सही निर्णय की वजह से कोरोना को हरा कर घर आ पाया : डॉ विनोद शाह (अमेरिका में जनकपुर के डाक्टर)

प्रस्तुति डा.श्वेता दीप्ति | कोरोना के कहर ने सम्पूर्ण विश्व में अपना आतंक मचा रखा है । भुतही पटेर्वा धनुषा के 58 वर्षीय डा. विनोद शाह जो लगभग बीस वर्षों से न्यूयार्क में चिकित्सा क्षेत्र में काम कर रहे हैं । कोरोना वायरस ने इन्हें भी अपने चपेट में ले लिया था । जिसे आपने हराया और अब तीन सप्ताह के इलाज के बाद घर आ चुके हैं और आराम कर रहे हैं । डा.शाह को कोरोना जीतने के लिए लगभग तीन सप्ताह तक कड़ी मशक्कत करनी पड़ी । अंत में, कोरोना हार गया । आज भी एक डर उनके अन्दर है कि अगर मैं समय पर अस्पताल नहीं जाता तो पता नहीं क्या होता । परन्तु शुक्र है कि डॉ. शाह समय से अस्पताल गए और स्वस्थ होकर वापस लौटे । उन्हें लगता है कि ईश्वर ने उन्हें एक नई जिन्दगी दी है जो शायद मानवता की सेवा के लिए ही मिली है । वो याद करते हैं कि मैं मरीजों का इलाज कर रहा था और एक दिन उन्हीं मरीजों के साथ स्वयं भी अस्पताल में उनके साथ था । पेशे से डाक्टर होने के कारण लगातार लोगों के सम्पर्क में थे । कोरोना का कोई लक्षण भी समझ नही आ रहा था ।
21 मार्च को खांसी में अचानक वृद्धि के बावजूद उन्हें नहीं लगा कि वो कोरोना से संक्रमित हो रहे हैं । उन्हें लगा पेट की समस्या के कारण खाँसी हो रही है । कई तरह की दवाएं लेने के बाद भी वह ठीक नहीं हुआ । फिर बुखार आया जिसकी वजह से कमजोरी भी बढ गई ।
बुखार बढ़ता गया, तब इन्होंने टाइलोनाल का सेवन किया जिसके कारण बुखार 102 से ज्यादा नहीं बढा । बुखार, कमजोरी और भोजन के प्रति अरुचि से उन्होंने यह अनुमान लगाया कि वह कोरोना वायरस से संक्रमित हैं । फिर रिपोर्ट ने भी यह साबित कर दिया कि वो कोरोना से संक्रमित हैं । इसी बीच पत्नी सुजाता शाह को भी खाँसी शुरु हो गई । दोनों अस्पताल गए पर उनकी पत्नी की जाँच किट की कमी के कारण नहीं हो पाई ।
रिपोर्ट पोजेटिव होने के कारण उन्हें घर में ही क्वारेन्टाइन में रहने की सलाह दी गई जिसका उन्होंने सख्ती से पालन किया । धीरे धीरे उनकी हालत में सुधार होने लगा । बुखार उतर गया था और खाँसी भी कम हो रही थी । पर स्वाद और गंध की क्षमता कमजोर थी, भोजन में रुचि भी बढ़ रही थी । उन्होंने 80 प्रतिशत रिकवरी का अनुभव किया था । लेकिन 7 अप्रैल को उन्हें अचानक सांस लेने में बहुत मुश्किल हुई । और खाँसी भी बढ गई । खुद को व्यस्त रखने की कोशिश करने लगे पर साँस की तकलीफ बढती गई । फिर उन्होंने अस्पताल में खबर किया जहाँ से जवाब आया कि आप कल आइए । पर डा. शाह को लग रहा था कि कुछ सही नही. है उन्होंने अपने साथियों से सम्पर्क किया और सारी बातें बताई । डा. शाह कहते हैं कि रात के 12 बजे तक मैं किसी तरह खुद को संभाल रहा था । लेकिन 1 बजे के आसपास, मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर सका । खुद एक डाक्टर के रूप में, मुझे लगा कि कुछ गलत था । ’

उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि उनके लिए आपातकालीन कक्ष में जाना बेहतर होगा । रात को ज्साधे 1 बजे, एक डाक्टर दोस्त को फोन किया । पहले तो फोन नहीं उठा । लेकिन दोस्त और दोस्त की पत्नी के मोबाइल पर लगातार कॉल करने के बाद उनसे संपर्क हुआ । उन्होंने ९११ पर फोन करने के लिए कहा । अंत में पत्नी के साथ वो अस्पताल पहुँचे । रास्ते भर उन्हें लग रहा था कि कहीं वो होश न खो बैठें । उन्हें पता था कि अब इस हाल में उन्हें वेंटीलेटर पर रखा जाएगा । वह और उसकी पत्नी फिर अस्पताल के आपातकालीन कक्ष में गए । स्वास्थ्य परीक्षण के बाद उन्हें आक्सीजन दी गई जिससे उन्हें आराम मिला । खाँसी कम हो गई और सीने में आराम महसूस हुआ ।
जब डाक्टर सुबह ३ बजे के आसपास आए, तो सभी परीक्षण नमूने लिए गए । अगले दिन, एक एक्सरे और एक छाती सीटी स्कैन में दोनों फेफड़ों में कई निमोनिया पैच दिखाई दिए । इसे देखने के बाद, डाक्टरों की टीम ने डब को अस्पताल से सेंट जान्स अस्पताल रिवरसाइड में स्थानांतरित कर दिया, जहां डाक्टर किसी भी समय उपलब्ध थे । डा.शाह स्वयं इस अस्पताल में कार्यरत हैं । अगर अस्पताल जाने में देर हो जाती तो इन्हें वेंटीलेटर पर रखना पडता पर समय पर पहुँचने के कारण आक्सीजन से ही इनकी हालत सुधर गई ।
उन्हें लगभग सात दिनों तक अस्पताल में रखा गया था । वह सात दिनों तक एक कमरे में अकेले रहे । समय–समय पर डाक्टर आते थे और उन्हें जाँच करते थे । सातवें दिन एक सीटी स्कैन के बाद, उन्हें बताया गया कि अगर वह चाहते हैं तो वे घर जा सकते हैं । उन्होंने घर पर आक्सीजन का अनुरोध भी किया । घर में निजी आक्सीजन उपलब्ध कराने के बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई ।
जब वह 13 अप्रैल को घर आये, तो लगातार दो या तीन दिनों के लिए आक्सीजन दिया गया था । वर्तमान में, वे 24 घंटे में से केवल 12 घंटे आक्सीजन ले रहे हैं । धीरे धीरे यह समय सीमा घटती जाएगी । पर डा. शाह आज भी उन क्षणों को सोच कर भावुक हो जाते हैं । वो कहते है. कि कई बार मानसिक तौर पर तनावग्रस्त हो जाता था । सोचता था अगर मै. नहीं रहा तो मेरे बाद मेरे परिवार का क्या होगा ? आप स्वयं डाक्टर हैं इसलिए वक्त की नजाकत और गम्भीरता को समझ रहे थे । उन्होंने अपने आत्मविश्वास को कम नहीं होने दिया । हर पल अन्दर इस यकीन को जिन्दा रखा कि मुझे ठीक होना है और वापस अपने परिवार के पास जाना है ।
उनका कहना है कि उन्हें आत्मबल और ऊर्जा देने में परिवार की भी बड़ी भूमिका है । अस्पताल से लौटने के बाद, डा. शाह अब अपने अनुभव के आधार पर कोरोना से संक्रमित अन्य लोगों को सलाह दे रहे हैं । और कोरोना के लक्षण तथा उनसे सुरक्षा की बात बताते हैं ।
उनका कहना है कि संक्रमण से बचने के लिए परिवार के सदस्यों के बीच शारीरिक दूरी बनाए रखना आवश्यक है । वह कहते हैं कि अपने हाथों को बार–बार धोना और मास्क या फेस मास्क का उपयोग करना महत्वपूर्ण है । घर के बाहर से आने के बाद, वह बाथरूम जाने और एक गर्म स्नान करने का सुझाव देते हैं और बाहर से आने के बाद ततकल कपडे बदलने की सलाह देते हैं क्योंकि कोरोना वायरस कपडों पर सबसे अधिक समय तक जिन्दा रहता है । है । वह कहते हैं कि अगर आप वायरस से संक्रमित हैं तो भी चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है । यदि सामान्य लक्षण हैं, तो वे अपने आप ही गायब हो जाएंगे, लेकिन मध्यम लक्षणों में, खांसी, बुखार, कमजोरी और स्वाद की क्षमता का नुकसान हो सकता है । वे कहते हैं, “मेरी स्थिति पहले दो हफ्तों के लिए मध्यम थी । लेकिन फिर यह गंभीर हो गया । सांस लेने में कठिनाई एक गंभीर स्थिति है । सबसे बुरा यह है कि आपको इसे वेंटिलेटर पर रखना होगा । लेकिन वेंटिलेटर से अच्छी तरह से घर लौटने वाले लोगों के उदाहरण भी हैं ।
डा. बिनोद शाह न्यूयार्क में रहते हैं और लंबे समय से समाज सेवा में सक्रिय हैं । वि.सं.2019 में आपका जन्म धनुषा के भुतही पटेर्वा में हुआ है । पिता असर्फी शाह और माता रामसती देवी शाह के पांचवें पुत्र के रूप में एक मध्यम वर्गीय परिवार में आपने जन्म लिया है । शाह के 5 भाई और 2 बहनें हैं ।

गाँव के एक स्थानीय स्कूल में अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद, डा. शाह ने जनकपुर के सरस्वती हाई स्कूल में अपनी माध्यमिक शिक्षा पूरी की । आरआर कैंपस जनकपुर में आईएससी करने के बाद, शाह ने बीएससी में पढ़ने के लिए त्रिचंद्र कालेज में दाखिला लिया । त्रिचंद्र में भर्ती होने के कुछ महीने बाद, शाह एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए बांग्लादेश चले गए । बांग्लादेश के ढाका में अपनी एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने स्नातकोत्तर प्रशिक्षण के दो साल और आर्थोपेडिक्स में तीन साल का डिप्लोमा पूरा किया । बांग्लादेश में पढ़ाई के दौरान, शाह ने रेडियो बांग्लादेश में समाचार एंकर के रूप में भी काम किया । बांग्लादेश में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, शाह अपना खुद का क्लिनिक खोलने के लिए जनकपुर लौट आए और यहाँ तक कि जोनल अस्पताल में नौकरी भी कर ली ।
डा. शाह, सामाजिक कार्यों में रुचि रखते हैं और अपनी युवावस्था से ही दूसरों की मदद करते थे, बांग्लादेश में पढ़ाई के दौरान बाढ़ पीडितों की मदद की थी । इसके अलावा, उन्होंने नेपाली छात्रों को एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए बांग्लादेश आने में भी मदद की । उन्होंने बांग्लादेश में नेपाली छात्रों के एक संगठन के लिए भी काम किया । पढ़ाई पूरी करने के बाद भी जनकपुर लौटते हुए भी वे निशुल्क स्वास्थ्य शिविर चलाते थे । उन्होंने यूनिसेफ द्वारा संचालित म्यूनिसिपल मेडिकल क्लिनिक में भी काम किया ।
जनकपुर में काम करते हुए, वह एक निजी प्रशिक्षण के लिए बोस्टन, अमेरिका आए । उन्होंने अगले चार साल बोस्टन में शोध करने में बिताए । 1999 में न्यूयार्क आए डा. शाह ने रेसिडेंसी ट्रेनिंग का एक कोर्स पूरा किया । उस प्रशिक्षण के बाद, उन्हें एक अमेरिकी डाक्टर के रूप में मान्यता मिली । फिर उन्होंने दर्द प्रबंधन में अपनी फैलोशिप पूरी करने के बाद, उन्होंने न्यूयार्क में एक क्लिनिक में एक साल तक काम किया।
फिर 2004 में उन्हें न्यूयार्क में अल्बर्ट आइंस्टीन विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर के रूप में नौकरी मिली । यहां उन्हें विश्वविद्यालय के एक विभाग में निदेशक के रूप में नौकरी भी मिल गई । विश्वविद्यालय में काम करते हुए, उन्होंने 2008 में न्यूयार्क के योंकर्स में अपना मेडिकल सेंटर स्थापित किया ।
संयुक्त राज्य अमेरिका में आने के बाद, डा. शाह नेपालका तराईबासीको संगठन एन्टा, एनआरएन अमेरिका, अमेरिका नेपाल मेडिकल फाउन्डेसन, एसोसिएसन अफ नेपाली फिजिसियन इन अमेरिका और अन्य संगठनों के साथ सामाजिक कार्यों में शामिल हो गए । इसके अलावा, वह संयुक्त राज्य में सामाजिक कार्यों में समान रूप से सक्रिय है ।
1998 में बिहार के दरभंगा में सुजाता शाह से डा बिनोद शाह की पारंपरिक शादी हुई । सुजाता पेशे से डेंटिस्ट हैं । शाह के लिए अपनी पत्नी की मदद लेना आसान था क्योंकि उनका पेशा भी एक जैसा ही था । अपनी पत्नी की मदद से वह सामाजिक कार्यों के लिए समय निकाल पा रहे हैं । बिनोद शाह, बेटे प्रशांत शाह और बेटी राधिका शाह के पिता, भविष्य में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने के लिए नेपाल जाने की योजना बना रहे हैं ।
डा. शाह, एक दशक से अधिक समय से एनआरएनए के साथ हैं,2010 में एनआरएनए अमेरिका के कोषाध्यक्ष थे । शाह 2017 से एनआरएन अमेरिका के सलाहकार भी हैं ।
इस तरह धैर्य और सही निर्णय तथा समुचित परहेज ने उन्हें एक नई जिन्दगी दी । आपका मानना है कि यह एक ऐसी बीमारी है जहाँ शुरु में लक्षण पता नहीं चलता किन्तु अगर थोडी सी सावधानी बरती जाए और अपने आप में हो रहे बदलाव पर ध्यान दिया जाए तो हम इस वायरस से जीत सकते हैं ।


