माँ तुमने ही उडा दिया अपनी साेन चिरैया काे : श्वेता दीप्ति
माँ कहती थीं
तुम मेरी साेन चिरैया हाे
किसी देश में एक राजा था
अाैर उसकी जान बसती थी उसके ताेते में
माँ कहती थीं
तुम मेरी साेन चिरैया हाे
अाैर मेरी जान बसती है
उसी राजा के ताेते की तरह तुम में ही
माँ कहती थीं
तेरे हाेठाें की हँसी
अाैर अाँखाें की चमक में
मैं जिन्दा हूँ
अाैर एक दिन
माँ तुमने ही उडा दिया
अपनी साेन चिरैया काे
अपने सुरक्षित अाँचल से निकाल
एक अन्जानी दिशा में।
माँ कहती थीं तुम मेरी साेन चिरैया हाे ।
माँ उडना चाहती थी तुम्हारी साेन चिरैया
अपने कमजाेर पंखाें के साथ
हवा से विपरीत दिशा में
क्याेंकि तुम्हारे सपने
तुम्हारी साेन चिरैया की अाँखाें में बसे थे ।
उसे सच करने की जिद थी उसकी
क्याेंकि तुम कहती थी
कि मैं तुम्हारी साेन चिरैया हूँ
जिसमें बसती है तुम्हारी जान ।
कई बार पंख टूटे
हाैसलाें ने साथ छाेडने की काेशिश भी की
पर तुम्हारी साेन चिरैया
तुम्हारे सपनाें में खुद काे जीती रही
अाैर अाज भी कायम है
बहती विपरीत धार में
क्याेंकि साथ है मेरे तुम्हारी छत्रछाया ।
माँ कहती थी तुम मेरी साेन चिरैया हाे
हाँ माँ मैं तुम्हारी साेन चिरैया हूँ
मैंने जिन्दा रखा है
अपने हाेठाें की हँसी
अाैर अाँखाें की चमक काे
क्याेंकि तम इसमें जिन्दा हाे
माँ कहती थी तुम मेरी साेन चिरैया हाे ।



