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उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे : गोपालदास नीरज

 


महान गीतकार और पद्मभूषण से सम्मानित कवि गोपालदास नीरज की आज जयंती है। उनका जन्म 4 जनवरी, 1925 को इटावा में हुआ था और निधन 19 जुलाई, 2018 को। उनका पूरा नाम गोपालदास सक्सेना ‘नीरज’ था। गोपालदास नीरज कवि नहीं, चलता-फिरता महाकाव्य कहा जाए तो गलत नहीं होगा। उम्र के 93 बरसों में उन्होंने अपनी लेखनी से साहित्यजगत, फिल्मजगत और काव्यमंचों पर एक अलग मिसाल बनाई। 19 जुलाई 2018 को इस बेशकिमती नगीने ने आंखें तों मूंद ली पर उनकी लिखी कविता और गीतों से वे हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेंगे।

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए, जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए…, नीरज के गीतों, गजलों और कविताओं में न सिर्फ प्यार और भाईचारे की सोच थी, बल्कि समाज को आईना दिखाती तस्वीर भी छिपी रहती थी। पद्मभूषण से सम्मानित साहित्यकार गीतकार, लेखक कवि गोपाल दास नीरज भले ही दूर चले गए हैं पर वो अपने पीछे अपनी अनमोल यादों को छोड़ गए हैं। नीरज ने सैकड़ों गीत लिखे और उन गीतों का जादू लोगों के सर चढ़कर बोला। उनकी लिखे ये गीत ‘कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे…’ और ‘ए भाई जरा देख के चलो…’ किसकी अजीज नहीं है। इन दोनों ही गीतों में जीवन का दर्शन छिपा है। इसके अलावा दर्जनों गीत जो फिल्मों में न सिर्फ हिट हुए बल्कि लोगों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी।

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धूल कितने रंग बदले डोर और पतंग बदले
जब तलक जिंदा कलम है हम तुम्हें मरने न देंगे

खो दिया हमने तुम्हें तो पास अपने क्या रहेगा
कौन फिर बारूद से सन्देश चन्दन का कहेगा
मृत्यु तो नूतन जनम है हम तुम्हें मरने न देंगे।

तुम गए जब से न सोई एक पल गंगा तुम्हारी
बाग में निकली न फिर हस्ते गुलाबों की सवारी
हर किसी की आँख नम है हम तुम्हें मरने न देंगे

तुम बताते थे कि अमृत से बड़ा है हर पसीना
आँसुओं से ज्यादा कीमती है न कोई नगीना
याद हरदम वह कसम है हम तुम्हें मरने न देंगे

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तुम नहीं थे व्यक्ति तुम आजादियों के कारवाँ थे
अमन के तुम रहनुमा थे प्यार के तुम पासवाँ थे
यह हकीकत है न भ्रम है हम तुम्हें मरने न देंगे

तुम लड़कपन के लड़कपन तुम जवानो की जवानी
सिर्फ दिल्ली ही न हर दिल था तुम्हारी राजधानी
प्यार वह अब भी न कम है हम तुम्हें मरने न देंगे

बोलते थे तुम न तुममें बोलता था देश सारा
बस नहीं इतिहास ही तुमने हवाओं को सवाँरा
आज फिर धरती नरम है हम तुम्हें मरने न देंगे

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए।
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।

जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए।

आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी
कोई बतलाए कहाँ जाके नहाया जाए।

प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए।

मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए।

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जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आँसू तेरी पलकों से उठाया जाए।

गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है, रूबाई है दुखी
ऐसे माहौल में ‘नीरज’ को बुलाया जाए।

जितना कम सामान रहेगा
उतना सफ़र आसान रहेगा

जितनी भारी गठरी होगी
उतना तू हैरान रहेगा

उससे मिलना नामुमक़िन है
जब तक ख़ुद का ध्यान रहेगा

हाथ मिलें और दिल न मिलें
ऐसे में नुक़सान रहेगा

जब तक मन्दिर और मस्जिद हैं
मुश्क़िल में इन्सान रहेगा

‘नीरज’ तो कल यहाँ न होगा
उसका गीत-विधान रहेगा।


नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गयी
पाँव जब तलक उठें कि ज़िन्दगी फिसल गयी
पात-पात झर गए कि शाख-शाख जल गयी
चाह तो सकी निकल न पर उमर निकल गयी
गीत अश्क़ बन गए
छंद हो हवन गए
साथ के सभी दिए, धुआँ पहन-पहन चले
और हम झुके-झुके
मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे!

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