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चाहत डाक्टर बनने की थी पर राजदूत बन गया : श्यामानन्द सुमन (जीवन–सन्दर्भ)

Shymanand Suman
 

हिमालिनी की एक नई पहल । हिमालिनी अगस्त अंक से समाज के लब्धप्रतिष्ठित बुजुर्ग व्यक्तित्व के अनुभवों पर आधारित जीवन–सन्दर्भ श्रृंखला शुरुआत कर रही है । वह जीवन जो नई पीढ़ी के लिए एक सीख है, वही नई राह भी प्रशस्त करती है, आज इस श्रृखला की पहली कड़ी हैं–

Shymanand Suman
श्यामानन्द सुमन

। आप पूर्व राजदूत हैं । आपका जन्म २० फरवरी १९४४ में तत्कालीन कानूनगो बेलही ग्राम (हालः तिलाठी–कोइलारी गावंपालिका–१) सप्तरी जिला में हुआ है । आपकी माता का नाम जगतारिणी देवी और पिता का नाम भगवतलाल दास हैं । आपकी जीवनी तथा जीवन के खट्टे–मीठे अनुभव आपकी ही जुबानी संक्षेप में यहां प्रस्तुत की जा रही है–
पारिवारिक पृष्ठभूमि
नेपाल और बिहार के कुछ हिस्सा मिलकर तिरहुत राज्य हुआ करता था । जिसकी राजधानी सिम्रौनगढ (बारा जिला) थी । उस राज्य को कायम करनेवाले राजा नान्यदेव के दरबार में मेरे पूर्वज प्रधानमन्त्री थे, जिनका नाम देवधर प्रख्यात श्रीधर था । ऐसा मेरे पारिवारिक वंशावली में उल्लेख मिलता है । फिर कुछ पीढ़ी बाद में राजा हरि सिंह देव के तिरहुत राज्य में सूर्यकर नाम के पूर्वज भी प्रधानमन्त्री हुए थे । जब तिरहुत राज्य का अन्त हुआ तो उन पूर्वजों की सन्तति विभिन्न जगहों में जैसे, बिहार, बंगाल, आसाम आदि में बिखर गए ।
अभी के वासस्थान से गिना जाए तो मैं आठवीं पीढ़ी में आता हूँ । जिस समय सप्तरी जिला जंगलों से ढका था और मानव बस्ती कहीं कहीं रही होगी । उसी समय हमारे पूर्वज बिहार के मधुबनी जिला से आकर अभी के स्थान में आ बसे थे । बाद में नेपाल के तत्कालीन राजा रणबहादुर शाह ने विक्रम सम्वत् १८४२ में एक लालमोहर के जरिए कई मौजाओं (गांवो) का नानकार–बिर्ता की जमीन्दारी तत्कालीन मेरे पुर्वज को दिया और तत्कालीन परगना का प्रशासन और कानून सम्बन्धी कार्य करने के लिए ‘कानूनगो’ का ‘टाइटल’ भी दिया । फिर बाद के राजाओं द्वारा भी पुनः लालमोहर द्वारा सन्तान दर सन्तान उन मौजाओं का मिलकियत दिया । उन लाल मोहरों द्वारा उस जंगली सुनसान इलाकों में बाहर से लोगों को लाकर बस्ती बसाने और खेतीपाती द्वारा उस क्षेत्र को गुलजार बनाने की आज्ञा थी और मेरे पूर्वजों ने जमीन्दारी उन्मूलन तक अपना धर्म निभाया ।
हमारे वंश के विस्तृत परिवार में स्कुल, कॉलेज और युनिवर्सिटी की पढ़ाई हमारी पीढ़ी के समय में ही शुरु हुई थी । पहले जमाने में शायद उतनी पढ़ाई–लिखाई की आवश्यकता महसूस नहीं होती थी । अपने मौजाओं को चलाने के लिए जिन हिसाब किताबों की जरुरत थी, वह पढ़ाई शिक्षकों को रखकर घर पर ही हो जाती थी । मालपोत वसूली और उसे सरकारी खजाने में जमा करने वाला हिसाब किताव, श्रेस्ता का व्यवस्थापन के लिए जमीन्दार को पटवारी (एकाउन्टेन्ट) का सहयोग रहता था । इसके अलावा खेती–बारी माल–मवेशी आदि को देखने के लिए अन्य सहयोगी और नौकर–चाकरों की भरमार हुआ करती थी । पारिवारिक पंडित, धोबी, नाई आदि को जमीन की ‘जागिर’ देकर स्थाई व्यवस्था रहती थी । वैसे इन सारी सामन्तवादी व्यवस्था में मेरी व्यक्तिगत रुचि नहीं थी, पर उस समय की चलन–चलती की जमीन्दारी व्यवस्था ही ऐसी थी । क्रमशः समय और व्यवस्था बदलती गयी और उसी तरह मेरी पारिवारिक स्थिति भी समय सापेक्ष बदलती गयी । अब तो उपरोक्त सभी व्यवस्थाओं का स्वरूप बदल चुका है और हम आम जनता हो चुके हैं ।
मेरे मातापिता के सन्तानों में हम चार भाई और चार बहने हैं । मैं चार नम्बर पर आता हूं । मेरी शादी १९७१ इस्वी में डा. मीना सुमन से हुई और मेरो दो बच्चे हैं । मेरे बेटे का नाम मनिष सुमन, जो परिवार सहित क्यानडा में रहता है । और बेटी का नाम मेधा सुमन है, जो अपने परिवार के साथ अमेरिका में रहती है । मेरी श्रीमती नेपाल सरकार के स्वास्थ्य मन्त्रालय में सेवा देकर अब सिनियर मेडिकल अधिकृत (गाइनोकोलोजिस्ट) के पद से सेवा निवृत्त हो मेरे सुख–दुःख की साथी बनी हुई है ।
शिक्षा
सात क्लास तक की मेरी पढ़ाई घर पर ही प्राइभेट ट्युटर के द्वारा हुई । चूंकि मेरा जन्म जिला के उस समय के नामी जमीनदार परिवार (तत्कालीन नानकार बिर्तावाल) में हुआ था और उस समय शिक्षक को घर में ही रखकर बच्चों की पढाई का प्रचलन था । यह व्यवस्था शायद उस समय आस–पास कोई सरकारी या प्राइभेट स्कूल नहीं होने की वजह से भी हो सकता है । प्राइभेट ट्यूटरिंग से मुझे व्यक्तिगत सकारात्मक फायदा यह हुआ कि कई एक साल के अन्दर ही दो सालों का कोर्स पूरा कर लिया । सुबह, दोपहर और सांझ तीनों वक्त शिक्षक की उपस्थिति और सघन पढाई के द्वारा यह सम्भव हो सका । इसकी दूसरी और शायद ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह थी कि उस समय आजकल के जैसे बच्चों के लिए न उतना विषय होता था और न उतनी किताबे होती थी । अतः कोर्स भी जल्दी–जल्दी खतम होता था । लेकिन इस सिस्टम का नकारात्मक पक्ष यह था कि उस समय के बच्चों का ज्ञान आज के बच्चों के जैसा मल्टिफेसेटेड और ‘भिजनरी’ नहीं होता था । शायद उस समय का बच्चों का हर वक्त अपने ही पारिवारिक माहौल में रहने के कारण और प्राइभेट ट्युटर का भी हर सब्जेक्ट में अब्बल दर्जे के ज्ञान की कमी और आज के जैसा एक्सेसेस टु नॉलेज के साधनों में पहुँच नहीं होने के कारण भी था । यह मेरा अनुभव रहा ।
घर पर ही सातवीं कक्षा की पढ़ाई होते होते एक जागेश्वर हाई स्कूल नामधारी स्कूल भारत के बिहार राज्य के अन्तर्गत तत्कालीन सहरसा जिला के कुनौली बाजार में खुल गया था । मेरा पुस्तैनी बासस्थान बोर्डर के किनारे ही नेपाल में अवस्थित था, जो कुनौली के उस हाई स्कूल से एक–डेढ किलोमीटर की दूरी पर था । अतः औपचारिक तवर से उसी स्कूल में आठवीं कक्षा में मेरा नामांकन कराया गया । यह सन् १९५५ की बात है । हमारे समय में हाई स्कूल के क्लास ८ से ग्यारहवी तक का चार वर्ष का हुआ करता था । जो मैंने १९५९ में समाप्त किया । फिर १९५५ के ही सेशन में बिहार के मधुबनी शहर में चल रहे नामी रामकृष्ण कॉलेज (आर.के. कॉलेज) में आई में एडमिसन लेकर पढ़ने लगा । फिर १९६३ में मैंने बी.ए. की डिग्री ली । आगे मास्टर्स डिग्री करने की प्रबल इच्छा होते हुए भी उस साल कही एडमिशन नहीं ले सका । बी.ए. में मेरा मुख्य विषय भूगोल (ज्योग्राफी) और राजनीतशिास्त्र(पोलिटीकल साइंस) था । मास्टर्स के लिए मैंने ज्योग्राफी चुना था । बी.ए. रिजल्ट उस साल थोड़ा विलम्ब से निकलने और मेरे गांव से निकलकर बाहर के शहर में जाकर पढने के लिए कुछ कारणों से जल्द नहीं निकल सका । थोडी देर होने की वजह से पटना, राँची आदि युनिवर्सिटी में कोशिश की, पर एडमिसन खतम हो चुका था । अतः उस साल गांव में ही रहकर जागेश्वर हाई स्कुल कुनौली बाजार (जहां से मैंने हाईस्कुल पास किया था) टिचिंग किया । फिर दूसरे साल यानी १९६४ में काठमांडू आकर ज्योग्राफ्री में एडमिशन लिया और मास्टर्स डिग्री की चाहत सन् १९६६ में त्रिभुवन युनिवर्सिटी द्वारा पूरा किया ।
विद्यार्थी जीवन
मेरे विद्यार्थी जीवन के अनुभव में मैं यही कह सकता हूँ कि मैंने ग्रामीण परिवेश में ही रहकर हाई स्कूल तक की पढ़ाई की और मेरा आउटलुक और भीजन भी ग्रामीण ही रहा । फिर भी यहां में उल्लेख करना चाहूंगा कि बचपन में मेरी हार्दिक इच्छा थी कि मैं डाक्टर बनू इसलिए मैं साइन्स का कोर्स पढ़ना चाहता था । आठवी और नवमी कक्षा तक तो सारे विषयों की जेनरल पढाई होती थी, पर दस और ग्यारवी में साइन्स फैकल्टी की पढाई को चुनना होता था । चूंकि उस स्कूल में साइन्स टीचर और लैब की कमी के कारण मुझे मजबूरन आर्टस कोर्स में ही रहना पडा । वह इसलिए भी कि मेरे गार्जिएन मुझे दूर के शहर में पढने के लिए नहीं भेजना चाहते थे । फिर वही रहकर आर्टस कोर्स से ही मैट्रिक पास किया । उस समय हमारे इलाके में कॉलेज नहीं होने से बिहार के मधुवनी शहर में चल रहे सबसे अच्छे कॉलेज आर.के. कॉलेज से बी.ए. तक की पढ़ाई सम्पन्न की । जैसा कि पहले बता चुका हूं, एम.ए. की पढ़ाई काठमांडू स्थित त्रिभुवन विश्वविद्यालय से १९६६ में पूरा किया ।
यहां एक घटना उल्लेख करना चाहूंगा । जब मैंने बी.ए. पास किया, उसी साल आगे की पढ़ाई शुरु नहीं कर सका, तो उस साल जिस हाईस्कूल में पढा था, उसी स्कूल में अस्थायी शिक्षक के रूप में नौकरी करने लगा । मेरे अभिभावक चाहते थे कि मैं उस स्कूल में परमानेन्ट हो जाऊँ । उस समय कोशी का पश्चिमी बांध टूट जाने से इलाका पानी में डूब गया और हमारे परिवार की सारी खेतीबारी खतम हो गई । इससे पारिवारिक आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब हो गयी थी । अतः उस शैक्षिक सत्र में आगे की पढ़ाई नहीं कर सका । पर मुझे लगन लगी थी मास्टर्स डिग्री की । अपने इस लक्ष्य को कायम रखा । और गार्जियन की इच्छा के विपरीत १९६४ में घर से निकल गया और काठमांडू आकर त्रिभुवन विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग में एडमिशन लिया और सन् १९६६ में एम.ए. की डिग्री हासिल किया । यह मेरा अपना लक्ष्य पूरा करने का जुनून और भगवान की असीम अनुकम्पा के द्वारा बिना गार्जियन की मदद के अपने लक्ष्य को हासिल किया । काठमांडू में खर्चे के लिए मैंने ट्युशन पढ़ाया और त्रिभुवन विश्वविद्यालय से कुछ रकम बतौर मेरीट स्कॉलरशीप भी मिलता रहा ।
सरकारी सेवा में प्रवेश
सबसे पहले एक जरुरी और उल्लेख्य बात यह है कि मैं सरकारी नौकरी कभी भी नहीं करना चाहता था । जब में छोटा था तो मेरी मां बराबर बीमार और शारीरिक रूप से कमजोर रहा करती थी । (वैसे हमारे विस्तृत परिवार और पास पड़ोस में और भी लोग बीमारी के चंगुल में फंसते थे । मेरी भावना और सोच मेरी मां के प्रति काफी रहा करती थी । उस समय आसपास के इलाके में आधुनिक डाक्टर और दबाइयों की कमी और पुरुष वर्ग में महिलाओं के प्रति सम्वेदनाशीलता के साथ ही महिलाओं द्वारा भी अपनी बीमारियों को छिपाने की प्रवृत्ति जटिल सामाजिक समस्या के रूप में मैंने देखा । उस समय में मैंने सोचा कि डाक्टर बनकर समाज की सेवा और अपना पेशा कायम करना चाहिए । इसी लक्ष्य को लेकर साइन्स कोर्स करना चाहता था । जो विभिन्न कारणों से पूरा नहीं हो सका । मेरे इस लक्ष्य को हासिल करने का जब कोई आसार नजर नहीं आया, तब मैंने अपना दूसरा लक्ष्य चूना और वह था– कॉलेज÷युनिवर्सिटी लेबल के टीचर बनने का । वह इसलिए कि मैं शिक्षकों को बडे आदर, श्रद्धा और सम्मान के साथ देखता था । साथ ही सामाजिक विकास और मानव मात्र की उन्नति शिक्षा के द्वारा ही सम्भव हो सकता है, ऐसा मेरा दृढ़ मानना था । पर भगवान की इच्छा कहें या मेरा अपना भाग्य, होना तो कुछ और ही था । होनी को कौन टाल सकता है ? अन्ततः मैं न चाहते हुए भी नेपाल सरकार की सेवा में ही चला गया ।
मेरी सरकारी सेवा भी बडे ही दिलचस्प (पॉजेटीभ÷नेगेटिभ दोनों कोणों से) मोड़ो से गुजरती रही । मेरे चार दशकों की सेवा में इतनी बातें हैं कि सभी बातों का विस्तृत विवरण देना इस ‘लाइफ स्केच’ के दायरे में सम्भव नहीं । पर जितना हो सकेगा, संक्षेप में एक आभास देना अवश्य चाहूंगा ।
यह बात सन् १९६६ की है । मेरे एम.ए. के रिजल्ट आते ही लगा कि अब मुझे कहीं नौकरी तलाश करनी चाहिए । खासकर शिक्षा क्षेत्र में । उसी समय नेपाल सरकार के लिए लोकसेवा आयोग का एक विज्ञापन निकला, जिसमें कुछ सेक्सन ऑफिसर की मांग की गई थी । वैसे मेरा झुकाव शिक्षक की तरफ था, फिर भी कुछ साथियों और कुछ संगे–सम्बन्धियों के सुझाव पर लोकसेवा का फार्म भर दिया । वैसे उस समय के हिसाब से लोकसेवा की परीक्षा पास करना उतना आसान नहीं माना जाता था । फिर भी यह सोचकर कि पास नहीं भी होउंगा तो भी एक्सपीरियन्स तो होगा ही, यह सोचकर परीक्षा में बैठा । एक संयोग ही कहे कि उसी समय त्रिभुवन विश्वविद्यालय में एक रिसर्च असिस्टेन्ट की आवश्यकता की खबर आई । काम था एक अमेरिकन विद्वान जो पश्चिम के पहाड़ी जिलों का आर्थिक स्थिति का अध्ययन करना चाहता था, उसके असिस्टेन्ट के रूप में साथ देना । मैं अन्तरवार्ता में शरीक हुआ और मेरा सेलेक्सन भी हुआ । और मैं उस अमेरिकी विद्वान के साथ अध्ययन टूर पर चला गया । मैंने सोचा था कि अब त्रि.वि.वि. से लिंक स्थापित हो गया तो धीरे–धीरे शिक्षा के तरफ नौकरी लग ही जाएगी । कुछ महीनों के उस टूर के बीच में जब काठमांडू आया तो पता लगा कि लोकसेवा की परीक्षा में मैं पास हो गया हूं । अब मेरे लिए मुश्किल यह की कि सरकारी नौकरी में लगुँ या अभी इस रिसर्च असिस्टेन्ट में ही काम करते हुए ही शिक्षक की नौकरी के इन्तजार में रहूं । उन विद्वान अमेरिकन से पूछने पर उसने सलाह दी कि मुझे सरकारी नौकरी में ही चला जाना चाहिए । तब मैंने खुद भी सोचा वह सरकारी नौकरी तो मिल चुकी है । पता नहीं शिक्षक की नौकरी कब मिलेगी । अतः मैं सरकारी नौकरी ज्वाइन कर प्री–सर्भिस ट्रेनिङ में चला गया । यहां यह बात कह देना सान्दर्भिक होगा कि प्री–सर्भिस ट्रेनिङ शुरु करने से पहले काठमांडू स्थित यु.एस. एजुकेशन फाउन्डेशन ने अमेरिका में उच्च शिक्षा के लिए फुलब्राइट स्कलरशीप की प्रतिस्पर्धा का विज्ञापन निकाला । उस समय उसके लिए राष्ट्रीय कम्पिटिसन लिखित हुआ करता था । मैंने भी परीक्षा दी और जब मैं सरकारी नौकरी की प्रिसर्भिस ट्रेनिङ में था, तो उस फुल ब्राइट स्कॉलरशीप में मेरा भी सेलेक्सन हो गया था । अभी अमेरिका जाने में कुछ समय बांकी था तो मैं अपने ट्रेनिङ में लगा रहा । ट्रेनिङ के बाद मुझे नापी विभाग में प्लेसमेन्ट हुआ, क्योंकि मैंने ज्योग्राफी में एम.ए. किया था । अब तक मैं सरकारी नौकरी के लिए डेडीकेटेड हो चुका था । मेरा सिद्धान्त ही है कि जो भी करों पूरे दिल से और इमान्दारी के साथ करों, ‘वर्क इज वर्सिप’ ।
मैं पहले नेपाल प्रशासन सेवा के प्रशासन समूह में बतौर शाखा अधिकृत (२०२४ कात्र्तिक १९) के रूप में प्रवेश किया । फिर कुछ महीनों के बाद जून १९६८ में उच्च अध्ययन के लिए अमेरिका चला गया । वहां युनिभरसिटी ऑफ कैन्सस से एम.ए की डिग्री लेकर अक्टुबर १९७० में काठमांडू लौटा और अपने शाखा अधिकृत के पद को ज्वाइन कर लिया । उस समय पूर्व परिचित डाक्टर हर्क गुरुङ, जो राष्ट्रीय योजना आयोग के उपाध्यक्ष थे, उनको ‘कट्सी कौल’ करने गया । वे पहले त्रिभुवन विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के प्रोफेसर हुआ करते थे और मुझे अच्छी तरह जानते थे । उनसे मिलते ही उन्होंने उन्ही के साथ काम करने के लिए आयोग के ऑफिसर में ही आने को कहा । तो में भी प्रशासन व्यवस्था विभाग से ट्रान्सफर लेकर आयोग में काम करने लगा । उस समय राजा वीरेन्द्र द्वारा नेपाल में विकेन्द्रीकरण के सिद्धान्त अन्तर्गत प्रादेशिक योजना लागू किया, जिसके एक शिल्पकार डा. गुरुङ थे । नेपाल को पाँच विकास क्षेत्र में बाटा गया, मुझे पूर्वाञ्चल विकास क्षेत्र धनकुटा पोस्टिंग मिली, जहां मैंने करीब चार वर्ष काम किया । फिर उसी दर्मियान ब्रिटिस काउन्सिल के स्कॉलरसीप पर पोष्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा कोर्ष करने यू.के. चला गया । वहां युनिवर्सिटी ऑफ ग्लास्गो के इन्टरनेशनल इकोनोम्सिक डिमार्टमेन्ट से डेभलपमेन्ट सम्बन्धी डिप्लोमा लेकर १९७६ में काठमांडू लौटा । यहां आते ही पता चला कि नेपाल सरकार ने लोकसेवा आयोग की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति द्वारा परराष्ट्र सेवा के लिए कुछ अफिसर की सेलेक्सन के लिए विज्ञापन निकाला है । मैें भी उसकी लिखित और मौखिक परीक्षा में भाग लिया और पास भी किया । फिर सन् १९७६ अप्रील महीना में नेपाल के परराष्ट्र सेवा में चला गया । कुछ ही महीनों के बाद मन्त्रालय की तरफ से जर्मनी जाकर जर्मन भाषा का ६ महीने का ट्रेनिङ भी लिया ।
परराष्ट्र मन्त्रालय में काम करते हुए मैं नेपाली राजदूतावास इस्लामावाद के डीसीएम, पेरिश स्थित दूतावास में भी डीसीएम और कतार दूतावास का फाउण्डर एम्बेसडर बना । कतार में ६ वर्ष (२०००–२००६) में अपना कार्यकाल समाप्त कर सरकारी सेवा से रिटायर होकर लौटा ।
यहां यह बताना मेरे लिए ईमानदारी की बात होगी कि सन् १९६७ से जब मैं सरकारी सेवा में प्रवेश किया, और सन् २००६ (करीब ४० वर्ष) में रिटायर्ड हुआ, यह कोई ‘स्मुथ सेलिङ’ नहीं था । काफी उत्तार–चढ़ाव हुआ था । सम्पूर्ण अनुभव की बातें एक बहुत बड़ी कहानी है, जो इस लेख में सम्पूर्णता के साथ नहीं आ सकता । अतः उन संयोजित अनुभवों का विस्तृत विवरण फिर कभी अलग से देना चाहूंगा । फिलहाल इस कागजी स्पेश को देखते हुए निम्नानुसार दो–चार बातें संक्षेप में बताता हूं ।
मेरे अनुभव में उस समय (जब मैंने सरकारी सेवा प्रवेश किया) लोकसेवा आयोग काफी निष्पक्ष हुआ करता था । उसकी परीक्षाएं, अन्तरवार्ता और चयन प्रक्रिया में कोई उंगली नहीं उठा सकता था । प्रशासन की तरफ भी हमारे समय से ही सर्भिस ट्रेनिङ की व्यवस्था की गई थी । जो कर्मचारियों के वृत्तिविकास के लिए आवश्यक थी, उस समय कर्मचारीतन्त्र में राजनीतिक हस्तक्षेप बहुत कम हुआ करता था । कर्मचारीतन्त्र काफी मजबूत अवस्था में थी, प्रमोशन की व्यवस्था कुछ कठिन थी । इसका एक कारण कर्मचारीतन्त्र का छोटा होना भी था । पर इसका एक सकारात्मक पार्ट भी माना जा सकता है, कर्मचारियों में परिपक्वता में बढ़ोत्तरी होती थी और काफी अनुभव होने से निर्णय करने की प्रक्रिया में गलतियों की गुंजाइस कम होती थी । निर्णय करने की क्षमता में परिपक्वता आती थी । किसी भी निर्णय क्षमता के लिए सिर्फ किताबी ज्ञान ही काफी नहीं होता है । उसके साथ अनुभव का होना भी उतना ही आवश्यक है । आजकल कम उम्र में ही किताबी ज्ञान हासिल कर परीक्षा द्वारा ऊपर के पदों पर आसीन हो जाते हैं, पर निर्णय क्षमता में कमी के कारण चाकड़ी–चापलुसी में फंसे रहते हैं । उस समय सेवाग्राहियों के प्रति आज के बनिस्पत ज्यादा मित्रवत व्यवहार होता था, और भ्रष्टाचार की बातें भी कम ही हुआ करती थी । कर्मचारीतन्त्र के उच्च तह के अधिकृत आज से ज्यादा विचारवान और संवेदनशील हुआ करते थे । मेरीट का आज से ज्यादा कदर हुआ करता था ।
आजकल कर्मचारीतन्त्र में राजनीतिक रंग चढ़ा हुआ है और राजनीति का बोलवाला है । कर्मचारीतन्त्र भी राजनीतिक पार्टियों के आधार पर संगठित है । इससे कर्मचारीतन्त्र में समयानुसार सुधार के बदले पक्षपातपूर्ण व्यवहार और राजनीतिक बौसिज्म के चलते कर्मचारीतन्त्र में निराशा और चाकरी प्रथा का बोलवाला है । पक्षपातपूर्ण व्यवहार और भाई भतीजावाद का भी उतना ही प्रभाव देखने में आता है । कर्मचारियों का संगठन भी सरुवा, बढुवा और ‘प्लम पोष्ट’ पाने में ही व्यस्त रहता है । अनुशासन की कमी रहती है और सरकारी काम से अपने व्यक्तिगत कामों के प्रति ज्यादा ध्यान रहता है ।
अब तो होना यह चाहिए कि सभी कर्मचारियों का एक ही छाता संगठन हो, जिसका राजनीतिक दलों से दूर–दूर का भी नाता न रहे । कर्मचारीतन्त्र में राजनीतिक हस्तक्षेप बिल्कुल ही बन्द होना चाहिए । मेरिट को प्रश्रय मिलना चाहिए, कर्मचारी संगठन में सिर्फ कर्मचारियों के हकहित, मनोबल उच्च रखने की बातें, वृत्ति विकास सम्बन्धी प्रशिक्षण÷गोष्ठी, उच्च नैतिकस्तर कायम रखने की संस्कृति आदि का विकास होना जरुरी है । अन्त में कर्मचारियों के आचरण सम्बन्धी कोड अफ कन्डक्ट का पालन और निष्पक्ष रूप से रिवार्ड एण्ड पनिसमेन्ट के सिस्टम को लागू करना चाहिए ।

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