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कर्फ्यू लगने के बाद आगजनी कैसे हुई ? जबाब सरकार को देना पड़ेगा – मधेश विद्रोह-३

 

मुरलीमनोहर तिवारी (सिपु), बीरगंज, २९ अगस्त |

sipu-1मधेश विद्रोह-३ शुरू हो चूका है। अब तक सप्तरी के भारदह में राजीव राउत, रुपन्देही के बेलहिया में दुर्गेश यादव, लुम्बिनी में सुनील यादव, रौतहट के गौर में राजकिशोर ठाकुर शहीद हो चुके है। दो-दो मोर्चा अपने अपने झंडे बैनर के साथ सड़क पर है। जब चुनाव का पर्चा भरने जाते है तो एक उम्मीदवार के साथ पांच-पांच हजार समर्थक दिखते है, मगर दोनों मोर्चे में उपस्थिति सौ से भी कम रही है। पहले के मधेश बिरोध में पहाड़ी दल के मधेशी झूठ में ही समर्थन तो करते थे अब उन्हें भी मधेशी दल के कमी कमजोरी के बारे में खुलकर बोलते और अपने- अपने दल का वकालत करते देखा गया। व्यपारी वर्ग का बंद के खिलाफ प्रदर्शन भी हुआ।

शुरुआत में ऐसा लगा दोनों मोर्चे में बंद घोषणा करने की होड़बाजी लगी है। सदभावना पार्टी के इस्तिफे और टीकापुर के अकल्पनीय घटना के बाद आंदोलन में उफान दिखा। बाकी बचे दल फोरम लोकतान्त्रिक, रामसपा और मधेशी राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा नेपाल (क्रन्तिकारी) भी कही छूट ना जाएं ये सोच कर वे भी आंदोलन में कूद पड़े। इनसब में असली और नकली की पहचान कैसे हो। पता नहीं कब कौन घुसपैठ करे, कब कौन गुलाटी मार जाएं।

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अलग देश के मांग वाला सीके राउत समूह भी ये संबिधान हमारा नहीं है कहकर पल्ला झाड़ लिया। फिर सीके राउत नज़रबंद है कहकर मुह फेर लिया। जबकि सुनने में आता था की सीके जहा जाते है पचीस हजार लोगो की भीड़ लग जाती है। ये हजारो समर्थक उन्हें नजरबन्द से मुक्त कराने क्यों नहीं आएं।
तमरा अभियान हरेक मधेशी दल कार्यालय में बिना किसी पूर्वाग्रह और संकोच के संस से इस्तीफा का ज्ञापन देते दिखा। जिसका असर सिर्फ सदभावना पार्टी पर पड़ा।

कैलाली टीकापुर की घटना में प्रहरी अधिकृत लक्षमण न्यौपाने, इंस्पेक्टर बलराम बिष्ट, केशव वोहरा, हवलदार रामबिहारी चौधरी, ललित साउद सहित १७ प्रहरी, ३ स्थानीय सहित  दो वर्षीय बालक की जान गई। सैकड़ो आंदोलनकारी के भी मारे जाने की खबर आई। सरकार जो घटना बता रही है, उसे सही मान भी लिया जाएं, तो भी जहा भीड़ में एस एस पी, इंस्पेक्टर सहित १७ को जला दिया गया वहा बाकि प्रहरी मूकदर्शक बने रहे होंगे ऐसा नहीं हो सकता। सिर्फ प्रहरी अधिकृत के साथ जितने सिपाही होते है वे गोलियां चलाए तो लाशो के ढेर लग जाए। वे लाशे कहा है। कर्फ्यू लगने के बाद आगजनी कैसे हुई इसका जबाब सरकार को देना पड़ेगा।

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sipu-2नग्न अवस्था में महिला की लाश मिली, वो किसकी थी, कहा से आई। इसका जबाब देने के बजाए सरकार घुसपैठ और दक्षिणपंथी का आरोप लगा कर भटका रही है। सभी मीडिया उसी सुर में गा रहे है। गौरतलब है की कैलाली में पूर्व के आंदोलन में भयंकर दमन और ज्यादती का आक्रोश अब फूटा है। पूर्व में जलेशर, रौतहट और बारा में भी ऐसा ही जन आक्रोश दिख चूका है।

आंदोलन में रौतहट, सिरहा, बांके, पर्सा, सर्लाही, रुपन्देही में गोली चली और कर्फ्यू तक लगाना पड़ा। उस पर सेना का प्रयोग, आग में घी ढालने जैसी हरकत है। दूसरी तरफ सरकार को प्रहरी चौकियां वापस बुलाने की मजबूरी दिख रही है। आंदोलन सरकार पर दबाव बनाने का तरिका है। अनशन, सत्याग्रह, प्रदर्शन, ज्ञापन भी इसके स्वरुप है जिसे अहिंसक माना जाता है। अहिंसक आंदोलन का मिशाल प्रस्तुत करते हुए तमरा अभियान के के.स. इन्द्र मधेशानंद जनकपुर में आमरण अनशन कर रहे है। अगर बंद स्वेच्छा से हो तो अहिंसक होता है मगर दबावमूलक तरीके से किया गया बंद भी नेपाल में अहिंसक ही माना जाता है।

sipu-3इस आंदोलन के मुद्दे क्या है स्पष्ट नहीं है। सिर्फ सड़को पर एक मधेश का नारा सुनाई देता है जबकि यही मधेशी दल दो प्रदेश पर सहमती कर चूका है। कई जगह तो दो मोर्चे का टकराव सड़को पर दिखा जो की मधेश हित में ठीक नहीं है। मधेश बिद्रोह १ में फोरम कोई दल नहीं था इसलिए इसके मंच पर हरेक मधेशी सहभागी हुआ। आज सभी दल अपने अपने बैनर में है बाक़ी मधेशी इनके बैनर में नहीं जाना चाहता जिस कारण मजबूती नहीं आरही है। सत्ता मोह में इस्तीफा नहीं देना भी संदेह का बड़ा कारण बन रहा है।

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आंदोलन के अंत में वार्ता में जाना ही होगा। ये वार्ता पूर्व के समझौता की तरह नहीं होगा इसके कोई लक्षण नहीं दिख रहे। क्योकि गृहयुद्ध ही क्यों ना हो स्थाई सत्ता एक मधेश प्रदेश, जनसँख्या अनुसार प्रतिनिधित्व और भाषिक अधिकार देने नहीं जा रही है। ये मिले बिना मधेश के किसी अधिकार का कोई मायने नहीं है। इन्ही बातो के मद्देनजर तमरा अभियान ने स्पस्ट कहा की मधेश के जनभावना अनुरूप आंदोलन का समर्थन करते है मगर सत्तामुखी मधेशी दल का समर्थन नहीं करते। ये आंदोलन लंबा चलेगा, इसे पार लगाने के लिए स्वार्थ त्याग करके दलिए अहम् से ऊपर उठ कर एक होना होगा वरना ये आंदोलन नहीं वोट बढ़ाने का खेल होगा, नौटंकी होगी।sipu-4

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