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मोर्चा-वार्ता ! प्रधानमन्त्री ओली कितनी ईमानदारी दिखाते हैं ?

 

माघ, १९ गते ,

लगभग ६ बार कार्यटोली की  बैठक के बाद तीन प्रमुख दलों तथा मधेसी मोर्चा माघ ३ गते को सहमति के नजदीक पहुंच  गई थी | पुस के अन्तिम सप्ताह में  तीन दलों की ओरसे उपप्रधानमन्त्री भीम रावल, कांग्रेस नेता महेश आचार्य और एमाओवादी महासचिव कृष्णबहादुर महरा ने मोर्चा को अनौपचारिक रूपसे पाँच-बुँदे प्रस्ताव थमा दिया ।जिसका निष्कर्ष था  ‘संघीय प्रदेश की सीमांकन पुनरावलोकन तथा परिमार्जन करके राजनीतिक संयन्त्र का गठन ।’morcha-varta

उसके दो रोज बाद मोर्चा ने उसमे कुछ संशोधन करके  ६ बुँदे पेपर तयार किया था । मोर्चा के प्रस्ताव में ‘तराई–मधेस में दो प्रदेश रखकर  सीमांकन परिमार्जन करने की बात उल्लेख थी। हालाकि कार्यदल में कुछ हद तक सहमति हो गई थी लेकिन जैसे ही  ‘तराई–मधेस में दो प्रदेश ’ की वाक्यांश तीन दलों के शीर्ष नेताओं के सामने रखा गया उसके वाद वार्ता ही अवरुद्ध हो गई ।

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प्रधानमन्त्री का भारत भ्रमण जो अभी चर्चा में है इसके लिए भी वार्ता की जरूरी समझी जा रही है | इसके साथ साथ कांग्रेस महाधिवेशन की तैयारी में भी स्थानीय स्तर में हो रही अबरोध में कुछ सहजता लाने के लिए भी तीनो दलों ने वार्ता की जरूरत महसुस की है । मोर्चा के एक नेता के अनुसार सोमबार की वार्ता में इस विषय को स्पष्ट रूप से तीन दलों ने रखा है  ‘प्रधानमन्त्रीजी को भी यहाँ अनुकूल वातावरण बनने का सन्देश लेकर दिल्ली जाने की इच्छा है,’ मोर्चा के दुसरे नेता ने बताया | ‘कांग्रेस को मधेस के अधिकांश जगहों पर महाधिवेशन प्रतिनिधि के निर्वाचन में कठिनाई हो रही है , कार्यक्रम  ही नही कर पाने पर कांग्रेस ने मोर्चा के साथ समझदारी की अपेक्षा की है । मोर्चा ने स्पष्ट कहा है कि वार्ता में बाँकी रहे सभी मुद्दों को एकही बार सहमति खोजा जाय ।

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तीन दलों ने कहा है कि ६ महिना से जारी मधेस आन्दोलन को वार्ता के द्वारा ही हल किया जायगा इसलिए सोमबार को फिर से वार्ता हुई है | पहले से ही प्रस्तावित राजनीतिक संयन्त्र सहित अन्य मुद्दा भी अब कार्यदल के मार्फत ही आगे बढ़ाने की बात  जानकारी में आई है। अब देखना यह है कि प्रधानमन्त्री ओली कितनी ईमानदारी दिखाते हैं ? या केवल इस नाटक में परिणित कर देगें |

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उधर मधेश से फिर मोर्चा के नेतोओं को चेतावनी आने लगी है की वार्ता के नाम पर नाटक नही करें | वार्ताको  सकारात्मक दिशा प्रदान करें तथा समझौता उधार नही होना चाहिए |

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