‘ए भाई जरा देखकर चलो’ के अमर गीतकार गोपाल दास नीरज : डॉ. श्रीगोपाल नारसन

डॉ. श्रीगोपाल नारसन
गीतों के जादूगर गोपाल दास नीरज से मेरी मुलाकात एक बार नही, अनेक बार हुई है । उनके कई इंटरव्यू भी मैंने किये हैं । रुड़की शैलेंद्र सम्मान समिति ने उन्हें शैलेंद्र सम्मान से नवाजा तो गोपाल दास नीरज रुड़की के कई कवि सम्मेलनों की शान भी बने । उनके पुत्र बीएचईएल में सेवारत रहे, शायद इसी नाते उनका आगमन हरिद्वार और रुड़की में अधिक होता था । उन्होंने अपने साक्षात्कार के दौरान अपने जीवन से जुड़ा एक किस्सा सुनाया था कि सन १९३८ उनके पिता का देहांत कम उम्र में ही हो गया था । उनके फूफाजी हर महीने उनकी मां को छ रुपये भेजते थे, जिससे एटा में रह रहे तीन भाइयों, मां व नानाजी का खर्च चलता था । एक रुपये में सेर भर शुद्ध देसी घी मिल जाता था । हालांकि उस समय नून, तेल, लकड़ी से लेकर जरूरत की हर चीज के दाम आसमान छूने लगे थे तो उन्हें गरीबी चुभने लगी थी । गोपाल दास नीरज ने बताया था कि सन १९४२ का एक दौर ऐसा भी आया था, जब वे निःशुल्क कविताओं का पाठ किया करते थे । सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के पिता हरिवंश राय बच्चन ने उन्हें पहली बार काव्यपाठ की फीस दिलाई थी, तब फिरोजाबाद में नीरज को काव्य मंच मिला तो काव्यपाठ के लिए छ रुपये भी प्राप्त हुए ।
नीरज ने सुनाया था, ‘मुझको जीवन आधार नहीं मिलता है, आशाओं का संसार नहीं मिलता है’ । उन्होंने कोलकाता में भी भीषण अकाल के दौरान आमजन की सहायता के लिए निःशुल्क काव्यपाठ किया ।
हिन्दी काव्य साधना व हिंदी साहित्य सेवा के लिए उन्हें पदम् श्री, पदम भूषण, यश भारती जैसे बड़े सम्मानो से नवाजा गया । गोपाल दास नीरज हिन्दी फिल्मो मे दिए अपने अमर गीतो और कवि सम्मेलनों के मंचो पर गौरव पूर्ण मौजूदगी के लिए हमेशा याद किये जाते रहेंगे । उनसे उनके गीतो, कविताओ और हिन्दी फिल्मो मे उनके योगदान को लेकर कई बार चर्चाये हुईं तो उनका यही कहना रहा कि कलमकारों और फनकारों को संस्कृति और देश प्रेम के लिए लिखते रहना चाहिए । वे कहा करते थे कि जिस देश मे मन्दिर मस्जिद रहेंग, वहां आपसी मतभेद व झगड़े भी होते रहेंगे । गोपाल दास नीरज चाहते थे कि लोग इंसानियत की पूजा करे और सदकर्म को अपना धर्म माने । उत्तर प्रदेश के गाँव पुरावली में ४ जनवरी सन् १९२५ को जन्मे हिन्दी के सुविख्यात कवि, साहित्यकार, शिक्षक एवं कवि सम्मेलनों के मंचों के बेताज बादशाह एवं फिल्मी गीत लेखक गोपाल दास नीरज का मधुर स्वर अब प्रत्यक्ष नही सुन सकते क्योंकि १९ जुलाई सन् २०१८ को उनका निधन हो गया ।
गोपाल दास नीरज अपने समय के हिंदी साहित्य के जाने माने कवियों में शुमार रहे, जिनके बिना कवि सम्मेलन हमेशा अधूरा माना जाता था । उनके साहित्यिक योगदान में, दर्द दिया है, आसावरी, बादलों से सलाम लेता हूँ, गीत जो गाए नहीं, नीरज की पाती, नीरज दोहावली, गीत–अगीत, कारवां गुजर गया, पुष्प पारिजात के, काव्यांजलि, नीरज संचयन, नीरज के संग–कविता के सात रंग, बादर बरस गयो, मुक्तकी, दो गीत, नदी किनारे, लहर पुकारे, प्राण–गीत, फिर दीप जलेगा, तुम्हारे लिये, वंशीवट सूना है और नीरज की गीतिकाएँ जैसी अनेक पुस्तकों के रचना की । गोपालदास नीरज का असली नाम गोपालदास सक्सेना था । वे अपनी कड़ी मेहनत, लगन प्रतिभा, और बेजोड़ गीतों के दम पर गीतों के बेताज बादशाह कहे गए और उनके नाम से मंचीय कवि सम्मेलनों में भारी भीड़ उमड़ने लगी । यह नीरज के गीतों का ही कमाल था कि उनका परिचय ही उनके गीत के मुखड़े ‘कारवां गुजर गया कहार देखते रहे’, से दिया जाने लगा । वे पहले व्यक्ति रहे जिन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भारत सरकार ने दो–दो बार पदम् पुरस्कार से विभूषित किया, पहले पद्म श्री से, उसके बाद पद्म भूषण से वे सम्मानित किये गए । फिल्मों में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिये उन्हें
लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार मिला । पुष्प पारिजात के, काव्यांजलि, नीरज संचयन, नीरज के संग कविता के सात रंग, बादर बरस गयो, मुक्तकी, दो गीत, नदी किनारे, लहर पुकारे, प्राण–गीत, फिर दीप जलेगा, तुम्हारे लिये, वंशीवट सूना है और नीरज की गीतिकाएँ आदि के साथ ही गोपाल दास नीरज ने सैंकड़ों प्रसिद्ध फिल्मों के गीतों की रचना की । नीरज के गीत चाहे रेडियो पर सुने या फिर उनके मुख से किसी मंच से, दिल को सुकून देने वाले होते थे । गीतों का यह बादशाह जीवन के हर झंझावात से गुजरा । अपनी गरीबी को उन्होंने कभी किसी मंच से साझा नहीं किया ।
गोपाल दास नीरज ने अपना बचपन बड़े मुश्किल हालातों से गुजारा था । गंगा किनारे उनका घर था और उनके घर में बेहद गरीबी थी । लोग गंगा नदी में श्रद्धावश ५ पैसे, १० पैसे फेंकते थे, तो वे गोता लगाकर उन्हें निकालकर इकठ्ठा करते थे और इसी जमा पूंजी से घर का चूल्हा जलता था । एक साक्षात्कार में काफी कुरेदने पर उन्होंने बताया था कि उन्होनें गरीबी के दिनों में सब्जी बेची, रिक्शा चलाई ट्यूशन पढ़ाए, परन्तु किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया । वे इटावा की कचहरी में टाइपिंस्ट भी रहे । उन्हें कविता का कभी न मरने वाला का शौक लग गया था । उनका कल्पना से विवाह हुआ और बेटे सुनील के वे पिता बन गए । कुछ वर्ष पूर्व सब टीवी पर कवि शैलेष लोढ़ा के कार्यक्रम ‘वाह वाह क्या बात है’ में गोपाल दास नीरज को देखा । वे बेटे का सहारा लेकर कार्यक्रम में आए थे । सबसे पहले उन्होने प्रसिद्ध कवि रंग को एक कवि सम्मेलन में सुना तो उनके मन में एक बात बस गई कि उनका गला तो रंग जी से कही बेहतर है । बस फिर क्या था वे गाने लगे और गाने के लिए लिखने भी लगे । पहले ज्योतिष में कतई यकीन न करने वाले नीरज ने जब अपने भविष्य के बारे में पढ़ा कि वें विश्व विख्यात होगें तो वें बहुत हंसे थे पर सच यही था सन १९८३ में वे पहली बार विदेश में कवि सम्मेलन के सिलसिले में अमेरिका गए तो वहां अपनी शोहरत देखकर उन्हे खुद ही यकीन न हुआ क्योकि उनके फिल्मी गीतों का प्रभाव इस कदर था कि वे जहां भी जाते वहां उनके गीत उनसे पहले पहुंच जाते थे । निश्चित ही गोपाल दास नीरज स्वयं में साहित्य के एक आधार स्तम्भ थे, जिनका हमेशा के लिए चले जाना हमेशा खलता ही रहेगा ।
(लेखक वरिष्ठ लेखक के साथ मंचीय कवि भी है ।)

