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प्रेस आजादी का मतलब  सामाजिक नव निर्माण से है : श्वेता दीप्ति

 

डा.श्वेता दीप्ति, काठमांडू, ३ मई २०२० | अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस हर साल तीन मई को मनाया जाता है। प्रेस किसी भी समाज का आइना होता है। विश्व स्तर पर प्रेस की आजादी को सम्मान देने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा ३ मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस घोषित किया गया, जिसे विश्व प्रेस दिवस के रूप में भी जाना जाता है। यूनेस्को द्वारा १९९७ से हर साल ३ मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर गिलेरमो कानो वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम प्राइज भी दिया जाता है। यह पुरस्कार उस व्यक्ति अथवा संस्थान को दिया जाता है जिसने प्रेस की स्वतंत्रता के लिए उल्लेखनीय कार्य किया हो।

दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों में कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के साथ प्रेस को चौथा खंभा माना जाता है। प्रेस इनको जोड़ने का काम करती है। प्रेस की स्वतंत्रता के कारण ही कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका को मजबूती के साथ आम आवाम की भावना को अभिव्यक्त करने का अवसर हासिल हुआ है। कभी कभी प्रेस पर तिल को ताड़ बनाने का आरोप लगाया जाता है हालाँकि यह पूरी तरह सच नहीं है। जनमत जागृत करने का कार्य प्रेस ही करती है अर्थात् सोये हुए को जगाने का काम भी करती है। राजनीतिक दलों और नेताओं को राह दिखाने का काम भी बहुधा मीडिया ही करती है। आम आदमी को रोटी कपड़ा और मकान की बुनियादी सुविधा सुलभ करने में भी प्रेस की अहम् भूमिका है। भ्रष्टाचार से लड़ने का काम भी प्रेस ने बखूबी किया है। सत्ता की नाराजगी का दंश भी मीडिया को झेलना पड़ा है।

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समाज के आपसी रिश्तों में जो संयम है वही संयम मीडिया को भी अपने संवाद में रखना होगा। इससे मीडिया के प्रति समाज में आदर और सम्मान बढ़ेगा और कोई भी ताकत मीडिया की आजादी को कुचल नहीं पाएगी। पत्रकारों को स्वतंत्रता और सुरक्षा मिलनी ही चाहिए। प्रेस को खतरा दरअसल मीडिया मालिकों से नहीं है, उन शक्तियों से है जो जल्दी से ज्यादा पैसा बनाना चाहती हैं। ऐसे में मीडिया को उच्च मानदंड और आदर्शों पर काम करना होगा ताकि कोई भी उस पर उंगलियां न उठा सके, क्योंकि एक पत्रकार सिर्फ खबरों को बताने वाला नहीं है बल्कि वह एक बुद्धिजीवी और सामाजिक प्राणी भी है। मीडिया जितना स्वतंत्र होगा, सरकारी कामकाज उतने पारदर्शी होंगे। सामाजिक और राष्ट्रीय सरोकारों के प्रति जागरूकता बढ़ेगी। सोशल मीडिया का दखल और इसका प्रयोग जिस तरह बढ़ रहा है, उसका लाभ भी पत्रकारिता को मिलेगा। आज मीडिया का प्रभाव काफी बढ़ गया है। यह कई बार सामने आता है कि मीडिया पर पूंजीपतियों का आधिपत्य है जिसके कारण वह स्वतंत्र हो कर कुछ भी लिखने को तैयार नहीं है। पर अब मीडिया केवल प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक तक सीमित हो कर नहीं रह गया है, उस पर सरकार और पैसे वालों का उतना कब्जा नहीं है क्योंकि सोशल मीडिया ने जनमानस का विश्वास जीतने में सफलता हासिल कर ली है। अब मीडिया चंद हाथों में सीमित होकर नहीं रह गया है और न ही दारू और पैसे में बिकने वाला है। दरअसल इंटरनेट के विस्तार के बाद सोशल मीडिया का जबरदस्त प्रभाव देखने को मिला है अब कोई खबर दबाई नहीं जा सकती। सोशल मीडिया के कारण वह लोगों तक तुरंत पहुँच जाती है। हालाँकि यह भी सच है कि कुछ चालाक और धूर्त लोगों ने सोशल मीडिया को अपना हथियार बनाकर मीडिया का दुरूपयोग भी किया है।

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आज सोशल मीडिया ने घर घर में पत्रकार खड़े कर दिए हैं जो पलक झपकते ही आप तक समाज में घटने वाली घटना ज्यों की त्यों परोस देता है। वह भी बिना लाग लपेट के। इसके अनेक खतरे भी उत्पन्न हो गए हैं जिससे समाज को लाभ कम और हानि अधिक होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। आज मीडिया के बेहतर फैलाव के बाद यह महसूस किया जा रहा है कि प्रेस की आजादी कायम  रखी जाये मगर साथ ही जिम्मेदारी की भावना का भी निर्वहन किया जाये। पर नेपाल में पिछले दिनों कुछ ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं जो मीडिया और पत्रकारों की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने और डराने का काम कर रही है जो किसी भी राष्ट्र के हित में नहीं है । सरकार का दखल पत्रकारिता की दुनिया में सही कदम नहीं है । आज चीन के सन्दर्भ में ही देखा जाए तो अगर वहाँ संचार माध्यम स्वतंत्र होता तो विश्व आज महामारी का कहर नहीं झेल रही होती । देश समाज और विश्व को सही समाचार का संप्रेषण आवश्यक होता है यह जन कल्याण के लिए जरुरी है । प्रेस की आजादी का मतलब हमारे सामाजिक नव निर्माण से है। प्रेस को अपनी स्वतंत्रता कायम रखते हुए समाज के जन जागरण में अपनी भूमिका तलाशनी होगी। प्रेस की चुनौतियां व्यापक हैं जिसे चंद शब्दों में बांधा नहीं जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि समाज में गैर बराबरी पर हमला बोल कर समता और न्याय का मार्ग प्रशस्त हो सके इसमें प्रेस के साथ हम सब की भलाई निहित है।

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