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नेपाल की राजनीति से उदासीन युवा : डॉ. श्वेता दीप्ति

 
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डा श्वेता दीप्ति, हिमालिनी अंक जून 022 । किसी भी देश के युवा अपने देश की राजनीतिक उपलब्धि और परिवर्तन के संवाहक होते हैं । किन्तु अफसोस कि नेपाल की राजनीति आज तक थके हुए कंधे पर कमजोर साँसें ले रही है । थके और बीमार चेहरे हमारे सामने हैं जिन्हें सही मायनों में अवकाश ले लेने की जरुरत है । जिनकेलिए सक्रिय राजनीति नहीं सलाहकार की भूमिका में आना उचित होगा । युवा राजनीति से कोसों दूर हैं, जबकि एकात्मक राजतंत्र के खिलाफ जनजागरण अभियान की शुरुआत से लेकर १९९० के बाद शुरू हुए जहांनिया राणा शासन तक तथा अंतिम मधेस आंदोलन तक विभिन्न क्रांतियों में नेपाल के युवाओं की भूमिका एवं उसका योगदान मजबूत रहा है, अविस्मरणीय रहा है । बावजूद इसके सत्ता के गलियारों में उनकी उपस्थिति नगण्य है ।

इतिहास गवाह है कि नेपाल के राजनीतिक आंदोलनों में युवाओं ने अपनी जान की बाजी लगा दी थी । विभिन्न उद्देश्यों के लिए किए गए आन्दोलनों में मानवीय क्षति हुई, भौतिक नुकसान हुए किन्तु, उसके साथ ही नेपाल में बहुत बड़ा परिवर्तन भी हुआ । इन आंदोलनों की सफलता कल के युवाओं के बलिदान के कारण है । चाहे निरंकुश पंचायत व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई हुई हो, दस साल का सशस्त्र संघर्ष हो या आखिरी मधेस आंदोलन, राष्ट्रहित के लिए घायल और लापता हजारों शहीदों का इतिहास ज्वलंत है । लेकिन नेपाल देश की अर्थव्यवस्था को विकसित करने के लिए अपनी उपलब्धियों का बुद्धिमानी से उपयोग करने में युवाओं की भूमिका शून्य है । इसके पीछे मुख्य कारण आज के युवाओं में दृढ़ इच्छाशक्ति की कमी, राजनीति में अरुचि और अपनी क्षमता को नहीं पहचानना है । आज की नई पीढ़ी के युवा और पढ़े–लिखे लोग राजनीति में आना नहीं आना चाहते । वर्षों से जारी राजनीतिक व्यवस्था की निरन्तरता युवा पीढ़ी में उत्साह की जगह उदासीनता पैदा कर रही है । राजनीति के प्रति नेपाली समाज की समझ सकारात्मक नहीं है । इसी का परिणाम है कि राष्ट्र निर्माण के स्तम्भ, युवा और शिक्षित वर्ग आज राजनीतिक हित और उपस्थिति के मामले में सबसे पीछे हैं । जिसके कारण अयोग्य, अशिक्षित और नेतृत्वविहीन व्यक्ति राजनीति कर रहे हैं । आज की पार्टियां वयस्क नेताओं द्वारा चलाई जा रही हैं जो कल के पुराने तर्कों से त्रस्त हैं । जिसके कारण किसी भी नई चेतना या सोच की धारा विकसित नहीं हो रही । मौजूदा राजनीतिक दलों की गतिविधियां इसकी जड़ में हैं । गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार, वंशवाद, पदोन्नति और अपराधी को राजनीतिक संरक्षण जैसी गतिविधियाँ युवाओं और शिक्षित वर्ग में दिन–प्रतिदिन राजनीति के प्रति घृणा फैला रही हैं ।

देश बदल रहा है, समाज बदल रहा है और उसके साथ ही देश के युवाओं का आकर्षण देश से अधिक विदेशों की ओर बढ़ता जा रहा है । सरकार, सरकारी व्यवस्था सभी नाकाम हैं युवाओं के पलायन को रोकने में । सरकार की नजर सिर्फ उन विदेशी मुद्राओं पर है, जो देश के युवा बाहर जाकर सिर्फ अपना पसीना ही नहीं, खून बहाकर देश को भेजते हैं । सरकार नाकाम है अपनी जनता को उद्योग और व्यवसाय देने में । ऐसे में युवा विदेशों में जाकर परिवार के पेट की आग बुझाएँ या देश की राजनीति में अपना योगदान दें ? अब तो शायद यह भी मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि हाल ही में बने इस नियम से कि जमीन को गिरवी रख कर ऋण नहीं दिया जाएगा, जरुरतमंदों के सपने को ध्वस्त करने वाला है ।

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‘समृद्ध नेपाल, सुखी नेपाली’ सरकार का यह नारा किसी नागरिक ने नहीं बनाया है बल्कि यह तो सरकार के द्वारा प्रचारित वह दिवा स्वप्न है । जिसकी नींव पर हर नेता अपनी ख्वाहिशों की इमारत तैयार कर रहा है । नेपाली युवाओं की महत्वपूर्ण समस्या बेरोजगारी है, लाखों युवा रोजगार पाने के लिए विदेश जाने को मजबूर हो जाते हैं । जो वहाँ जाकर भटकते हैं । किसी की तकददीर संवर जाती है तो कोई काठ के बक्से में कैद होकर आता है । न तो राज्य और न ही किसी दल ने युवाओं को रोजगार देने की पहल की है । इसके बजाय, प्रत्येक पार्टी देश में बेरोजगारी की समस्या को बढ़ाकर और बेरोजगार युवाओं को अपनी पार्टी में शामिल करके देश में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश करता है और उसे अपने फायदे के लिए प्रयोग में लाता है । वे राजनीति के नाम पर निर्दोष युवाओं का विभिन्न हिंसक गतिविधियों में इस्तेमाल करते हैं और जब स्वार्थसिद्धि हो जाता है, तो उसे दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेकते हैं । फिर राजनीति में उन युवाओं की कोई जरुरत नहीं रह जाती है । वो तो सिर्फ कुर्सी और सत्ता तक पहुँचने के माध्यम तक सीमित रह जाते हैं ।

देश गरीब है, बेरोजगार है और यही वजह है कि हमारी नई पीढ़ी अपराध तथा नशे के दलदल में डूबे हुए हैं । युवाओं को व्यसन और नशीली दवाओं की लत है । आज भी हजारों युवा नशे के शिकार हैं । वे तरह–तरह की दवाओं का इस्तेमाल करते हैं । युवाओं ने सीरिंज, भांग, गांजा और गोलियां, हेरोइन और अफीम का उपयोग करने का बीड़ा उठाया हुआ है । व्यसन, बेरोजगारी और संगति के कारण, वे विभिन्न आपराधिक गतिविधियों में भी शामिल हैं । हत्या, हिंसा, रेप, लूटपाट, डकैती और अपहरण में नेपाली युवक शामिल हो रहे हैं । इस तरह, राष्ट्र निर्माण में अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति दर्शाने की जगह वह अपनी क्षमता और उर्जा को बरबाद कर रहे हैं । आज अगर पढ़ी–लिखी पीढ़ी से देश की राजनीति के विषय में सवाल करें तो बस यही जुमला उनकी जुबान से निकलेगा कि, राजनीति बहुत गंदी चीज है, हमें राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है, राजनीति गुण्डागर्दी का अड्डा है आदि । किन्तु वो यह नहीं जानते कि अगर उनकी राजनीति में पहुँच नहीं होगी तो देश जर्जर हो जाएगा । देश के विकास के लिए नई सोच, नई संभावनाएँ और नई पहल की आवश्यकता है । कोई भी देश तभी विकसित होता है जब उसकी सोच नई दुनिया के साथ चलती है ।

किन्तु यह हमारे देश की विडम्बना है कि हमारे देश के युवा राजनीति में नहीं आ पा रहे हैं । और जो हैं उन्हें हमारे वरिष्ठ नेता पनपने का अवसर नहीं दे रहे हैं । उन्हें युवा सिर्फ उनके पीछे–पीछे चाहिए जबकि होना तो यह चाहिए कि इन वरिष्ठ नेताओं को युवाओं को आगे कर उनका, अपने अनुभवों को साझा कर मार्गदर्शन करना चाहिए । उनसे उनकी नई सोच को ग्रहण करना चाहिए ।

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युवा इसलिए भी राजनीति के प्रति आकर्षित नहीं हो रहे क्योंकि वर्तमान राजनीति गुंडागर्दी, अपराधीकरण और भ्रष्टाचार की ओर उन्मुख है, इसलिए राजनीति के प्रति आम लोगों का रवैया इतना अच्छा नहीं है  । राजनीति में शामिल होने वाले युवा या तो छात्र होते हैं या वे लोग जिन्होंने अभी–अभी व्यवसाय शुरू किया है । यह वो समय होता है जब इनकी पहुँच संसाधनों तक बहुत सीमित रहती है । ये राजनीति में आते तो हैं किन्तु आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण जल्दी ही इस क्षेत्र से विमुख हो जाते हैं । इस कारण से राजनीति में टिके रहने वालों की संख्या कम होती है । या फिर वो टिके रहते हैं जिनके माँ–बाप राजनीति में शीर्षस्थ पदों पर रहते हैं । ऐसे युवाओं में भले ही क्षमता हो या ना हो पर राजनीति और कुर्सी उन्हें उपहार में मिल जाती है । केंद्र में ईमानदारी से राजनीति करने वाले लोग गायब होते जा रहे हैं । आज राजनीति एक पूर्णकालिक व्यवसाय बन गई है । वर्तमान राजनीति ऐसा वातावरण प्रदान नहीं करती है जिसमें आम व्यक्ति राजनीति में योगदान दे सके ।

इसके साथ ही हमारा समाज भी अपने बच्चों को राजनीति में नहीं भेजना चाहता है । बचपन से हम बच्चे को डाक्टर, इंजीनियर बनाने का सपना देखते हैं किन्तु आम घरों में कोई अपने बच्चे को नेता बनाने का सपना नहीं देखते हैं । बच्चों से भी अगर सवाल किया जाए तो वो किसी भी पेशा का नाम ले सकता है किन्तु नेता बनने का नाम नहीं लेता और अगर भूले से ले भी लिया तो अभिभावक की डाँट अवश्य पड़ जाएगी । राजनीति के प्रति हमारा नजरिया सकारात्मक नहीं है । हमें उसके भविष्य की चिन्ता सताती है । दूसरी ओर स्थापित नेता ये सोचते हैं कि अगर युवा नेताओं को शकित मिल गई तो उनका पत्रा साफ हो जाएगा इसलिए वो उन्हें सिर्फ कोशिश करते हुए देखते रहना चाहते हैं ।
दूसरी स्थिति ये है कि अगर कोई युवा इस क्षेत्र में आता है तो वहाँ सिर्फ उसकी क्षमता या उर्जा मायने नहीं रखती बल्कि उसकी आर्थिक स्थिति मायने रखती है । अगर वह चुनाव लड़ना चाहता है तो उसके पास चुनाव में खर्च करने के लिए करोड़ों रुपए होने चाहिए । जिस दिन चुनाव में पैसे का खेल बंद हो जाएगा उस दिदन शायद देश को सच्चा प्रतिनिधि भी मिल जाएगा । जबकि वर्तमान में करोड़ों खर्च कर के आने वाला प्रतिनिधि पहले तो अपने करोड़ों के खर्च की भरपाई दुगुनी तिगुनी रूप से करेगा तब कहीं जाकर अगले चुनाव के नजदीक आते–आते फिर से चुनाव जीतने के लिए जनता की ओर दृष्टिपात करेगा । ये आज की राजनीति का कुरूप चेहरा है ।

नेपाल की राजनीति में आज के यवाओं के पास कोई रोल मॉडल नहीं है जिसके लिए वो राजनीति में आए या राजनीति में शामिल होने के लिए प्रेरित करे । उनके सामने वही देउवा, ओली, प्रचंड, महतो, यादव या ठाकुर जैसे चेहरे हैं, जो राजनीति के लिए विरक्ति और विद्रूपता पैदा करते हैं, आकर्षण नहीं । बावजूद इसके देश को युवाओं की जरुरत है । युवाओं के लिए जरूरी है कि वे खुली सोच, नम्रता और साहस के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन करें । लोकतंत्र के मर्म को समझें और दलगत भाना से उठकर ददेश हित की भावना को अपने अन्तरमन में समाहित करें । राजनीति के बदलते स्वरूप की हलकी झलक और जनता के भीतर की खीझ तथा सोच स्थानीय चुनाव में हमें देखने को मिल चुकी है । बदलती सोच का ही परिणाम है स्वतंत्र उम्मीदवारों का निर्वाचित होना ।
सच तो यह है कि अब देश में ऐसे माहौल बनाने की जरूरत है जहां युवा राजनीति में पर्याप्त भूमिका निभा सकें । यौवन की ऊर्जा हिम्मत करती है, वृद्धावस्था का अनुभव समझौता करता है । देश को ऐसे युवा नेताओं की तलाश है जो देश की सेवा के लिए राजनीत को अपनाए ना की राजनीति को आय का स्रोत बनाए । इसलिए पार्टी के ढांचे, नीतियों और कार्यक्रमों के लिए युवाओं को राजनीति की ओर आकर्षित करना जरूरी है । राजनीतिक रूप से सक्षम और आर्थिक रूप से सक्षम युवाओं को आर्थिक रूप से समर्थन देकर पार्टी में लाना चाहिए और देश सेवा के लिए प्रेरित करना चाहिए । युवाओं कोप्रयोग करने की संस्कृति के बजाय पार्टी के भीतर युवाओं को सक्षम नेता बनाने के लिए एक ढांचा तैयार किया जाना चाहिए । संगठन जितना अधिक युवाओं में निवेश करेगा, उतना ही देश को लाभ होगा । आज राजनीति और नेतृत्व के प्रति नजरिया बदलने के लिए पूरी तरह से सक्षम युवा का नेतृत्व करना जरूरी है । जो आने वाले समय में युवाओं को राजनीति में आने के लिए प्रेरित करे ।
इसी तरह युवाओं को राजनीति के प्रति जागरूक करने के लिए राज्य को शिक्षा के मॉडल को बदलने की जरूरत है । मतदान क्यों जरूरी है, राजनीति में दिलचस्पी क्यों जरूरी है, स्कूली जीवन से समझाना जरूरी है । किसी भी संगठन की रीढ़ उस संगठन की दूसरी पीढ़ी का नेतृत्व होता है । संगठन को मजबूत करने के लिए, दूसरे स्तर के नेतृत्व को और अधिक सक्षम होने की आवश्यकता है । दूसरे स्तर का नेतृत्व आमतौर पर युवाओं के नेतृत्व में होता है । आज तक हमारी राजनीति सही दिशा में नहीं है । क्योंकि हमारी राजनीति में युवाओं की भूमिका मजबूत नहीं है । इसलिए सुसंस्कृत राजनीति और समृद्ध नेपाल के लिए सक्षम युवा राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है ।
चाणक्य ने कहा था, राजनीति में प्रवेश न करने की सजा यह है कि अशिक्षित और असक्षम लोग आप पर शासन करते हैं । इसलिए पढ़े–लिखे युवा अगर राजनीति और उसके नेतृत्व में नहीं आते हैं तो वो सजा के अधिकारी भी हैं । देश संक्रमण काल और अल्प विकास की स्थिति में है । विकास में राजनीतिक जटिलता के साथ–साथ अन्य जटिलता भी उभर रही है । जिम्मेदारी युवाओं के कंधों पर है । अगर वो इस समय अपने राष्ट्र के लिए नहीं सोचते हैं, इस संकट की घड़ी में निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर कुछ देश के बारे में नहीं सोचते हैं तो यह देश भी बूढ़ा होता चला जाएगा और समाप्त हो जाएगा ।

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