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शाश्वत शक्ति का आधार सीता, प्रकृति का स्वरूप हैं : श्वेता दीप्ति

 

आद्याशक्ति श्री सीता जी का महात्म्य वेदशास्त्र, पौराणिक वाङ्गमय, इतिहास एवं उपनिषदों में उल्लेखित है । सीतोपनिषद में सीता देवी मूल प्रकृति तथा प्रथम स्वरूपिणी कही गयी हैं । सीता को शाश्वत शक्ति का आधार माना गया है,  प्रकृति का स्वरूप माना गया है । सीता साक्षात योग माया हैं । सीता शब्द का अर्थ अक्षर व्रह्म की शक्ति के रूप में हुआ है । इच्छा, ज्ञान और क्रिया, इस शक्तित्रय के स्वरूप के ज्ञान से जो भाव विमल बुद्धि दर्पण मे प्रतिफलित होता है, वह ब्रह्म सत्ता सामान्य, वह अखण्ड सच्चिदानन्दमय ब्रह्मभाव ही सीता तत्व है ।
‘सा देवी त्रिविधा भवति शक्त्यात्मना’ – इच्छा शक्ति, क्रिया शक्ति, साक्षात्छक्तिरिति–सीतोपनिषद अर्थात सीता देवी सत्यआत्मा में इच्छाशक्ति, क्रिया शक्ति तथा साक्षात शक्ति के भेद से त्रिविधा हैं । इच्छा, क्रिया तथा ज्ञान इस शक्तित्रय का तत्वज्ञान ही सीता तत्व का प्रकाशक है । ज्ञान क्रिया और इच्छा ये सत्, रज और तम गुणत्रयात्मिका प्रकृति के हीं कार्य हैं ।
सीतापनिषद् में स्पष्ट उल्लेख है ब्रह्मा कहते हैं कि मूल प्रकृति रूप होने से सीता को प्रकृति कहते हैं, प्रणव (अ, उ, म) नाद बिन्दु, कला और कलातीत इस सप्ताङ्क से जनित होने के कारण सीता प्रथम स्वरूपिणी हैं, वही त्रिवर्णात्मा सक्षात माया है ।
सकार सत्य का नाम है, यही अमृत प्राप्ति और सोम है तकार रजत सौर्न्दय मण्डित विराजमान यसस्वी मणिविशेष है तो इकार रुपिणी अव्यक्तरुपिणी महामाया है ।
माता सीता का प्रथम रूप शब्द ब्रह्म प्रणम है, वही वेद पाठ के समय प्रसन्न होकर उत्पन्न हुआ था । द्वितीय रूप नारी रूप जो पृथ्वी से हल के अग्रभाग से उत्पन्न हुआ है, तृतीय रूप है इकार रुपिणी अव्यक्तस्वरूपा ।
श्री राम तापनीय उपनिषद् में कहा है – समस्त देहधारियों की उत्पत्ति, पालन तथा संहार करनेवाली आद्या शक्ति मूल प्रकृति संज्ञक श्री सीता जी ही है ।
ऋग्वेद में कहा है – हे असुरों का नाश करनेवाली श्री सीता हम सब आप के चरणों की वन्दना करते हैं । आप हमारा कल्याण करें ।
अथर्ववेद उत्तरार्ध की श्रुति है – महाराजा जनक जी के राज महल में जो श्री सीताजी प्रकट हुई है वह सर्व पर आनन्द मूर्ति है । मुनिगण और देवगण उन का गान करते हैं । कार्य कारण से परे और कार्य कारण शक्ति सम्पन्ना है । ब्रह्माणी लक्ष्मी और गौरी आदि अनन्त शक्तियों की उत्तपादिका है ।
श्री ब्रह्मा जी कहते हैं – नित्या, परम निर्मला, परम विशुद्धा गुण आगरी, श्री की परम श्री, आद्या शक्ति, महेश्वरी, श्री राम जी से अभिन्ना, श्री जनकात्मजा, मैथिली माता श्री सीता जी का मैं वन्दन करता हूँ ।
श्री शंकर जी कहते हैं – यह परम आश्चर्यों से परिपूर्ण जगत परात्परा देवी श्री सीता जी का केवल लीला मात्र ही है ।
श्री महारामायण में शिव का कथन है – श्री जानकी जी के अंशो द्वारा ही अनेकानेक जगत को उत्पन्न करनेवाली शक्तियाँ प्रार्दुभूत होती है । वह तो मूल प्रकृतिस्वरूपिणी महामाया आद्या शक्ति है महाशंभू संहिता में अगस्त्य ऋषि ने कहा है श्री सीता जी के कलांष से बहुत सी शक्तियाँ उत्पन्न होती ही रहती है ।
अद्भुत रामायण में कहा गया है – राम साक्षात परम ज्योति, परमधाम और परात्पर पुरुष हैं । सीता और राम की आकृति में ही भेद है, वास्तव में नही । राम ही सीता हैं और सीता ही राम है सन्त लोग इसी तत्व को बुद्धि के द्वारा भलिभाँति जानकर जन्म मरणरूपी संसार के पार पहँुच सके हैं ।
पुराण में उल्लेख है माँ ने सीता रूप से काली रूप धारण किया था । बाल्मीकि रामायण में हनुमान ने रावण की सभा में कहा था – हे रावण जिन्हें तुम सीता समझते हो जो आज तुम्हारे घर में अवस्थित है, उन्हें तुम कालरात्रि ही समझो । वह सर्वलंका विनाशिनी है । श्री चण्डी भी वही कालरात्रि है । श्री चण्डी के समान यही योगमाया, महामाया जगद्धात्री है ।
एकनाथ चरित्र में हनुमान का वाक्य है – सीता के ही के तेजोनल से रावण सहित समस्त राक्षस– सैन्य जलकर भष्म हुए । सीता ने इन्हें न मारा होता तो ये आप से न मारे जाते इन्हें मारा सीता जी ने और विजय दी आपको जिस के कारण आप की शुरवीरता है व जानकी जी की ही इच्छाशक्ति है ।
शुर्पनखा के अपमान और दूषण के मारे जाने के पश्चात रावण महसूस करने लगा कि अब समय आ गया है । बिना शक्ति की सहायता से कोई भी काम नहीं हो सकता । श्री राम के साथ तो महालक्ष्मी हैं उन्हें तो अब संहार कारिणी शक्ति की आवश्यकता है तब वे उन से कहते हैं–
सुनहु, प्रिया व्रत रुचिर सुसीला ।
मैं कछु, करब ललित नर लिला ॥
तुम्हँ पावक महु करहू निवासा ।
जौ लगि करौ निसाचर नासा ॥
जबहि राम सब कहो बखानि ।
प्रभु पद धरि हिय अनल समानि ॥
निज प्रतिविम राखि तह सीता ।
महालक्ष्मी तो अग्नि में समा गई, अब शेष रह गयी संहार कारणिनी शक्ति सो काली रूप में विराजमान रही । माता जानकी विवाह के वाद ससुराल अपने साथ काली माता की एक मूर्ति लेकर आई थी जिसे अयोध्या में छोटी देवकाली के नाम से जानी जाती हैं । यह मूर्ति आज भी आयोध्या में स्थित है । बताया जाता है माता पार्वती का रूप काली यहाँ सर्वमंगला महागौरी के रूप में विराजमान हैं । राजा दशरथ ने माता काली की इस प्रतिमा को सप्त सागर के ईषान कोण में स्थापित किया था । जहाँ माता सीता हर रोज अन्य रानियों के साथ पूजा करने जाती थी । वही भगवान राम की कुलदेवी भी बड़ी काली देवी है ।
श्री गोस्वामी तुलसी दास ने लिखा है –
जासु अंस उपजहि गुनखानि ।
अगणित उमा, रमा ब्रह्माणी ॥
भृकुटि विलास जासु जग होई ।
राम वाम दिसि सीता सोई ॥
इस तरह सीता तत्व के गुढ़तम आयाम को शास्त्रों एवं पौराणिक वाङ्मय में प्रकाशित करने का प्रयास किया गया है । इस के अतिरिक्त अनेकानेक ऋषि, मुनि, कवि, साधु सन्त विद्वत जन ने सीता तत्व के बारे में स्वाध्याय एवं अनुभूति से प्राप्त ज्ञान राशि को भिन्न भिन्न भाषा एवं रूप में लिपिवद्ध करने का कार्य किया है ।
मूल रूप में यह समझना चाहिए पृथ्वी शक्ति अर्थात आधार शक्ति । आधार शक्ति जो है वह विष्णु की ही शक्ति है । जिस शक्ति ने जगत को धारण कर रखा है । इसलिए सीता पृथ्वीस्त होकर अवतीर्ण हुई थी । सीता अबला नहीं है, सीता जो स्वयं के स्वाभिमान का रक्षण जानती है । उसे स्वयं की रक्षा के लिए किसी की आवश्यकता नहीं है । सीता का स्वाभिमान उस मर्यादा का पालन करता है, जहाँ से किसी अन्य का स्वाभिमान आहत न हो, खंडित न हो । यह ‘स्व’ का अवलम्बन है । बाल्मीकि रामायण में सीता के प्रसादिक स्वाभिमान को स्त्री पराक्रम, स्वभाव एवं कार्य के रूप में समस्त कथा में हम देख सकते हैं । आज सीता का चरित्र विमर्श का विषय बना हुआ है । जहाँ राम के द्वारा उनके परित्याग को विषय बनाकर राम को कटघरे में खड़ा किया जाता है । परन्तु इन सबसे परे अगर हम सीता को उस नारी के रूप में देखें जो एकाकी होते हुए भी विषम परिस्थितियों में स्त्रियोचित्त मनोबल एवं गरिमा का परिचय देती है, तो निःसन्देह आज की आधुनिक नारी सीता सी होने को अभिशाप नहीं समझेगी बल्कि उनके एकाकी जीवन के संघर्ष से जीने की कला और साहस को अपनाने का हुनर सीखेगी । सीता एक वीर बाला, जो अपना निर्णय स्वयं लेती है । राम–वन–गमन के समय जब वह कहती है कि उसे भी वन जाने की अनुमति दी जाए तो उन्हें रोकने की पूरी कोशिश होती है तभी वह कहती है कि—
‘साहं त्वया गमिष्यामि वनम न संशयः ।
नाहं शक्या महाभाग निवर्तयितु मुह्यता ॥’
सीता पहली ही पंक्ति में अपना निर्णय दृढ़ता के साथ सुना देती है कि वह राम के साथ अवश्य जाएगी और इसमें किसी संशय के लिए स्थान नहीं है । यानि सीता यहाँ दृढ़ता की परिचायक है, जिसके निर्णय को कोई टाल नहीं सकता है । सीता का प्रतिवाद उसके क्षत्रियोचित ताप एवं दीप्ति का परिचायक है । सीता का यह दृढनिश्चयी रूप तुलसी रचित मानस में कुल परम्परा की मर्यादा से आपुरित शीलवती कुलवधु के रूप में चित्रित है किन्तु यहाँ भी वन–गमन प्रसंग में वह अपने एक ही कथन से सभी को निरुत्तर कर देती है—
‘मैं सुकुमारी नाथ बन जोगु ।
तुम्हहि उचित तप मो कहूँ भोगू॥’
तुलसी के राम के प्रति ईश्वरीय दृष्टिकोण एवं मर्यादा के आग्रह के बीच भी सीता का तार्किक प्रखर व्यक्तित्व छिपा हुआ नहीं है । सीता वह पतिव्रता नारी है, जो अपने स्वाभिमान की रक्षा करना तो जानती ही है, पति के स्वाभिमान को भी आहत नहीं होने देती । सीता सभी परिस्थितियों में अत्यंत दृढ़ता एवं स्वाभिमान के साथ सामने आती है । वह अपनी पीड़ा को अपनी कमजोरी नहीं बनने देती, अगर ऐसा होता तो वह अपनी संतान को चारित्रिक उज्ज्वलता, दृढ़ता एवं श्रेष्ठ मूल्य नहीं दे पाती । वह राम को पहचानती है और वह यह भी जानती है कि राम का जीवन जन –जन के लिए है । सीता का पृथ्वी में समा जाना न तो उनके द्वारा मृत्यु का वरण है और ना ही राम के प्रति किसी भी प्रकार का रोष इसका कारण है, हाँ ! समाज में व्याप्त रुग्ण मानसिकता का प्रतिफल अवश्य है । अपने ऊपर समाज द्वारा लगाए गए लाँछन की प्रतिक्रिया है । यहाँ भी वह राम के रामत्व की रक्षा करती है, उन्हें किसी असमंजस में नहीं रखना चाहती और स्वयं को मुक्त कर हर प्रश्न पर विराम लगा देती है । सीता का यह उज्ज्वल स्वरूप हर युग में पूजित है और रहेगा । आज भी अगर नारी अपने अन्दर सीता के इस दृढ़ स्वरूप को स्थान दे दे तो वह कभी अबला नहीं मानी जाएगी क्योंकि प्रखरता, दृढ़ता और स्वाभिमान उसका गहना होंगे जो उसके आत्मिक सौन्दर्य को परिभाषित करेंगे ।

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