Sun. Jul 19th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

भाषण से चलता यह देश कब तक खड़ा रह पाएगा ?: श्वेता दीप्ति

 

  सियासत का असली चेहरा नजर आता है
लहू में डूबा अब ये चाँद नजर आता है ।

विश्व जहाँ एक बार फिर से जीने की राह तलाश रहा है । घरों में कैद हम जीवन की संभावना तलाश रहे हैं । वहीं आज जिन्दगी और मौत के बीच बेहाल नेपाली जनता सड़कों पर उतर आई है । बालुवाटार ही नहीं पूरा देश खुद–ब–खुद सड़कों पर है । न उन्हें महामारी का डर है और न ही गिरफ्तारी का । सच तो यह है कि देश की बीमार सरकारी तंत्र से दो–दो हाथ करने के लिए जनता लाचार हो गई है । महामारी से बचने के लिए दवा नहीं, सही व्यवस्था नहीं, सिर्फ भाषण है ।

भाषण से चलता हुआ यह देश न जाने कब तक खड़ा रह पाएगा ? इसे न तो देश की परवाह है, न जनता की, बस स्वार्थ की राजनीति में पद और पावर की पहचान रह गई है । आश्चर्य तो इस बात का है कि यहाँ मौत का भी सौदा होता आया है । विनाशकारी भूकम्प में भी जनता ने इसे भोगा और आज वैश्विक महामारी में भी यह देश भ्रष्टाचार का उदाहरण बन रहा है । रेमिट्यान्स से चलने वाला देश रेमिट्यान्स देने वालों के प्रति भी सहृदय नहीं हो पाया है । महँगे टिकट को खरीदने वाले ही देश का दर्शन कर पा रहे हैं, वो भी महीनों बाद सरकार ने इनकी सुध ली है । बाकी श्रमिक वर्ग आज भी विदेशों में भूखे मरने की स्थिति में हैं । उनकी परवाह सरकार को है ही नहीं । क्वरेन्टाइन के नाम पर होने वाली दुर्दशा सब देख रहे हैं ।

यह भी पढें   प्रतिनिधि सभा की बैठक दो सप्ताह के लिए स्थगित

वहाँ रह रहे लोगों को खाना घर से मिल रहा है । मामूली जाँच के साथ उन्हें घर भेजा जा रहा है । सरकार नमक, हल्दी का घोल पिलाकर इलाज की सलाह दे रही है । केन्द्रीय सरकार और स्थानीय सरकार सभी असफल नजर आ रहे हैं । सचमुच यह देश ईश्वर के भरोसे ही चल रहा है । एक नीतिविहीन सरकार और निरीह जनता, जिसका विरोध सिर्फ एक शोर बनकर थम जा रहा है । नक्कारखाने में तूती की आवाज भला कौन सुनता है ?

यह भी पढें   आज का पंचांग: आज दिनांक 15 जुलाई 2026 बुधवार शुभसंवत् 2083

जनता को बहलाने के लिए एक शगूफा यहाँ की हर सरकार के पास हमेशा रहा है । आज भी यह तुरुप का पत्ता फेका जा चुका है । जनता को एक काम मिल चुका है और वो इससे अपना मनोरंजन हमेशा की तरह कर रही है । खैर उम्मीद है कि यह तुरुप का पत्ता इस बार खेल को किसी निर्णायक मकाम तक पहुँचा दे । किन्तु यह भी सच है कि रास्ता आसान नहीं है क्योंकि अभी तो प्रमाण खोजना बाकी है । इसलिए हर बार की तरह यह खेल कहीं फिर शगूफा ही न बन कर रह जाए । खैर, जिन्दगी उम्मीद पर टिकी हुई है ।

यह भी पढें   बीआरएबीयू में प्रो. डॉ. रजनीश कुमार गुप्ता संभालेंगे विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर का कार्यभार

लेकिन सच तो यह है कि–
सियासत का असली चेहरा नजर आता है
लहू में डूबा अब ये चाँद नजर आता है ।

(संपादकीय, हिमालिनी)

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *