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लकड़ी का पुल : मुकेश भटनागर

 

जब सच सामने आया तो बड़े भाई के आंसू आ गए और अपने छोटे भाई को गले लगा लिया। वहां खड़े सब लोग यह देख खुशी से झूम उठे।

अनवर वर्षों बाद शहर से अपने गांव जा रहा था रेल से उतर वह बैलगाड़ी में बैठ घर की ओर चला। अचानक रास्ते में बारिश हो जाने से, उसे पास के गांव में रुकना पड़ा, अंधेरा भी पड़ने लगा था। जिस सराय में वह रुका वह उसी गांव के सरपंच का था। रात में उसे झगड़ा होने की आवाजें सुनाई दीं। पूछताछ से पता चला – ‘यह दो भाईयों की लड़ाई है जो किसी गलतफहमी के कारण एक दो साल से सुलग रही है। कभी इन दोनों में अच्छे सम्बन्ध थे, दोनों का परिवार भी मिलजुल कर रहता था। उनके पिता ने मरते समय अपनी जमीन जायदाद, दोनों में आधी आधी बांट दी। बड़े भाई के हिस्से में फलदार वृक्षों का बाग आया तो छोटे भाई के हिस्से में खेतिहर उपजाऊ जमीन। परन्तु दोनों जमीन के टुकड़ों के बीच एक नहर बहती थी। छोटे भाई के खेत नहर के उस पार थे जहां पहुंचने में उसे काफी समय लगता था लेकिन वह हमेशा खुश रहता।

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छोटा भाई अपने खेतों में कड़ी मेहनत करता जिससे उसे हमेशा अच्छी फसल मिलती। जब कि बड़े भाई को बिना मेहनत किए हर मौसम में ढेरों फल मिल जाते। बड़ा भाई बिना मेहनत की कमाई से सेठ साहूकार बन गया और नाम प्रतिष्ठा हासिल कर ली और एक दिन गांव का सरपंच बन गया। किसी गलतफहमी के कारण उसका अपने भाई से मतभेद हो गया और वह अलग हो गया।’ लड़ाई झगड़े और गुस्से में बड़ा भाई, छोटे भाई की कोई बात ही नहीं सुन पाया कि वह क्या कहना चाहता था। अनवर को इतना तो समझ आया कि बड़ा भाई अपने बाग के चारों तरफ एक दिवार बना लेगा जिससे छोटे भाई का चेहरा वह कभी न देख पाए।

सवेरे सवेरे अनवर अनजान बनते हुए बड़े भाई के घर गया और उसे बताया कि वह एक कुशल बढ़ई है और कोई काम बताए। सरपंच तब भी गुस्से में था, उसने कहा की काम तो है पर वह अकेला नहीं कर सकता। अनवर ने उसे विश्वास दिलाया कि वह जो भी काम बतायेगा उसे अच्छी तरह पूरा करेगा।

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बड़ा भाई फिर अनवर को बाग के किनारे ले गया जहां लकड़ियों के बड़े बड़े लट्ठे पड़े थे और उसे बाग के चारों तरफ शाम तक आठ-आठ फिट ऊंची दिवार बनाने को कहा, मेहनताना तय किया और ज़रुरी सामग्री उपलब्ध करा के वह दिन भर के लिए बाहर चला गया।

सूरज ढलते जब वह लौटा तो देखा बाग के चारों तरफ़ कोई दीवार तो नहीं बनी लेकिन छोटे भाई के खेतों की तरफ़ से आता हुआ एक नया लकड़ी के पुल बना हुआ है। जिस पर से हो कर कुछ मजदूर, छोटे भाई के खेतों से आलु से भरी हुई बोरियां, शउसके बाग में रख रहे हैं। उसका छोटा भाई भी वहीं खड़ा है। उसे कुछ समझ में नहीं आया कि माजरा क्या है। तब अनवर ने बताया, कुछ वर्षों से बाग में आमों की पैदावार न होने से छोटा भाई चिंतित था और अपनी आधी फसल उसे देना चाहता था। बीती रात भी वह यही बात कहना चाहा रहा था पर आवेश में बात और बिगड़ गई। हम दोनों ने तब मिल कर पुल बनाने की योजना बनाई जो संयोगवश आज ही सफल हो गई।

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जब सच सामने आया तो बड़े भाई के आंसू आ गए और अपने छोटे भाई को गले लगा लिया। वहां खड़े सब लोग यह देख खुशी से झूम उठे।

बड़े भाई ने अनवर के फैसले और कार्य की सराहना करी और आभार प्रकट किया। उसे पारितोषिक देना चाहा लेकिन अनवर ने विनम्रता से उसे अस्वीकार करते हुए कहा कि आप दोनों भाइयों का मिलना ही मेरा मेहनताना और पुरस्कार है।

दोनों भाइयों ने उसे एक दिन के लिए अपने यहां रुकने को कहा तो अनवर यह कहते हुए आगे बढ़ गया – “मुझे आगे भी अभी ऐसे पुल बनाने हैं”।

मुकेश भटनागर

 

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