिए उन्होंने त्रिशूल से पहाड़ में प्रहार किया जिससे गंगा का पानी निकला जो कु०८ में संचित हुआ और वही गोसाईंकु०८ कहलाया । भगवान शिव ने उसी जल से अपनी ताप मिटाई और प्यास बुझाई तत्पश्चात स्वयं उस कु०८ में विराजमान हो गए । जिसकी वजह से इस कु०८ की अत्यधिक महत्ता है । कहते हैं इसमें एक बार स्नान कर लेने से सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है । यह रोचक कथा पुराणों में उपलब्ध है । तामांग समुदाय के लिए भी गोसाईंकु०८ की अत्यधिक महत्ता है । हिन्दुधर्मावलम्बी और बौद्ध धर्मावलम्बी दोनों के लिए यह स्थान पवित्र धर्मभूमि है । जेष्ठ में होने वाले गंगा दशहरा और श्रावण पूर्णिमा में हिन्दु धर्मावलम्बी कु०८ में स्नान करने के लिए आते हैं । तामांग समुदाय भी श्रावण पूर्णिमा में झाँकी लेकर नाचते–गाते वहाँ जाते हैं । उनका विश्वास है कि सेसे बोन्पो गीत गाने से मनोकामना पूर्ण होती है । वैदिक तामांग शास्त्र में ‘गो’ का अर्थ सिर होता है और ‘सा’ का अर्थ मिट्टी है अर्थात हिमालय भूमि में यह कु०८ अवस्थित होने के कारण इसे गोसाईं कु०८ कहा गया है । तामांग भाषा में कु०८ को कार्पुछोकेर–सफेद कु०८), ग्यो, ह्वे आदि भी कहा जाता है । तामांग समुदाय के ही गोले वंश के लोग कु०८ में नहीं जाते हैं । स्थानीय लोक संस्कृति और गीत नृत्य सब का मन मोह लेती है । विदेशी पर्यटकों के लिए यह सबसे आकर्षण का केन्द्र होता है । बुद्ध चैत्य से ऊपर पहुँचने पर अन्नपूर्णा और कई हिमालय श्रृंखलाओं का अवलोकन होता है । बर्फ से आच्छादित चोटियाँ ऐसी लगती हैं मानो चाँदी के गहनों से उसने स्वयं को ढँक लिया हो । चाँदनी का आवरण, तो कहीं सूर्य की किरणों से स्वर्णिम होता आकाश मन को सम्मोहित कर लेता है । दृश्य ऐसे कि नजरें ना हटें । गोसाईंकु०८ के समीप ही कई कु०८ हैं, भैरवकु०८ सीताकु०८ आदि जिनकी महत्ता भी गोसाईंकु०८ की ही तरह है । धार्मिक आस्था का तो यह केन्द्र है ही, पर्यटकीय दृष्टिकोण से भी यह अद्भुत है ।
गोसाईंकु०८ जाने के लिए पूरी तैयारी की आवश्यकता होती है । गरम कपड़े, स्लिपिंग बैग, बरसाती, छाता, टार्च, नीचे बिछाकर बैठने के लिए प्लास्टिक सीट, ऐसे जूते जो न फिसले आदि अपने साथ जरूर रखनी चाहिए । सतर्कता के लिए प्राथमिक उपचार की सामग्री भी रखनी चाहिए । तरल पदार्थ का सेवन अच्छा होता है । रास्ता हड़बड़ी में तय नहीं करना चाहिए ऐसा करने से अस्वस्थ होने की संभावना अधिक हो जाती है । बहुत सावधानी के साथ ऊपर चढ़ना चाहिए । रास्ते में ज्यादा बातें भी नहीं करनी चाहिए । अगर उल्टी करने जैसा महसूस हो, चक्कर आए, तुरन्त–तुरन्त लघुशंका या दीर्घशंका जाने का मन करे तो घबराना नहीं चाहिए । ऐसा ऊँचाई पर चढ़ने के कारण होता है । किन्तु अगर ज्यादा परेशानी हो तो नीचे आ जाना चाहिए ।
भक्तों की गलत आदतों की वजह से कु०८ में भी प्रदुषण होने लगा है । कु०८ के आसपास होटल होने की वजह से गंदगी फैलने लगी है । अच्छा होता कि वहाँ सिर्फ मंदिर होते और होटल बुद्ध डाँडा में ही होते । आसपास कचरे की अधिकता हो गई है जिसका व्यवस्थापन आवश्यक है ।
गोसाईंकु०८ से सौगात के रूप में चौरी गाय के दूध से बने याक चीज, मक्खन, छुर्पी आदि लिया जा सकता है । यहाँ का चीज और आलु काफी प्रसिद्ध है । चीज का व्यापार तो काफी अच्छा है । घुन्चे में रसुवा का आलु, निहुरो, लालीगुराँस का जूस, वाइन, तामांग टोपी, झोला आदि भी खरीदा जा सकता है । अगर आत्मबल हो तो एक बार गोसाईंकु०८ की यात्रा अवश्य करनी चाहिए ।

प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर और धार्मिक आस्था का प्रतीक ः पाथीभरा

सुबह की पहली किरण ताप्लेजुंग को छूती है और उसे स्वर्णिम कर जाती है । ताप्लेजुंग नेपाल के दुर्गम जिलाओं में से एक है । नेपाल के सुदूर पूर्व में हिमालय और कंचनजंघा की गोद में अवस्थित है ताप्लेजुंग । यह जिला चीन के स्वशासित क्षेत्र तिब्बत और भारत के सिक्किम के करीब है । ताप्लेजुंग प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण जिला है ।
हिम से आच्छादित पर्वत श्रृंखला यहाँ की खासियत हैं । अत्यधिक ऊँचाई की वजह से पर्वत श्रंखलाएँ, बारह महीने हिमाच्छादित रहते हैं । असंख्य नदियाँ, झरने यहाँ की प्राकृतिक शोभा में चार चाँद लगाते हैं । यहाँ विश्व की असंख्य लोपोन्मुख जातियों के पशु–पक्षी भी पाए जाते हैं । यों तो नेपाल प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए विश्व विख्यात है किन्तु यह देवी–देवताओं का भी देश है । विभिन्न देवी–देवताओं का वास यहाँ माना गया है । हमारे धर्म ग्रंथ में भी यह मान्यता है कि सभी देवताओं का वास पर्वतों पर होता है । इसलिए भी शायद यहाँ मंदिरों का भरमार है ।
ताप्लेजुंग सिर्फ प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए ही नहीं साँस्कृतिक और धार्मिक आस्था के लिए भी प्रसिद्ध है । पाथीभरा का प्रसिद्ध मंदिर इसी जिले में अवस्थित है । पूर्वी नेपाल का यह धार्मिक मंदिर ताप्लेजुंग जिला के फुगलिंग बाजार से पूर्व उत्तर करीब १७.५ किलो मीटर की दूरी में है और समुद्र तल से इसकी ऊँचाई ३७९४ मीटर है । यह मंदिर अनाज से भरे टोकड़ी की तरह दिखाई देता है जिसे नेपाली भाषा में पाथी कहते हैं इसलिए सम्भवतः इसका नाम पाथीभरा कहा गया है । इस मंदिर की वजह से ताप्लेजुंग की अपनी एक विशेष पहचान है ।
पाथीभरा की यात्रा एक और मनोकांक्षा अनेक है । पाथीभरा मंदिर से जुड़ी कई किवदंतियाँ भी पाई जाती हैं । माना जाता है कि इस जगह पर किसी समय में चरवाहे अपने भेड़ बकरियों को रखा करते थे । हर रोज ये भेड़ बकरी दूर जाकर चरा करते थे और शाम होने पर लौट कर वापस आ जाया करते थे । किन्तु एक दिन ये वापस नहीं लौटे । चरवाहों ने उन्हें काफी ढूँढा पर वो तो न जाने कहाँ विलुप्त हो गए थे । चरवाहे अन्त में थक कर वापस उसी जगह आकर बैठ गए । उसके बाद वे पानी लेने नदी में गए और पानी लेकर वापस आए, किन्तु ऊपर आते–आते वो पानी जम कर नमक हो गया । चरवाहे फिर पानी लाने गए तो वह नदी ही सूख गई थी । इस घटना से वो अत्यन्त डर गए और फिर उन्हें नींद आ गई । सपने में उन्हें देवी ने दर्शन दिया कि तुमलोगों ने मेरा मान नहीं रखा इसलिए तुम्हारे जानवर खो गए हैं । सपने में ही चरवाहों ने देवी से प्रार्थना की कि उनके जानवरों को वापस लौटा दें, वो देवी की पूजा भेड़ों को चढ़ा कर करेंगे । ऐसी मनौती के साथ ही सुबह उजाला होते ही उनके सभी भेड़ बकरी वापस आ गए । यह देख कर चरवाहे अत्यन्त प्रसन्न हुए और एक अच्छे से भेड़ की बलि देकर उन्होंने देवी पूजा की शुरुआत की । तभी से यह परम्परा चली आ रही है ।
पाथीभरा का मंदिर काफी ऊँचाई पर अवस्थित है इसलिए वहाँ साँस लेने में कठिनाई होती है । यही कारण है कि ताप्लेजुंग का मुख्यालय फुगलिंग जो पाँच हजार नौ सौ चौरासी फीट की ऊँचाई पर अवस्थित है वहाँ भी पाथीभरा का एक मंदिर है, जहाँ वो श्रद्धालु जो मुख्य मंदिर तक नहीं जा पाते, पूजा अर्चना करते हैं । पाथीभरा तक पहुँचने के लिए यात्रा नेपाल के शहर विर्तामोड़ से शुरु होती है । विर्तामोड़, इलाम, पाँचथर चारआली होते हुए ताप्लेजुंग का मुख्यालय फुगलिंग जिसकी दूरी २३७ किलो मीटर की है की यात्रा बारह घंटे में सम्पन्न होती है । विर्तामोड़ से कई बस सुबह खुलती है । फुगलिंग से अपनी सवारी या किराए की सवारी से आगे की यात्रा कच्ची सड़क होते हुए तय की जाती है । वहाँ से सुकेटार जो आठ हजार एक सौ छत्तीस फीट की उँचाई पर है वहाँ पहुँचा जाता है । उसके आगे की यात्रा पैदल तय होती है । सुकेटार में विमान स्थल है । जो हवाई मार्ग से जाना चाहते है । वो काठमान्डू से चार्टर प्लेन से या फिर विराटनगर से विमान द्वारा जा सकते हैं । सप्ताह के चार दिन वहाँ से विमान की सुविधा है । सुकेटार में रहने की अच्छी सुविधा है । सुकेटार में तुम्बा, सुकुटी, सिष्णु की सब्जी आदि व्यंजनो का स्वाद लिया जा सकता है । सुकेटार से पूर्व उत्तर देउराली, रमिते डाँडा होते हुए पाथीभरा तक की यात्रा तय होती है । रमिते डाँडा अपनी प्राकृतिक सौंदर्य से पर्यटकों और तीर्थयात्रियों का मन मोह लेती है । लाली गुराँस की सुन्दरता हर ओर बिखरी होती है । यहाँ मन रम जाता है शायद इसलिए इसे रमिते डाँडा कहते हैं । पाथीभरा माता की पूजा की शुरुआत कान्छी थान से शुरु होती है । जो मुख्य मंदिर में जाकर पूर्ण होती है ।
पाथीभरा मंदिर के दर्शन और पूजा के लिए हर वर्ष लाखों की संख्या में वहाँ श्रद्धालु आते है । । एक दिन में ही दर्शनार्थ आने वालों की संख्या सौ दो सौ होती है और इसी संख्या में वहाँ रोज बलि भी दिए जाते हैं । एक और विशेषता भी यहाँ देखी जाती है, बलि चढाए जाने के बाद जो खून बहता है, वह वहीं गायब हो जाता है । यहाँ लोग अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए भी आते हैं और जब उनकी इच्छा पूर्ति हो जाती है तो भी आते हैं । प्राचीन काल से आज तक यह मान्यता चली आ रही है कि यहाँ आकर सभी इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है । और इसी कारण से यहाँ दिन ब दिन दर्शनार्थियों की संख्या बढ़ती जा रही है । इस यात्रा के क्रम में जगह–जगह रहने और खाने–पीने की भी सुविधा है जिसकी वजह से यात्रा आसान हो जाती है । यहाँ तक पहुँचना सहज नहीं है, किन्तु अगर मन में विश्वास और श्रद्धा हो तथा आत्मबल हो तो राह आसान हो जाती है । तभी तो बच्चे, बूढ़े, जवान सभी यहाँ आते हैं और माता का दर्शन कर अपनी मनोरथ पूरी करते हैं । सितम्बर–भादौ) से नवम्बर–कार्तिक) और मार्च–फागुन) से मई (बैशाख) तक का समय पाथीभरा दर्शन हेतु उपयुक्त है । बाकी समय यह स्थान हिममय होता है । हर ओर बर्फ ही बर्फ का साम्राज्य होता है । प्राकृतिक सौन्दर्य का धनी है ताप्लेजुंग और पाथीभरा की यात्रा जहाँ एक ओर आस्था का प्रतीक है वहीं इस यात्रा के दौरान प्रकृति के सुरम्य दृश्यों को देखने और महसूस करने का सुख प्राप्त होता है, वह निश्चय ही स्वर्गिक आनन्द से विभोर करता है ।

मनकामना, जहां मन की इच्छा पूरी होती है

‘मन’ अर्थात् हृदय, ‘कामना’ अर्थात् इच्छा । वह जगह जहाँ आपकी इच्छा पूर्ण होती है, वह है मनकामना मंदिर । प्राकृतिक सुरम्य वादियाँ, छोटी–बड़ी पहाडि़याँ और पहाड़ की चोटी पर अवस्थित माँ मनकामना का मंदिर । शहरीय कोलाहल से दूर, आँखों को सुकून देती वादियाँ आपका मन बरवश अपनी ओर खींचती है । काठमान्डू से मनकामना तक का सफर एक आनन्ददायक अनुभूति से होकर तय होता है ।
मनकामना मंदिर का अपना एक इतिहास है । १७ हवीं शताब्दी के राजा रामसिंह की महारानी लीलावती के साथ, मनकामना के स्थापना की कहानी जुड़ी है । जब राजा रामसिंह का निधन हुआ तो लीलावती उसके साथ ही सती होने को तैयार हुई, उसी समय उसने अपने परम भक्त लखन थापा को कहा कि, ‘चिन्ता मत करो मैं फिर आउँगी ।’ महारानी के पुनर्जन्म की बात सिर्फ लखन थापा को ही पता थी । माना जाता है कि मनकामना देवी के रूप में लीलावती का ही पुनर्जन्म हुआ है । बात चाहे जो भी रही हो पर भक्ति, आस्था से जुड़ी भावना होती है, जहाँ तर्क या कुतर्क के लिए जगह नहीं होती । त्रिशुली और मस्र्याङदी नदी को पार कर, अन्नपूर्ण और मनास्लु हिमाल का अवलोकन करते हुए मनकामना मंदिर तक का रास्ता तय होता है । मंदिर का मुख्य द्वार चिम्केश्वरी पर्वत की तरफ है । माना जाता है कि यहाँ आकर मन की सभी इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं । यहाँ भक्तगण की बढ़ती भीड़ को देखकर अनायास ही इस बात पर यकीन करने का मन कर जाता है । प्रत्येक वर्ष पुनः दर्शन की प्रतिज्ञा के साथ यहाँ भक्त आते हैं और संतुष्ट होकर जाते हैं ।
लोकविश्वास और पौराणिक कथा के अनुसार शाहवंशीय गोर्खाली राजा का दीर्घ शासन भी मनकामना माँ के आशीर्वाद से ही सम्भव हो पाया था । इस मंदिर से जुड़ी एक और कथा प्रचलित है । कहा जाता है कि खेत में हल चलाने के क्रम में एक किसान के द्वारा किसी पत्थर में चोट लग गई । उस पत्थर से रक्त और दूध बहने लगा । जो रुक ही नहीं रहा था । इस बात की जानकारी लखन थापा को जब हुई तो, वह वहाँ पहुँचा । उसके बाद तांत्रिक के सहयोग से विधिनुसार पूजा अर्चना करके देवी को पुकारा गया फिर कहीं जाकर रक्त और दूध का बहना रुका । देवी ने राजा से अनुरोध किया कि उसका मंदिर निर्माण करे । तत्पश्चात मंदिर का निर्माण हुआ और उसकी देखभाल का जिम्मा लखन थापा को सौंपा गया । उसके बाद से आज तक उसकी ही सन्तति वहाँ की देखभाल और पूजा पाठ की जिम्मेदारी का निर्वाह कर रही हैं ।
मंदिर का निर्माण प्योगोडा शैली में हुआ है, इसकी छत चार तह में बनी है । मंदिर का प्रवेश द्वार दक्षिण पश्चिम में अवस्थित है । शनिवार और मंगलवार के दिन यहाँ काफी भीड़ होती है । इस मंदिर में पशुबलि भी दी जाती है कभी–कभी इसकी अधिकता के कारण यहाँ का परिसर रक्तमय हो जाता है ।
आज के वातावरण में जहाँ नेपाली जनता भविष्य के प्रति भयभीत और आशंकित है उनके भी आकर्षण का केन्द्र यह मंदिर बना हुआ है । अपनी आशंकाओं के निवारण हेतु जनता ही नहीं नेता भी मंदिर जाते हैं और शांति की कामना करते हैं ।

मनकामना की यात्रा अधिकांशतः

धार्मिक विश्वास के ही कारण की जाती है, किन्तु प्राकृतिक दृश्य के अवलोकन हेतु भी यहाँ की यात्रा की जा सकती है । रमणीय दृश्य, मंदिर के परिसर से दिखाई पड़ते हिमाल की ऊँची–ऊँची श्रृंखलाएँ मन को मोहती हैं और अपनी ओर खींचती हैं । सभी मौसम में यहाँ का सौन्दर्य निखर कर सामने आता है ।
एक समय था जब मनकामना की यात्रा अत्यधिक कष्टकर थी । पाँच–पाँच घन्टे की पैदल यात्रा वह भी सीधी चढ़ाई की । गन्तव्य तक पहुँचने में पूरा एक दिन लग जाता था । परन्तु अब वो समय गुजर चुका है । अब तो केबल कार के द्वारा यह यात्रा इतनी सहज हो गई है कि बार–बार जाने का मन करे । केबल कार के द्वारा दस मिनट में उस पार जाया जा सकता है । इस सुविधा के कारण सिर्फ भक्तजन ही नहीं पर्यटकों का भी मनचाहा स्थल बन गया है मनकामना । ख्यातिप्राप्त आस्ट्रियाली डप्पलमायर कम्पनी के द्वारा केबलकार का निर्माण सम्भव हो पाया है और यह शत प्रतिशत सुरक्षित है । काठमान्डू से कुरिनटार केबलकार तक पहुँचने में बस से तीन से चार घन्टे लगते हैं और पोखरा से बस यात्रा के द्वारा सिर्फ दो घन्टे लगते हैं । यहाँ मंदिर के आस–पास कई होटल और लॉज हैं जहाँ यात्री रुक सकते हैं । खाने–पीने की भी अच्छी व्यवस्था है । माड़वाड़ी और भारतीय होटल भी यहाँ उपलब्ध हैं । मनकामना तक जाने के लिए सिर्फ सड़क साधन ही उपलब्ध हैं । एक दुखद पहलू यह है कि इतने महत्वपूर्ण मंदिर की सही देखभाल न तो मंदिर न्यास, न पर्यटन बोर्ड और न ही सरकार की ओर से हो पा रही है । मंदिर की अवस्था दिन प्रतिदिन जर्जर होती जा रही है जिसके लिए समय रहते ध्यानाकर्षण की आवश्यकता है ।

झापा जहां इतिहास कैद है

झापा का कीचकबध महाभारतकालीन कथा से जुड़ा हुआ है, प्रचार से परे होने के बावजूद नेपाल का महत्वपूर्ण पर्यटकीय स्थल हो । चन्द्रगढी विमानस्थल से १० किलोमीटर दक्षिण भद्रपुर नगरपालिका वडा नं २ में १० बिघा क्षेत्रफल में अवस्थित इस क्षेत्र में दो हजार वर्ष से भी अधिक पहले का दरबार, किला, दीवार, बर्तन और इँट आदि पुरातत्व विभाग ने खुदाई में प्राप्त किया है । विसं २०५९ में पहली बार उत्खनन में स्वस्तिक चिह्न के इँट किचकबध स्थल में मिला था । सात कोठे दरबार और दुर्ग में प्राप्त सामान ईशा पूर्व २०० के शुङ्ग–कुषाण काल का होने का अनुमान पुरातत्व विभाग ने किया है । कीचकबध स्थल का नाम महाभारत काल में द्रापदी पर कुदृष्टि रखने वाले कीचक के वध के कारण पड़ा है । कीचक राजा विराट का साला था । राजा के विराट के दरबार में पा०८वों के साथ ही द्रौपदी गुप्तवास के समय छद्म वेश में रहने के समय उसपर कीचक की कुदृष्टि पड़ी । उस समय भीम जो राजा विराट के रसोइए के रुप में वहाँ था उसने कीचक का वध मुक्के से किया था इसलिए इसे कीचकवध स्थल कहा गया । यह किवदंती इस स्थान से जुड़ी हुई । यहाँ की बनावट देखकर इस बात की सच्चाई का अनुभव होता है ।
कीचकबध स्थल में भीमसेन द्वारा कीचक का वध करते हुए दो मुर्तियाँ बनी हुई हैं । हरेक वर्ष माघ शुक्ल पूर्णिमा के दिन यहाँ धार्मिक मेला लगा करता है । मेला में सभी धर्म और सम्प्रदाय के लोग उत्साह से भाग लेते हैं । कीचकबध स्थल को उत्तरी भाग में रहे पुराने पोखरी में विशेष पूजा की जाती है । प्राकृतिक दृश्यावलोकन के लिए सुन्दर मेची और देउनिया नदी के दोभान में अवस्थित कीचकबध परिसर में सतीदेवी, विष्णुपादुका और शिव का मन्दिर है । परिसर के पश्चिम भाग में कलात्मक पुराना दरबार और भवन के भग्नावशेष हैं ।

धरान सौन्दर्य एवं संस्कृति का अद्भुत समन्वय

धरान पर्यटकीय सम्भावना से भरपूर शहर है । नेपाल के पूर्वी पहाडी जिले के प्रवेशद्वार तथा पहाड और तराई को संगम स्थल, भौगोलिक स्थिति, हवा पानी, यहाँ के विभिन्न धार्मिक तथा ऐतिहासिक महत्व के स्थलों के साथ ही इसके आसपास के विभिन्न धार्मिक तथा पर्यटकीय महत्व के स्थल तथा वस्तु यहाँ की पर्यटकीय सम्भावना को दिखाती है ।
धरान के उपरी हिस्से में बसे विजयपुर डाँडा और वहाँ के विभिन्न धार्मिक तथा ऐतिहासिक महत्व के मठमन्दिर तथा उन मन्दिरों में विभिन्न समय में लगने वाले धार्मिक मेला, बारहो महीने चलने वाली ठंडी हवा, पानी स्थल भेडेटार तथा वेलायत के युवराज चार्ल्स द्वारा चढने वाला पहाड चार्ल्स प्वाइन्ट (भेडेटार भ्यू टावर) तथा धरान में विकसित हो रहे विभिन्न पार्क ने धरान को पर्यटकीय केन्द्र के रूप में विकसित किया है । धरान के आसपास के धार्मिक महत्व के स्थान तथा वहाँ लगने वाले मेला वराहक्षेत्र, विष्णु पादुका, रामधुनी, पञ्चायनधाम आदि भी धरान को धार्मिक पर्यटकीय महत्व को दर्शाता है । इसी तरह कोशी टप्पु वन्यजन्तु आरक्ष भी पर्यटकों को आकर्षित करता है । धरान से पूर्वी पहाडी जिला के रमणीय जगहों धनकुटा, ताप्लेजुङ, कुम्भकर्ण हिमाल, कन्चनजंगा हिमाल, मकालु वरुण राष्ट्रीय निकुञ्ज, अरुण उपत्यका, तिनजुरे, मिल्के (लालीगुराँस क्षेत्र), गुफा पोखरी, सभा पोखरी, ह्यात्रुंग झरना आदि का प्रवेश मार्ग भी धरान ही है जो इसके महत्त्व को और भी बढाता है ।
धरान के विभिन्न जाति जनजातियों की सांस्कृतिक और परम्परागत रहनसहन तथा रीति रिवाज भी यहाँ का एक आकर्षक पहलू है । राई जाति का साकेला नाच (उँधौली उँभौली पूजा), लिम्बू जाति का धाननाच, नेवार जाति का लाखेनाच, गाईजात्रा, तामाङ्ग जाति का शेलो, गुरुङ्ग जाति का रोदीधर तथा क्षेत्रीवाहुन जाति का बालननाच तथा संगिनी आदि धरान की एक खास पहचान है जिसका अवलोकन एक अद्भुत अनुभव से परिचित कराता है ।

दोलखा– भीमसेन दोलखा टाउनशिप के ऊपरी भाग में भीमेश्वर का मंदिर स्थित है, जो दोलखा भीमसेन के नाम से अधिक लोकप्रिय है । दोलखा के लोग भीमेश्वर को अपने सर्वोच्च प्रभु के रूप में हैं । बिना छत के इस मंदिर में एक शिव लिंग है, जिसके नीचे एक पवित्र सरोवर है । इस मंदिर में बाल चतुर्दशी, राम नवमी, चैत्र अष्टमी और भीम एकादशी जैसे अवसरों पर इस मंदिर में मेले लगते हैं । दशहरा त्योहार के दौरान, यहां बकरों की बलि दी जाती है ।
भीमेश्वर मंदिर से लगभग २०० मीटर पर त्रिपुरसुंदरी का मंदिर है जहां चैत्र अष्टमी तथा दशहरा के त्योहारों के दौरान श्रद्धालु एकत्र होते हैं । इस मंदिर में केवल इस मंदिर के पुजारी को ही मंदिर में रखी प्रतिमा के दर्शन करने की अनुमति है ।

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देवघाट–देवघाट काली गंडकी और त्रिसूली नदियों के संगम पर स्थित एक लोकप्रिय तीर्थ स्थान है । यह निकट ही चितवन राष्ट्रीय उद्यान के उत्तर में स्थित है । जनवरी में मकर सक्रांति त्योहार के दौरान, हिंदू श्रद्धालु यहां नदी में पवित्र डुबकी लगाने के लिए एकत्र होते हैं । देवघाट के आसपास बहुत से दुर्लभ और ऐतिहासिक स्थल हैं– त्रिवेणी मंदिर और बाल्मीकि आश्रम जहां महान ऋषि बाल्मीकि विश्राम किया था, सोमेश्वर कालिका मंदिर और किला, पांडवनाग जहां एक बार महाभारत के मुख्य पात्र रहे थे तथा पाल्पा के पूर्व राजाओं द्वारा निर्मित कबिलासपुर किला भी अवस्थित है ।
मुक्तिनाथ– यह माना जाता है कि एक बार इस मंदिर में जाने से सभी प्रकार के कष्टरशोक से राहत मिल जाती है (मुक्ति । निर्वाण, नाथ । भगवान) । भगवान मुक्तिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर मुस्तांग जिले में, जोमसोम से १८ किमी उत्तर पूर्व में लगभग ३,७४९ मीटर की ऊंचाई पर स्थित है । मुख्य मंदिर पैगोडा आकार में भगवान विष्णु को समर्पित एक मंदिर है । इसके चारों ओर दीवार में बने १०८ नाले हैं जिन से पवित्र पानी डाला जाता है । मंदिर के एक ऊंची पर्वत श्रृंखला पर स्थित है और साफ मौसम के दौरान लोग यहां आते हैं । काठमांडू से मुक्तिनाथ जाने के दो मार्ग हैं । या तो काठमांडू से पोखरा होते हुए जोमसोम के लिए एक सीधी उड़ान ली जाए और कागबेनी होते हुए ७÷८ घंटे पैदल यात्रा की जाए या पेखरा से ही पूरे रास्ते पैदल यात्रा की जाए जिस में ७÷८ दिन लगते हैं । यह माना जाता है कि भारत में चार धामों की तीर्थ यात्रा के बाद इस मंदिर की यात्रा करनी चाहिए ।

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इस मंदिर को बौद्धों के साथ ही हिंदुओं द्वारा भी पवित्र माना गया है । निकट ही स्थित ज्वाला माई मंदिर में एक झरना है और भूमिगत प्राकृतिक गैस से एक अखंड ज्योति प्रज्ज्वलित रहती है । जोमसोम अन्नपूर्णा क्षेत्र में एक प्रमुख केंद्र है । जोमसोम में विश्व स्तरीय आवास सुविधाएं हैं जहां से एक उल्लेखनीय प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लिया जा सकता है ।
स्वयंभूनाथ–बौद्ध धर्म के विभिन्न स्वरूप नेपाल में प्रचलित हैं, संभवतः एक हजार वर्ष पूर्व भारत से बाहर गए प्राचीन बौद्ध धर्म से संबंधित है स्थानीय नेवार लोगों का बौद्ध धर्म शेरपा, तमांग और तिब्बती लोगों का बौद्ध धर्म और थेरावादीन का अपेक्षाकृत आधुनिक क्षिप्राक्रमण या दक्षिण बौद्ध धर्म.
केंद्रीय विश्वास तथा प्रथाएं इसके संस्थापक राजकुमार सिद्धार्थ गौतम के समय की हैं, जिनका जन्म लगभग ५३४ ईसा पूर्व में दक्षिणी तराई में लुम्बिनी में हुआ था । २९ वर्ष की आयु तक, अपने महल की दीवारों से बाहर की दुनिया की समस्याओं और पीड़ाओं से पूरी तरह अनजान, युवा राजकुमार ने अपने पिता के महल में एक संरक्षित जीवन जिया । एक दिन उन्होंने उन्हें महल से बाहर ले जाने के लिए अपने सारथी को मना लिया, जहां एक बूढ़े आदमी, एक बीमार आदमी, एक शव तथा एक तपस्वी को देख कर वे अन्यंत दुखी हुए । दुनिया के असली दुखों की अनुभूति ने राजकुमार को अपने वैभवशाली जीवन का परित्याग करने को प्रेरित किया और वे मानव पीड़ा को समाप्त करने के लिए ज्ञान की खोज में वनों में चले गए । गौतम ने कई वर्षों तक तपस्या की किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली । एक रात्रि को बोधगया के जंगल में एक पीपल के वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हो गया । इसके बाद से वे महात्मा बुद्ध, एक ज्ञानी कहलाए और उन्होंने ज्ञानोदय के लिए मध्यम मार्ग का उपदेश देते हुए उत्तरी भारत के चारों ओर तथा दक्षिणी नेपाल की यात्रा की । अस्सी वर्ष की उम्र में उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया ।

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