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सुरसा मुख से प्रश्न अनेक : विमल पोद्दार

 

*सुरसा जैसे प्रश्न अनेक*

कोई सोने का कोई चांदी का,
किसी का चम्मच है पीतल का।
कोई नील गगन में उङता,
कुछ को पता नहीं भूतल का।।
कठोर परिश्रमी बडे उद्धमी,
हिमगिरी सी है आकांक्षायें।
कुछ को होती ध्येय प्राप्ति,
कुछ की मरणासन्न आशायें।।
कोई खुशी खुशी जीता है,
कुछ क्यूं मर मर कर जीते।
पनघट पर हक सबका है तो,
घट कुछ के क्यूं रीते रीते।।
चरागाह में चरते हैं सब,
गर्दभ घोडे गैया भूखी।
चर जाते कुछ हरी हरी,
कुछ के हिस्से में सूखी सूखी।।
एक पथ के पथिक हैं सब,
बढ़ रहे हैं पग बढ़ाते।
कुछ ही क्यू पाते हैं मंजिल,
कुछ कदम क्यूं लङखङाते।।
कुछ छोटे कुछ बडे बडे,
सुरसा मुख से प्रश्न अनेक।
भिन्न राज्य हो भिन्न राष्ट्र हो,
उत्तर हर भाषा में एक।।
सच्चाई से जीवन जीना,
बेवकूफी का एक प्रकार है।
छद्म वेष में छलते हैं जो,
वो समाज के कर्णधार है।।

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विमल पोद्दार
भयन्दर, मुम्बई

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