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आओ वृद्ध बनें : बिम्मी कालिन्दी शर्मा

 

बिम्मी कालिन्दी शर्मा, बीरगंज हिमालिनी अंक जून।इस देश की सरकार विकास के मामलें में सभी को पछाड़ दे रही है । इसी लिए तो अपने देश के नागरिकों को जल्दी वृद्ध होने का मौका दे रही है । इस बार के बजट में सरकार ने एलान किया है कि वृद्ध भत्ता पाने की उम्र अब सत्तर से सिर्फ ६८ साल कर दी गयी है । यानी कि आप दो साल पहले ही वृद्ध बन जाएं और वृद्ध भत्ता का आनंद लें ।

जितनी जल्दी आप बूढेÞ बनेंगे उतनी ही जल्दी आपको वृद्ध भत्ता तो मिलेगा ही आप उपर भी जल्दी ही सिधार जाएँगे और अपनी जगह किसी और के लिए खाली कर देंगे । है न कितनी अच्छी बात ? इसी लिए जल्दी बूढेÞ बनिए । अपनी उम्र की जानकारी देने वाले प्रमाणपत्र में हेरफेर कीजिए, अपने बालों को भी डाई कर के सफेद बना लीजिए और दांत भी यदि सही सलामत है तो उसको हिला कर तोड़ दिजिए । अब आप एकदम हो गए बूढेÞ और आप वृद्ध भत्ता पाने के लायक भी हो गए । हो सके तो खाना भी कम कर दीजिए या खाइए ही मत । जिससे आप कमजोर हो जाएँगें और जल्दी ही बूढेÞ बन जाएँगें । देखिए तो हमारे देश की सरकार कितनी दयावान है जो सिर्फ वृद्धों की बारे में ही सोचती है । बच्चे और युवा के बारे में तो राम जाने क्या होगा ?

वैसे इस देश में युवा हैं कंहाँ ? जितने हैं भी वह सब खाड़ी देशों में बालु चाल रहे हैं या भेंड़ चरवाहा का काम कर रहे हंै । इस देश में बच्चा पैदा होने के कुछ साल बाद स्कूल जाता है और उसके कुछ साल बाद ही खाड़ी के देशों में घर की गरीबी रोजगार तलाशने के लिए चला जाता है । मुश्किल से १६ साल का एक किशोरावस्था का लड़का गरीबी से आक्रांत हो कर खाड़ी मुल्कों में रोजगारी के लिए जाने को मजबूर है । किशोरावस्था में वहाँ गया लड़का कब जवान हो कर बूढा भी हो जाता है पता ही नहीं चलता । कुछ साल बाद वापस आता भी है तो काठ के बक्से में शीलबंद हो कर एक लाश के रूप में । यदि सौभाग्य से कोई जिंदा वापस आ भी गया तो पिचके गाल और रुखे बाल के साथ वृद्ध हो कर । सरकार को यह सब मालूम है । सरकार ही चलती है उनकी भेजी हुई रेमिटेंस की बदौलत । इसी लिए तो सरकार उनका खास ख्याल रखते हुए जल्दी वृद्ध होने का मौका दे रही है ।

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इस मौके मे चौके लगा कर सरकार द्वारा दी जाने वाली वृद्ध भत्ता का भरपूर मजा ले ।
वास्तव में यह देश है ही वृद्धों का । .विश्वास न हो तो सरकार में शामिल नेता और मंत्री को देख लीजिए और संसद भवन की तरफ झांक लीजिए सारे बूढ़े खूसट भरे पड़े हुए है । जितने भी नेता हैं उनमें अधिकांश ७० वर्ष से उपर के ही है । इसी लिए तो इन्होंने वृद्ध भत्ता की उम्र घटा दी है । कल यह भी नेता से जनता होंगे तब यही वृद्ध भत्ता बुढ़ारी में काम आएगा । पोपले मुंह से खांसते हुए.लाठी टेक जब यह वृद्ध भत्ता लेने जाएँगें तब देश का वर्तमान और भविष्य इनकी शख्सियत से झांकता दिखेगा । क्योंकि इन्होंने काम ही ऐसा किया है कि देश कभी जवान और हराभरा बन ही नहीं पाया । गाँव समाज मे जब किसी की मौत होती है तो उसकी अर्थी को कांधा देने के लिए कोई युवा नहीं है । मरे हुए वृद्ध की अर्थी को कांधा भी कोई वृद्ध ही दे रहा है । पर फिर हमारा जमीर हमें नहीं धिक्कारता । आंख का पानी सूख चुका है बस हर मंजर को घूरने और भुगतने के लिए हम अभिशप्त हैं ।

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देश को ऐसा वृद्ध और असहाय बनाने मे सिर्फ नेताओं का ही हाथ नहीं है । हम जनता भी शामिल हैं इस अपराध में । आज जब बूढ़ों की सरकार वृद्ध भत्ता पाने की उम्र घटा रही है तो हम लोग टेबल ठोक कर ताली बजा रहे हैं । पर यह नहीं सोचते की भत्ता में बांटे जाने वाले पैसे आएँगें कहाँ से ? इन्हीं भत्ता पाने वाले वृद्धों के पेट में लात मार कर मंहगाई बढ़ा कर और टैक्स बढ़ा कर । तब भी हम नहीं चेतते । कुत्ते को हड्डी मिल जाए तो बस चबाता ही रहता है आगे–पीछे कुछ नहीं देखता हम भी बस वैसे ही हैं । जब चुनाव होता है तो हम चावल को फेंक कर कंकड़ जैसे नेता चुनते हैं और बाद में गरियाते भी हैं इन नेताओं के गिरगिट जैसे बदलते रंग–ढंग देख कर । पर ‘अब पछताय होत क्या जब चिडि़या चुग गई खेत’ ?

‘अंधेर नगरी चौपट राजा, टका सेर भाजी टका सेर खाजा’ जैसा हाल है इस देश का । वृद्ध भत्ता देने का ऐलान तो हुआ ही दुसरी तरफ भ्यू–टावर भी बन रहा है । हो सकता है यह भ्यू–टावर इन्हीं वृद्धों के लिए है । जो जीवन से हार जाए या आजिज हो जाए तो इन्ही भ्यू–टावर से कूद कर अपनी जान दे दे । एक तरफ वृद्ध भत्ता देने का स्वांग और दूसरी तरफ इन्ही वृद्धो को भ्यू–टावर बना कर काम खलास । सृष्टि और पैसा दोनों बराबर.संतुलन में । आखिर इन वृद्धों का काम ही क्या है ? अब यह देश और समाज को योगदान देंगे भी तो क्या ? भार बन कर रहने से अच्छा है भ्यू–टावर से कूद जाओ और सरकार को फायदे में रखो । सरकार तो ऐसे भी खुश है और वैसे भी खुश ही रहेगी । देश की जनसंख्या नियंत्रण में रहेगी और सरकारी खजाना भी नहीं घटेगा । ‘हींग लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा आय’ इसी को कहते है । नहीं तो इस देश में वह भी पहाड़ी जगह में भ्यू–टावर का क्या काम है ? पहाड़ तो खुद ही एक प्राकृतिक भ्यू–टावर है । बस सरकारी खजाने का बेड़ा गर्क करने के लिए नेताओं के दिमाग में ऐसे ही फितुर आते रहते हैं ।

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नेकपा एमाले ने अपने पहले नौ महीने के शासन काल में बजट से सरकार द्वारा वृद्ध भत्ता का एलान किया था । तब वृद्ध भत्ता सौ रुपए था अब बढ़ कर पांच हजार हो गया । जिसका ब्याज नेकपा एमाले अभी तक खा रहा है । और हर चुनाव में वह इसी वृद्ध भत्ते को भजाता रहता है । अब तो काग्रेस और मिल कर बनाया हुआ सरकार ने इस बार के बजट से वृद्ध भत्ता पाने की उम्र भी दो.साल घटा कर सोने में सुहागा डाल ही दिया और क्या चाहिए ? और सब से दुखद बात है कि जो सरकारी पेन्शनधारी हंै और जिनकी आर्थिक अवस्था भी बहुत मजबूत है वह भी वृद्ध भत्ता के लिए ऐसे लालायित रहते हैं जैसे कुत्ता माँस का टुकड़ा देखने पर उसे पाने के लिए लार चुआता है उसी तरह । इनकी मति और विवेक दोनों मारी गई है इसी लिए तो वृद्ध भत्ता हर ऐरे–गैरे को बांट कर देश का भट्टा बैठा रहे हैं । और इस देश के भेड़ जैसे नागरिक अब बालों में.काला लगाना छोड़ कर सफेदी ढूंढ रहे हैं ताकि जल्द से जल्द बूढ़े हो कर वृद्ध भत्ता प्राप्त करें और परमधाम को सिधारें । आओ हम सब जल्दी से वृद्ध बनें और धरती को अपनी कथनी और करनी से भारमुक्त कर दें !

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