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पंडित मदन मोहन मालवीय, पहले ऐसे शख्स जिन्हें मिली महामना की उपाध‍ि

 

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भारत के शिक्षाविद् मदन मोहन मालवीय का जन्म 25 दिसंबर 1861 को इलाहाबाद में हुआ था. 1884 में इन्होंने बीए की डिग्री हासिल की और उसी साल कुमारी देवी से इन्होंने मिर्जापुर में शादी भी की. इनके पिता का नाम पंडित ब्रजनाथ और माता का नाम मूनादेवी था। महामना के पिता संस्कृत भाषा के प्रकाण्ड विद्वान थे। मात्र 5 साल की आयु में उनके माता-पिता ने उन्हें संस्कृत भाषा में प्रारंभिक शिक्षा दिलवाने के लिए पंडित हरदेव धर्म ज्ञानोपदेश पाठशाला में भर्ती किया। महामना ने वहां से प्राइमरी परीक्षा पास की। विभिन्न स्कूलों एवं कॉलेजों से होते हुए उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से बी.ए. की उपाधि प्राप्त की।
पंडित मदन मोहन मालवीय ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेकर 35 साल तक कांग्रेस की सेवा की। उन्हें सन्‌ 1909, 1918, 1930 और 1932 में कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। मालवीयजी एक प्रख्यात वकील भी थे। एक वकील के रूप में उनकी सबसे बड़ी सफलता चौरीचौरा कांड के अभियुक्तों को फांसी से बचा लेने की थी। चौरी-चौरा कांड में 170 भारतीयों को सजा-ए-मौत देने का ऐलान किया गया था, लेकिन महामना ने अपनी योग्यता और तर्क के बल पर 151 लोगों को फांसी के फंदे से छुड़ा लिया था।

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शिक्षा के क्षेत्र में महामना का सबसे बड़ा योगदान काशी हिंदू विश्वविद्यालय के रूप में दुनिया के सामने आया था। उन्होंने एक ऐसी यूनिवर्सिटी बनाने का प्रण लिया था, जिसमें प्राचीन भारतीय परंपराओं को कायम रखते हुए देश-दुनिया में हो रही तकनीकी प्रगति की भी शिक्षा दी जाए। अंतत: उन्होंने अपना यह प्रण पूरा भी किया। यूनिवर्सिटी बनवाने के लिए उन्होंने दिन रात मेहनत की और 1916 में भारत को बीएचयू के रूप में देश को शिक्षा के क्षेत्र में एक अनमोल तोहफा दे दिया।

मदन मोहन मालवीय हिंदू महासभा के सबसे प्रारंभिक एवं असरदार नेताओं में से एक थे। वह स्वभाव में बड़े उदार, सरल और शांतिप्रिय व्यक्ति थे। उनके कार्यों और उनके व्यवहार से प्रभावित होकर ही जनमानस ने उन्हें ‘महामना’ कहकर पुकारता था। जिंदगी भर देश और समाज की सेवा में लगे रहने वाले महामना का वाराणसी में 12 नवंबर 1946 को 85 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।

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पहले ऐसे शख्स जिन्हें मिली महामना की उपाध‍ि
1. मालवीय बचपन से अपने पिता की तरह भागवत की कहानी कहने वाले यानी कथावाचक बनना चाहते थे मगर गरीबी के कारण उन्हें 1884 में सरकारी विद्यालय में शिक्षक की नौकरी करनी पड़ी.
2. पूरे भारत में ये अकेले ऐसे शख्स हैं जिन्हें महामना की उपाध‍ि दी गई.
3. 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 144 धारा का उल्लंघन करने के कारण गिरफ्तार कर लिया.
4. डॉ. राधा कृष्णन ने मालवीय के संघर्ष और परिश्रम के कारण उन्हें कर्मयोगी कहा था.
5. 1898 में सर एंटोनी मैकडोनेल के सम्मुख हिंदी भाषा की प्रमुखता को बताते हुए, कचहरियों में इस भाषा को प्रवेश दिलाया.
6. मदन मोहन मालवीय के बारे में जब भी बात की जाती है तो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) का जिक्र जरूर किया जाता है. इन्होंने इसकी स्थापना 1916 में की.
7. मालवीय ने 1907 में ‘अभ्युदय’ हिंदी साप्ताहिक की शुरुआत की.
8. वे चार बार 1909, 1918, 1930, 1932 में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे.
9. 1924 से 1946 तक वे हिंदुस्तान टाइम्स के चेयरमैन रहे.
10. मालवीय ने रथयात्रा के मौके पर कलाराम मंदिर में दलितों को प्रवेश दिलाया था और गोदावरी नदी में हिंदू मंत्र का जाप करते हुए स्नान के लिए भी प्रेरित किया.
11. ‘द लीडर’ अंग्रेजी अखबार की 1909 में स्थापना की. यह अखबार इलाहाबाद से प्रकाशित होता था.
12. उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़कर ‘कांग्रेस नेशनलिस्ट पार्टी’ का निर्माण किया.

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