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दुख डेरा डाले बैठा है सुख का पता नहीं : कल्याणसिंह शेखावत

 

*सुख-दुख* कल्याणसिंह शेखावत

दुख डेरा डाले बैठा है
सुख का पता नहीं
दुख संवेदनशील रहा है,
सुख का पता नहीं।

दुख आँखों में रहा सँभलकर,
पर सुख आँसू बन छलका है।
रहा लुटाता दुख अपनापन,
सुख का दिल कितना हल्का है।।
अब दुख के सूखे पोखर में,
गंदा कीचड़ भरा पड़ा है।।
सुख का पता नहीं।

करता है वह आना-कानी,
वादों के सब पत्ते सूखे।
गुजरे वर्ष, महीने कितने,
किंतु रहे सुख-वैभव रूखे।।
बिना शिकायत अपना प्यारा,
दुख बेचारा अडिग खड़ा है।
सुख का पता नहीं।।

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मेलजोल सुख के मौसम के,
अर्थहीन संवाद हो गए।
सुख संबंध हुए सब ढीले,
दुख मकड़ी के जाल हो गए।।
सुख का धान जहाँ बोया था,
दुख का जँगली झाड़ उगा है।।
सुख का पता नहीं।।

स्नेहिल सुख का नीड़ दूर है,
दुख का पंछी बिना पंख हैं।
सुख की घड़ियाँ थाम सके ना,
दुख का दंभी नाद शंख हैं।।
सात जन्म से सुख के बैरी,
पर दुख का उपकार बड़ा है।।
सुख का पता नहीं।

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कल्याणसिंह शेखावत
जयपुर

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