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क्यूरेटिव याचिका, जघन्य अपराधियों के प्रति पक्षधरता व सहानुभूति प्रदर्शन नहीं? डॉ• मुक्ता

 

डॉ• मुक्ता । कितने सचेत हैं हम और कितने वफ़ादार
दुष्कर्मियों को सुझाते हैं हर दिन
बच निकलने के नए विकल्प औ उपचार
सात वर्ष गुज़र जाने के पश्चात् दया-याचिका से पूर्व
क्यूरेटिव अथवा सुधारात्मक याचिका
दायर करना…अंतिम कानूनी हथियार
क्या यह हमारी संवेदनशून्यता को नहीं दर्शाता
सामूहिक बलात्कार व हत्यारोपियों को
नोटिस जारी कर सात दिन का समय दिया जाना
हमारा उन जघन्य अपराधियों के प्रति
पक्षधरता व सहानुभूति प्रदर्शन नहीं?

मन चाहता है जला डालूं
ऐसे संविधान को
बदल डालूं ऐसे कानून को
न्याय-व्यवस्था की ऐसी धाराओं को
जो आरोप सिद्ध होने के पश्चात् भी
ऐसे दरिंदों को प्रदान करती हैं
अपना पक्ष रखने का एक अन्य अवसर

क्या न्याय-व्यवस्था के विरुद्ध
लड़ाई लड़ने वालों व नित्य नये दांव-पेंच
दर्शाने वालों के विरुद्ध
दंड-व्यवस्था का प्रावधान उचित नहीं है?
देश में जब आरोपियों के साथ देने
व पनाह देने को देशद्रोह
व कानूनी अपराध स्वीकारा जाता
तो ऐसे मानवता के शत्रुओं के पक्ष में
कानूनी लड़ाई लड़ना किसी अपराध से कम है क्या?

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कानून की कितनी धाराओं व ख़ामियों
के प्रति सादर नतमस्तक हैं हम?
कितनी दकियानूसी परंपराओं व अंधविश्वासों
को सदियों से ढो रहे हैं हम?
क्यों नहीं हम इन्हें केंचुली सम उतार फेंकते
जो व्यर्थ हैं, निरुपयोगी हैं, निष्फल हैं
क्यों नहीं हम करते इन धाराओं में परिवर्तन?
जो समाज की आधी आबादी के हितों
की रक्षा करने में अक्षम हैं

यदि यह सब होता रहा
तो मुगल शासन की वापसी
बहुत जल्द हो जाएगी
शर्म आती है
जब हर दिन माता-पिता के अहाते
व सबकी उपस्थित में, बीच बाज़ार से अपहरण कर
मासूम बच्चियों के साथ दुष्कर्म के अमानवीय अविश्वसनीय दरिंदगी के हादसों को सरे-आम अंजाम दिया जाता और…
हम स्वयं को विवश अनुभव करते
शायद!हम सब अंधे हैं, नपुंसक हैं

क्या यह सब हमें कटघरे में खड़ा नहीं करता…
जब राह चलती लड़कियों को तेज़ाब
व ज्वलनशील पदार्थ से जला डाला जाता
या उनकी निर्मम हत्या कर दी जाती
परंतु इस ग़ैर ज़मानती अपराधियों को भी
दूसरा ग़ुनाह करने की स्वतंत्रता दे दी जाती
जिसका प्रणाम है…उन्नाव की दुष्कर्म-पीड़िता को
सबूत नष्ट करने के लिए जला डालना
और परिवारजनों को अंजाम भुगतने की
धमकी देना… हृदय को कचोटता है
हमारी प्रशासन-व्यवस्था पर प्रश्न उठाता है

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क्यों नहीं हम जुलूस,धरने
व विरोध प्रदर्शन करते
जैसा ग़ुनाह, वैसी सज़ा
ताकि उन दरिंदों को अहसास हो सके
उस मर्मांतक पीड़ा का
और उनके माता-पिता भी अपने आत्मज को
भीषण कष्ट में देख, न जी सकें, न मर सकें
जब छोटे-छोटे व्यर्थ के मुद्दों पर
विपक्ष के नुमाइंदे व विरोधी पक्ष के आमजन
एकता दिखलाते व अपनी पीठ थपथपाते नज़र आते
परंतु राजनेताओं को इससे फ़र्क नहीं पड़ता
क्योंकि वे मासूम, गरीब, दलित व आमजन की
संतान होती हैं, जिन्हें वर्षों से उपेक्षित समझा जाता शायद इसलिए ही उन पर नहीं ग़ौर किया जाता

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ठहरो! जनता आती है…जिसके आक्रोश
के सम्मुख तुम टिक नहीं पाओगे
जिस दिन यह क्रांति आयेगी…सारी व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जायेगी…गरीबों की आहें व
अजस्र आंसुओं का सैलाब डुबो देगा तुम्हें
और सारी व्यवस्था धरी की धरी रह जाएगी
दफ़न हो जायेंगी तुम्हारी रवायतें
मिट्टी में मिल जायेंगा तुम्हारा रू-आ-ब
और सुनामी का अंदेशा देतीं
सागर की गगनचुंबी लहरों से कैसे बचा पाओगे तुम अपनी सल्तनत, अपनी ज़िन्दगी, अपना अस्तित्व

एक दिन उन मासूमों की आहें व उनका चीत्कार
माता-पिता का हृदय-विदारक विलाप और संवेदनशील साहित्यकारों की
लेखनी से उठता धारदार ज्वार…
लील जाएगा तुम्हें आंसुओं का सैलाब
और तुम किंकर्त्तव्य विमूढ़ दशा में
सब देखते रह जाओगे
और दया याचिका से पूर्व
सुधारात्मक याचिका अथवा क्यूरेटिव याचिका
दायर करने का प्रावधान नहीं होगा तुम्हारे सम्मुख
आमीन…आमीन… आमीन

फ़ाइल चित्र

डॉ• मुक्ता,
माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

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