Sun. May 31st, 2020

काेराेना वायरस के ‘जीनोम स्ट्रक्चर’ में हुआ म्यूटेशन, क्या होगा असर

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नई दिल्ली। Coronavirus:

लॉकडाउन और कोरोना वायरस के संक्रमित मरीजों की संख्या के बीच आपको यह खबर निश्चित रूप से राहत देगी। चीन, इटली, स्पेन, ईरान के बाद अमेरिका में कोरोना वायरस का कहर देखा जा रहा है। हमारे देश में सरकार ने कमर कस ली है और ‘धरती के भगवान’ भी जी जान से अपना कर्तव्य निभाने में लगे हैं। इस माहौल में एक बढ़िया खबर आई है। भारत में कोरोना वायरस में एक छोटा लेकिन, महत्वपूर्ण म्यूटेशन रिपोर्ट किया गया है। इसके कारण कोरोना वायरस कुछ कमजोर हो गया है।

वर्ष 2016 में पद्मभूषण से सम्मानित और एशियाई गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट सोसायटी के अध्यक्ष रहे डॉ. डी. नागेश्वर राव ने किया दावा। डॉ. राव ने बताया कि भारत में कोरोना के जीनोम स्ट्रक्चर में म्यूटेशन हुआ है। यह म्यूटेशन इस वायरस के एस-प्रोटीन की चिपकने की क्षमता को कम करता है। इसका अर्थ है कि अब कोरोना के स्पाइक उस कदर शक्तिशाली नहीं रह गए हैं, जैसे चीन में थे।

इटली में हुए नकारात्मक म्यूटेशन इटली बनाम भारत :

इस समय कोरोना वायरस का सबसे घातक असर इटली में दिख रहा है। जहां मृतकों की संख्या 11 हजार का आंकड़ा छूने को बेताब है। इटली में कोरोना वायरस के जैनेटिक मटैरियल में तीन म्यूटेशन हुए। तीनों म्यूटेशन खतरनाक थे और उन्होंने कोरोना वायरस को ज्यादा घातक बना दिया।

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क्या होता है म्यूटेशन :

स्थान, वातावरण या अन्य किसी कारण से यदि किसी सेल (वायरस, बैक्टीरिया से लेकर इंसान तक) के डीएनए और आरएनए में कोई भी बदलाव होता है, तो वह म्यूटेशन होता है। म्यूटेशन ने जीवों के विकास क्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कोरोना वायरस में 29,903 न्यूक्लियस बेस हैं, जिनका क्रमानुसार चीन के मुकाबले भारत और इटली में बदल गया।

दूसरों का मोबाइल न करें इस्तेमाल :

वैसे तो तमाम शोध साबित कर चुके हैं कि आपके स्मार्ट मोबाइल फोन की स्क्रीन टॉयलेट सीट से भी गंदी होती है। यह अंतर 10 गुना तक होता है यानी कि टॉयलेट सीट के मुकाबले 10 गुना बैक्टीरिया आपके मोबाइल पर हो सकते हैं। डॉ. राव बताते हैं कि मोबाइल पर कोरोना वायरस 72 घंटे तक जिंदा रह सकता है। ऐसे में किसी अन्य का मोबाइल फोन इस्तेमाल न करें। यदि किसी का फोन इस्तेमाल करते हैं तो उसे स्पीकर मोड में करें और उसे अपने कान, गाल से टच न करें। फोन कॉल के बाद अपने हाथों को साबून या हैंड सैनेटाइजर से साफ कर लें।

भारत कोरोना पर रिसर्च करने वाला चौथा देश :

जैसे ही चीन के हुबेई प्रांत की राजधानी वुहान में रहस्यमय बुखार फैलने की खबर फैली डब्ल्यूएचओ ने शोध में अग्रणी देशों से मदद मांगी। चीन में तो कोरोना वायरस पर शोध शुरू हुआ ही, साथ ही अमेरिका और भारत में भी कोरोना पर शोध शुरू हुआ। हैदराबाद स्थित जैविक शोध संस्थान भी सक्रिय हुआ। इटली में जब कोरोना फैला तो इटली ने भी इस पर शोध किया। भारत के साथ अमेरिका, चीन और इटली, चार ही देश हैं जहां कोरोना पर पुख्ता जांच की गई है।

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ज्यादा गर्मी देगी राहत :

सोशल मीडिया पर काफी पहले से यह दावा किया जा रहा था कि गर्मी से कोरोना वायरस खत्म हो जाएगा। इस बारे में डॉ. राव ने बताया कि अमेरिका स्थित मैसाचुएस्ट इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआइटी) में इसकी प्रारंभिक पुख्ता जांच हुई है। 32 डिग्री सेल्सियस तक यह आराम से सक्रिय रहता है। शुरुआती जांच में संकेत मिले हैं कि इससे ज्यादा तापमान कोरोना के लिए घातक हो सकता है। हमें मई का इंतजार करना चाहिए, जब पूरे देश का औसत तापमान 35 से 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाएगा। तब तक सावधानी रखें।

आप फिट हैं तो उम्र कुछ नहीं कर सकती :

डॉ. राव बताते हैं कि समाज में एक डर का माहौल बन गया है। आप 60-65 वर्ष से ऊपर के हैं तो मानो कोरोना वायरस आपको संक्रमित कर ही लेगी और नतीजा बहुत खराब हो सकता है। डॉ. राव ने कहा कि ऐसा कुछ नहीं है। यदि आप फिट हैं तो कोरोना वायरस से डरने की जरूरत नहीं है। डायबिटीज, कैंसर, हाईपरटेंशन जैसी घातक बीमारियों के मरीज अपना खास ख्याल रखें, बाकी सभी स्वस्थ जीवन पद्धति को अपनाएं।

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शारीरिक दूरी रखें, सामाजिक नहीं :

डॉ. राव ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान लोग शारीरिक दूरी रखें। कम से कम एक मीटर की दूरी बनाएं रखें। मगर यह दूरी सामाजिक न हो। आपस में बात करें, किताबें पढ़ें, संगीत का मजा लें और एक-दूसरे के अनुभव शेयर करें। अकेले न रहें और खुश रहने की कोशिश करें। वह मानते हैं कि लॉकडाउन के बाद मानसिक तनाव के रोगियों की संख्या में बढ़ोतरी हो सकती है।

शराब ने बरपाया कहर :

डॉ. राव का दावा है कि इटली में खान- पान की आदतों की वजह से ज्यादा मौतें हुईं। इटली में बुजुर्गों की संख्या ज्यादा है और शराब आम जनजीवन का हिस्सा है। भारत में ऐसा नहीं है। इटली में कोरोना वायरस के कारण मृत्युदर 10 फीसद है, जबकि भारत और अमेरिका में लगभग दो फीसद। ऐसे में हमारे यहां इसका प्रभाव कम घातक दिख रहा है।

16 माह में बना लेंगे वैक्सीन : कई शोधों से जुड़े डॉ. राव बताते हैं कि हम वैक्सीन बनाने की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं। विदेश की बात मैं नहीं करता लेकिन, भारत में ही हम 16 माह में वैक्सीन तैयार कर लेंगे। इसलिए परेशान होने की जरूरत नहीं है।

दैनिक जागरण से साभार

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