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नेपाल के लिए अविस्मरणीय रेणु

 

जन्मदिन विशेष

“मैं क्या कहता ∕ चूँकि जिस साल मेरा जन्म हुआ था, उसी वर्ष एक बड़े फौजदारी मुकदमे के सिलसिले में परिवार में पहली बार ऋण हुआ  । इसलिए दुलार से मेरी दादी और माँ रिनवा(ऋणवा) कहती थी । बाबू जी तमसाए हुए होते है. तभी इस नाम से पुकारते हैं । गाँव वाले यथायोग्य —रनवा, रुनु, रुनुक, रीनू कहते । ….यदि पहले फौजदारी होती तो मेरा नाम निश्चय ही फौजदारी पड़ता ।” 

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डॉ.श्वेता दीप्ति

चेखव ने कहा था,“कुछ लोग जीवन में बहुत भोगते सहते हैं — ऐसे आदमी ऊपर से बहुत हल्के और हँसमुख लगते हैं । वे अपनी पीड़ा दूसरों पर नहीं थोपते, क्योंकि उनकी शालीनता उन्हें अपनी पीड़ा का प्रदर्शन करने से रोकती है ।” रेणु ऐसे ही शालीन व्यक्ति थे । पता नहीं जमीन की कौन सी गहराई से उनका हल्कापन उभर आता था, यातना की कितनी परतों को फोड़कर उनकी मुस्कुराहट में बिखर जाता था । उनके लम्बे बाल, एक संक्षिप्त और सहज मुस्कान जो अभिजात्य सौजन्य से भीगी रहती थी । यह था सीधे शब्दों में रेणु का व्यक्तित्व  । किन्तु सच तो यह है कि रेणु के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को कोई भी और किसी की भी लेखनी पूर्ण परिभाषित नहीं कर सकती ।

मैं कोशी क्षेत्र की हूँ, यानि पूर्णिया, सहरसा, फारबिसगंज, मधेपुरा इन शहरों से गुजरते हुए मेरा बचपन, मेरी युवावस्था गुजरी । जब भी औराही हिंगना या रेणु ग्राम से होकर गुजरने का अवसर मिला तो यूँ लगा कि कोशी की मिट्टी की वही सोंधी खुशबु मुझे छूकर गुजर गई है, जिस सोंधी खुशबु को रेणु की कृतियों ने हिन्दी साहित्य के जगत में ही नहीं, विश्व पटल पर बिखेर दिया है और आज भी उसकी सान्दर्भिकता है, आज भी साहित्य जगत उस खुशबु से सराबोर है । नेपाल और भारत का सम्बन्ध सदियों का है और आत्मीयता का है । अपने सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक धरातल पर दोनों देश समान रूप से देखे जा सकते हैं । जब नेपाल वास का आरम्भ हुआ तो मैं अनभिज्ञ थी यहाँ के परिवेश से । अपनी मिट्टी से अलग होने का दुख था मुझे । हिन्दी साहित्य की छात्रा थी मैं, सहज ही इससे मेरा लगाव और जुड़ाव था । एक बार तो लगा मैं कट गई किन्तु जैसे जैसे यहाँ से परिचित हुई और भारतीय साहिय और साहित्यकारों के प्रति यहाँ की धारणा को जाना तो एक गौरवमयी और सुखद अनभूति का अहसास हुआ । इसी सन्दर्ध में यह भी जानने का अवसर मिला कि, नेपाल के लिए रेणु और रेणु के लिए नेपाल क्या मायने रखता है । रेणु का नाम नेपाल के राजनीतिक और साहित्यिक दोनों ही क्षेत्रों में स्पृहणीय और अविस्मरणीय है । रेणु ने नेपाल के सौ वर्षों के क्रुर तानाशाही राणाशासन के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई में स्वयं भाग लेकर और नेपाली क्रान्ति कथा लिखकर यहाँ के पिछले स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास को अमर बना दिया है । साहित्यकार के रूप में नेपाल में उनकी प्रतिष्ठा उतनी ही मजबूत है, जितनी कि उनका नेपाली मुक्ति युद्ध के सहयोगी सिपाही के रूप में है । रेणु का नेपाल से जो आत्मीय सम्बन्ध है, वह तो इस बात से भी जाहिर होता है कि फणीश्वर नाथ आज जिस रेणु नाम से प्रसिद्ध हैं वह भी नेपाल का ही दिया हुआ है । जिसकी चर्चा उन्होंने स्वयं अपने संस्मरण में किया है कि उन्हें रेणु नाम पिताजी अर्थात् उनके दोस्त पिता(बाबुजी के मित्र) श्रीकृष्ण प्रसाद कोइराला ने दिया था —

उन्होंने मुझसे पूछा—“घर में किस नाम से पुकारते हैं तुम्हें ?”

“मैं क्या कहता ∕ चूँकि जिस साल मेरा जन्म हुआ था, उसी वर्ष एक बड़े फौजदारी मुकदमे के सिलसिले में परिवार में पहली बार ऋण हुआ  । इसलिए दुलार से मेरी दादी और माँ रिनवा(ऋणवा) कहती थी । बाबू जी तमसाए हुए होते है. तभी इस नाम से पुकारते हैं । गाँव वाले यथायोग्य —रनवा, रुनु, रुनुक, रीनू कहते । ….यदि पहले फौजदारी होती तो मेरा नाम निश्चय ही फौजदारी पड़ता ।”

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मैंने यथासाध्य नाम को सुधार कर कहा—“राणा कहते हैं ।”

आसपास सभी एकत्रित सभी हँसे । मेरे मित्र तारिणी ने कहा—“यह राणाशाही नहीं चलेगी यहाँ ।”

पिताजी बोले —“लो, यह रेणु हो गया ।”

और आज यही रेणु रह गया है । नेपाल से रेणु का क्या और कैसा रिश्ता रहा है यह रेणु ने अपने संस्मरणात्मक लेख में इतनी सरसता के साथ उल्लेख किया है कि यह लेख न होकर कहानी का रस प्रदान करती है । नेपाल को उन्होंने अपनी सानो आमा(छोटी माँ) कहा है और बहुत ही आदरणीय भाव से कहते हैं कि — “जब कभी नेपाल की धरती पर पाँव रखता हूँ, पहले झुककर एक चुटकी धूल सिर पर डाल लेता हूँ । रोम रोम बज उठते हैं—स्मृतियाँ जग पड़ती हैं । …जय नेपाल ∕ नेपाल मेरी सानो आमा ।”

विराटनगर में स्व. कृष्णप्रसाद कोईराला, जो नेपाल के गाँधी माने जाते हैं, जिन्हें रेणु पिताजी कहते थे, उन्होंने एक स्कूल खोला था । जो नेपाल तराई का शायद सबसे पहला स्कूल था । उसी स्कूल में रेणु का दाखिला हुआ और प्रारम्भिक शिक्षा उन्होंने वही प्राप्त की । उनके छोटे पुत्र तारिणी प्रसाद से रेणु की बहुत जमती थी । दोनों की रुचि भी समान थी । दोनों साहित्य के रसिक थे । कोइराला परिवार के सदस्य के रूप में ही रेणु को जाना जाता था । रेणु स्वयं लिखते हैं कि—“इसके बाद, कभी लगातार तीन महीने तक अपने गाँव में नहीं रहा । आज तक नहीं । १९३५ से १९४२ तक पिताजी के सहज स्नेह का अधिकांश हिस्सा मुझे मिलता रहा । आश्रम तुल्य कोईराला निवास में मेरी सारी महात्वाकांक्षा को सहारा मिला । साहित्य, राजनीति और कला की त्रिवेणी कोइराला निवास । जहाँ भी रहा मन विराटनगर पर टंगा रहा । बाहर से जब लौटता सीधे विराटनगर पहुँचता । मेरे इस व्यवहार से मेरे बाबुजी, माँ दुखित होते, कभी कभी ।”

रेणु केवल कोइराला परिवार के सदस्य के रूप में नहीं थे बल्कि उनके व्यक्तित्व के विकास में भी कोइराला परिवार की बहुत बड़ी भूमिका रही ।  नेपाल की राजनीति और नेपाल के साहित्य में एक अद्वितीय नाम है विश्वेश्वरप्रसाद कोईराला, जिनके साहित्यिक सहयोगी के तौर पर रेणु को जाना जाता है । वी.पी की कई कहानियों का हिन्दी अनुवाद रेणु ने किया । स्वयं वी.पी मानते हैं कि रेणु उनका छोटा और आत्मीय भाई था । ‘नेपाली क्रान्ति कथा’ में कहते है—“सबसे बढ़कर रेणु मेरा छोटा भाई था । उसकी क्रान्किारी प्रवृत्ति और अन्याय तथा दमन का विरोध करने की उग्रता मेरी ही जैसी थी । उसके विचार मेरे अपने जैसे लगते थे । वास्तव में वह मेरा ही था ।”

नेपाल में प्रजातन्त्र की लड़ाई में रेणु ने बढ़–चढ़ कर हिस्सा लिया । राणा शासन को अपदस्थ करने हेतु नेपाली काँग्रेस ने १९५० में जब क्रान्ति छेड़ी तो उसमें रेणु भी शामिल थे । उस समय उन्होंने नेपाली काँग्रेस के प्रचार प्रसार तथा विराटनगर से स्थापित एक गैरकानूनी आकाशवाणी के संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की । वी.पी कहते हैं—“मेरे लिए रेणु मरा नहीं है । वह मेरे हृदय में जीवित है, हम प्रजातंत्र के सारे नेपाली या भारतीय सिपाहियों के हृदय में जीवित है । रेणु मर गया । लेकिन रेणु जिन्दा है, अपनी जिन्दादिली के लिए, अपने क्रान्तिकारी विचारों के लिए, तानाशाही के विरुद्ध संघर्ष के लिए, अपनी जिजीविषा के लिए….।”(नेपाली क्रान्तिकथा)

रेणु के तीन संस्मरणों — ‘एक कलाकार परिवार(बालकृष्ण सम)’, ‘दिलबहादुर दाज्यु’ और ‘मातृकाप्रसाद कोइराला के नाम से’ के अध्ययन से नेपाल के साथ उनके आत्मीय सम्बन्धों का पता चलता है । दिलबहादुर श्रेष्ठ का जीवटयुक्त निडर व्यक्तित्व, बालकृष्ण सम का बहुआयामी सौम्य साहित्यिक व्यक्तित्व और मातृकाप्रसाद कोइराला के उदारमना व्यक्तित्व ने रेणु के साथ अपनत्व के सूत्र को काफी दृढ़ता के साथ जोड़ा था । किन्तु यह दुर्भाग्य ही रहा कि नेपाल के साथ उनके इस आत्मीय रिश्ते को नेपाल की राजनीतिक परिस्थितियों ने ठेस भी पहुँचाया । जिस व्यक्ति ने नेपाल को अपनी छोटी माँ माना उसे ही यहाँ तिरस्कार भी झेलना पड़ा । इसकी चर्चा स्वयं रेणु ने भी की है । भारत और नेपाल की पारम्परिक मैत्री के बीच विभेद की क्रियाकलाप के प्रयास तथा इसी बहाने अपने ही देश के तराईवासी मधेशियों के प्रति उपेक्षा एवं असामान्य व्यवहार का अवांछित दृश्य जब उन्होंने देखा तो उन्हें जो मानसिक पीड़ा हुई उसे भी उन्होंने कई बार जाहिर किया है—“आज भले ही नेपाल की राजनैतिक पार्टियाँ उस जीत का सारा सेहरा अपने अपने सर बाँधने की कोशिश करें । लेकिन जो कोई भी ईमानदार इतिहासकार होगा, यह जरुर लिखेगा कि राणाशाही को आखिरी चोट देने में भारत का दिल दिमाग काम कर रहा था ।”

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उन्हें इस बात की भी तकलीफ थी कि, “काश ∕ कि हम इतना जान पाते कि हम जिस का साथ दे रहे हैं वही हमें दगाबाज और मक्कार कहेगा ।”

नेपाल को केन्द्र में रखकर रेणु ने तीन रिपोर्ताज लिखे हैं। (1) सरहद के उस पार (2) विराट नगर की खूनी दास्तान (3) हिल रहा हिमालय (नेपाली क्रांति कथा)। ये रिपोर्ताज नेपाल में हुए आंदोलन का प्रामाणिक दस्तावेज है, जो कि आज इतिहास बन चुका है। ‘सरहद के उस पार’ का प्रकाशन 2 मार्च 1947 को पटना से प्रकाशित पत्र ‘जनता’ में हुआ था। विराटनगर के मिल-मजदूरों पर राणाशाही के सहयोग से पूंजीपतियों द्वारा ढाये जा रहे जुल्म का चित्रण करते हुये रेणु ने सरहद पार की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक स्थिति का विवरण प्रस्तुत किया हैं। इसके प्रकाशन के बाद विराटनगर के मिल-मजदूरों का जुझारू आंदोलन शुरू हुआ। विराटनगर में पूँजीपतियों और राणाशाही के बीच सांठ-गांठ पर प्रहार करते हुए रेणु लिखते हैं ‘‘ यह उन्हीं सांपों की (चमड़िया, सिहानियां की) वादियाँ हैं, जिसमें वे आराम से लेटे नेपाल सरकार द्वारा दूध-लावा पाकर जहरीले सांपो की आबादी बढ़ा रहे हैं।‘ मजदूरों के साथ पशुवत् व्यवहार करने में जुटे मिल-मालिक ने मजदूरों को हक मागने तक का अधिकार नहीं दिया था। यूनियन बनाने से लेकर हड़ताल करने पर भी पाबंदी थी। लेकिन जहालत के गर्त में खींचने वाली सुविधाओं यथा मदिरालय, वेश्यालय, और जुए के अडडे का अंबार था। मजदूरों के बीच भूमिगत होकर मजदूरों को संगठित करने में जुटे रेणु महसूस करते हैं कि – ‘‘ बहुत जल्द ही इन पूंजीपतियों के घर में नेपाल राज्य बंधक पड़ जाएगा।‘ नेपाली समुदाय के अंदर सोयी वीरता जगाने में जुटे रेणु का अटूट विश्वास है कि जनता जागेगी और जनक्रांति का आगाज करेगी। रिपोर्ताज के प्रकाशन के साथ ही रेणु के क्रांतिकारियों ने साकार रूप धारण किया। इस रिपोर्ताज के प्रकाशन के महज दो दिन बाद विराटनगर के मजदूरों का ऐतिहासिक आंदोलन प्रारंभ हुआ। दरअसल इस रिपोर्ताज की रचना प्रक्रिया के पीछे छुपा था रेणु का संघर्ष। इस आंदोलन को कुचलने के लिये राणाशाही ने खूनी रास्ता अख्तियार किया था। राणाशाही की गोलियों से कई लोगों की मौत हुई, कई घायल हुये, इसी आन्दोलन में रेणु को गोली भी लगी थी। आंदोलनरत रेणु ने ‘विराटनगर की खूनी दास्तान’ नामक एक रिपोर्ताज उसी समय लिखा, जो स्वतंत्र पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुआ। लेकिन यह अभी तक अनुपलब्ध है। मजदूरों के आन्दोलन का नेतृत्व समाजवादी कर रहे थे। रेणु के प्रयास से कोइराला परिवार भी इस आंदोलन में शरीक हो गये। कोइराला परिवार का सहयोग मिलते ही यह आन्दोलन संपूर्ण नेपाल में फैल गया। राणाशाही के खिलाफ पहली बार नेपाली जनता सड़कों पर उतरी थी, हांलाकि इसे अंततः दबा दिया गया। इस आन्दोलन में रेणु भी गिरफ्तार हुए थे। जेल में इनके साथ काफी सख्ती बरता गया, जेल में भोगे हुये कष्ट को केन्द्र में रखकर ‘डी0एस0पी0 साहब की बड़ी-बड़ी मूंछे ’ नामक रिपोर्ताज लिखा जिसे पुस्तिकाकार रूप में प्रकाशित करवाया था, यह भी अनुपलब्ध है। सारांशतः रेणु के संघर्ष और उनके रिपोर्ताज ने नेपाली क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार करने में अहम भूमिका निभायी।

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1950 में पुनः राणाशाही के खिलाफ दूसरा सशस्त्र संग्राम शुरू हुआ, जिसे नेपाली क्रांति भी कहा जाता है। अंततः राणाशाही ध्वस्त हुई। 1951 में नेपाल में पहली बार प्रजातंत्र की स्थापना हुई। नेपाल में हिस्सा लेने वाले पूर्णिया के दशरथ शाह कहते हैं ‘‘ नेपाली क्रांति में रेणु पीठ पर वायरलेस कंधे पर बंदूक लेकर राणाशाही के खिलाफ लड़े थे। वह इस क्रांति की दिशा तय करने वालों में थे।’दरअसल आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार करने में रेणु की अहम भूमिका थी। इस आंदोलन केन्द्र में रखकर रेणु ने ‘जनता’में  ‘हिल रहा हिमालय’ नामक धारावाहिक रिपोर्ताज लिखा था। दुर्भाग्य से यह रिपोर्ताज उपलब्ध नहीं है। नेपाली क्रांति के बीस वर्षों के बाद रेणु ने संस्मरण के आधार पर पुनः लिखा। ‘दिनमान 1971 के अंकों में किस्तवार प्रकाशित रेणु की रचनाएं युद्ध रिपोर्टिंग का अदभुत नमूना है। दरअसल में यह नेपाली जनता के लिए जागरण गीत है, जिसे गाते हुये आम जनता ने लोकशाही की स्थापना हेतु लगभग डेढ़-दो माह तक राणाशाही के खिलाफ सशत्र संघर्ष किया था। यह संघर्ष शोषण से मुक्ति का और राणाशाही के राक्षसी कुकृत्य पर मानवीयता के विजय का प्रतीक है। रेणु ने पात्रों के माध्यम से घटना का संपूर्ण विवरण प्रस्तुत किया है। युद्धक्षेत्र भारत नेपाल सीमा से लेकर काठमांडू तक फैला है। विराटनगर स्थित कोइराला निवास, मालखाना, जेल से लेकर वीरगंज , धनकुटटा और कोषी के कुशहाघाट से पटना तक में हो रही घटनाओं का लेखाजोखा है। युद्धभूमि में रायफल से लेकर मषीनगण की तरतराहट और बम गोलों के धमाकों के बीच राणाशाही सैनिकों से लोहा लेते सैनिकों की वीरगाथा का विवरण कथा को रोचक बनाती है। शंकरजंग, हिरण्यजंग, सरीखे नौजवानों का युद्ध के मैदान में कूदना  और बीच-बीच में कोइराला की जीवनी का चित्रण प्रेरणा प्रदान करते हैं। इस युद्ध में संघर्ष , हर्ष, विषाद , अवसाद व उल्लास के क्षण को रेणु जीते हुये प्रतीत होते हैं। यह युद्ध पाश विकता पर मानवीयता की जीत का भी प्रतीक है। वृद्ध, अपाहिज व मरीजों की हत्या जलती हुई लाशों के बीच रोते बिलखते चीखते चिल्लाते बच्चों को चुप्प कराते बी0 पी0 कोईराला का यह दृश्य पाशविकता पर मानवीयता का प्रतीक है।

यह  अकाट्य सत्य है कि रेणु, भारत और नेपाल की परम्परागत बन्धुता और आत्मीयता के साकार प्रतीक थे । उन्होंने इस देश को सदा सानो आमा(छोटी माँ) के ही रूप में देखा और हमेशा नेपाल की मिट्टी के प्रति श्रद्धानवत और नतमस्तक ही रहे । रेणु के व्यक्तित्व निर्माण में यदि नेपाल की भूमिका रही तो यह भी सच है कि रेणु ने हमेशा नेपाल की तत्कालीन परिस्थितियों में अपनी सक्रिय भूमिका का निर्वाह किया । रेणु के नेपाल सन्दर्भ का अगर आकलन किया जाय तो यह सहज ही कहा जा सकता है कि रेणु का नेपाल सम्बन्ध भावनाओं का, स्नेह का, प्रेम और आदर का, विश्वास और अन्तर्मन की निष्ठा का उत्कृष्ट दस्तावेज है । रागात्मकता और एकात्मकता के इस धरातल पर आकर देशों की सीमाएँ मिट जाती हैं और बाकी रह जाता है केवल मानवीय सम्बन्धों का विस्तृत और असीम संसार । वह संसार जिसकी कोई सीमा नहीं है । अगर कुछ है तो वह है निश्चल और अगाध स्नेह का संसार जहाँ सिर्फ मानवीयता और नैतिकता की धरातल है ।

नेपाल के लिए रेणु सदैव अविस्मरणीय हैं । दाे देशाें की सीमाओं काे आपने कभी नहीं माना यह उनकी इस देश के लिए आत्मीयता का परिचायक था । नेपाल और नेपाल की दशा और दिशा दाेनाें से आप बखूबी परिचित थे इसलिए यहाँ की हर बातें उन्हें अपनी लगती थी ।इस धरातल पर रेणु नेपाल की मिट्टी के सदा अपने थे, अपने हैं और रहेंगे ।

 

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