Mon. Jul 13th, 2020

युग नहीं बदला : वीरेंद्र बहादुर सिंह

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वीरेंद्र बहादुर सिंह, नोएडा | एक गहरी सांस लेकर रजनीकांतजी ने करवट बदली । मन तो हो रहा था कि एक झपकी ले लें लेकिन अंदर उठने वाला बवंडर
आंख लगने नहीं दे रहा था । नींद आती भी तो कच्चे धगे की तरह टूट जाती । बेटी के बदले व्यवहार से उनका मन इस तरह बेचैन
रहने लगा था कि सोना ही नहीं, एक तरह से खाना-पीना भी हराम हो गया था । नाराज होकर उन्होंने उससे बात तक करना बंद कर
दिया था । अपना हर काम वह नौकरानी काशी से कराने लगे थे । बेटी का सहारा उन्होंने लगभग छोड़ दिया था। लेकिन बात बर्दाश्त
से बाहर हो गई और उनसे रहा नहीं गया तो एक दिन सुबह-सुबह उन्होंने टोंक दिया, ‘‘बेटा तुम जो कर रही हो, वह मुझे जरा भी अच्छा
नहीं लग रहा है।’’
‘‘पापा, मेरी समझ में यह नहीं आता कि आप मुझे लेकर परेशान रहते हैं या प्रकाश को? मैंने आप से कितनी बार कहा कि उस की
बात मुझ से बिलकुल न किया करें। उसे कल मरना है आज ही जाए, मुझे अब उससे कोई मतलब नहीं है।’’ अंजना ने रजनीकांत को
खरीखरी सुना दी थी।
रजनीकांत ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि अंजना उनकी एकलौती बेटी थी इसलिए उन्होंने उसे कभी बेटी समझा ही नहीं
था। हमेशा उसे बेटे की तरह मान कर पालापोसा था। अंजना आठवीं में पढ़ रही थी तभी पत्नी का निध्न हो गया था। हितैषियों ने दूसरी
शादी के लिए बहुत दबाव डाला पर उन्होंने बेटी की खातिर अपनी जवानी होम कर दी थी। उसे बाप के साथ-साथ मां का भी प्यार
दिया था। उन्होंने अंजना को पूरी आजादी दे रखी थी। कभी किसी तरह की रोकटोक नहीं करते थे। उसे हर काम अपने आप करने दिया
था। इस समय वह एक विदेशी विज्ञापन एजेंसी में सीनियर मैनेजर थी। वेतन के रूप में उसे मोटी रकम तो मिलती ही थी, एजेंसी की
ओर से लग्जरी गाड़ी भी मिली थी। शायद इसीलिए वह स्वभाव से अभिमानी हो गयी थी। अपनी कमाई और सुंदरता पर उसे बहुत गुरूर
था।
रजनीकांत सरकारी प्राथमिक विद्यालय में हेडमास्टर थे। दूसरों को शिक्षा देने में उन्होंने पूरी जिंदगी बिता दी थी। जब तक नौकरी में
थे, स्कूल में बच्चों को शिक्षा देकर तनख्वाह लेने का पफर्ज निभाते रहे। रिटायर होने के बाद भी वह गली-मोहल्ले के बच्चों को पढा
कर सामाजिक दायित्व निभा रहे थे। वह धर्मिक प्रवृत्ति के कोमल हृदय आदमी थे। किसी का दुख उनसे देखा नहीं जाता था। इसीलिए
तो वह बेटी के व्यवहार से परेशान थे।
एमबीए करते ही अंजना को एक छोटी सी एडवरटाइजिंग एजेंसी में मार्केटिंग सहायक की नौकरी मिल गयी थी। वेतन तो कोई बहुत
आकर्षक नहीं था, लेकिन उसने उस एडवरटाइजिंग एजेंसी में इस उम्मीद से नौकरी कर ली थी कि अनुभव प्राप्त कर लेने के भविष्य
सुध्र जायेगा लेकिन बाद में अंजना ने उसी एजेंसी के मालिक प्रकाश कुमार से शादी कर ली थी। पति-पत्नी की मेहनत और लगन से
उनकी एडवरटाइजिंग एजेंसी बढ़िया चल निकली थी। पिफर तो जल्दी ही शहर के पाॅश इलाके में उनका अपना अलग फ्रलैट, गाड़ी, नौकर सब कुछ हो गया था। लेकिन जैसे-जैसे पैसा आता गया, अंजना का स्वभाव बदलता गया। उसे लगता कि प्रकाश की यह विज्ञापन एजेंसी उसी की बदौलत चल रही है। महीने में लाखांें रफपये की कमाई हो रही है, यह उसी की मेहनत का नतीजा है। यह विचार मन में आते ही उसमें अहंकार आने लगा। पिफर तो वह प्रकाश कुमार को पति या एजेंसी का मालिक नहीं, नौकर समझने लगी। वह कोई अच्छी बात भी कहते, तो अंजना
उन्हें इस तरह झिड़क देती जैसे उन्हें मालूम ही नहीं है। उसके सामने वह निरा बु(ू है। वह उन्हें जलील करते हुए कहती, ‘‘आपको क्या
पता, यह काम मैंने मुश्किल से किया है। आप तो दिन भर आराम से आपिफस आपिफस में बैठे रहते हैं, मैं एक-एक कस्टमर ढूंढ़ कर लाती हूं और आप हैं समय से पेमेंट भी नहीं वसूल पाते। उसके लिए भी मुझे ही भागदौड़ करनी पड़ती है।’’
प्रकाश को पत्नी की ये बातें बुरी तो बहुत लगतीं, परंतु घर-आपिफस में ही नहीं, जीवन में भी शांति बनाए रखने के लिए समझदारी
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का परिचय देते हुए वह चुप्पी साध्े रहते। उन्हें पता था कि दांपत्य जीवन आपसी समझदारी से ही सुखी रहता है। लेकिन उन्होंने शांति
बनाये रखने के लिए जितनी चुप्पी साध्े रखी, अंजना उतनी ही उग्र होती गई। उनकी चुप्पी को वह उन की कमजोरी समझने लगी, जिससे
वह मनबढ़ होती गई। आखिर जब हद हो गई तो प्रकाश ने चुप्पी तोड़ ही दी। और पिफर उसके चुप्पी तोड़ते ही उसका दांपत्य भी टूट गया। घमंडी अंजना को पति की अच्छी बातें भी इतनी बुरी लगीं कि वह उसका कामधम ही नहीं उसे और उसका घर भी छोड़ कर अपने पिता के घर आ गई। अंजना के जाने से प्रकाश के कामधम पर ही नहीं, जीवन पर भी गहरा असर पड़ा था। कामधम तो नई आई मार्केटिंग मैनेजर ने संभाल लिया था, लेकिन अब उसे संभालने वाला कोई नहीं था। मां-बाप के जाने के बाद अंजना से ही प्यार मिला था। वह प्यार भी उसके जीवन से जाता रहा तो वह उदास रहने लगा। भाई परिवार के साथ विदेश में रहते थे। इसलिए उनसे सिवाय सांत्वना के कोई और मदद नहीं मिल सकती थी। जब इस बात की जानकारी रजनीकांत को हुई थी तो उन्होंने अंजना को समझाया था, लेकिन अब उनकी बेटी पहले वाली बेटी नहीं
रही थी, उसे पर लग गये थे। बाप की बात मानने की कौन कहे उसने उन्हें झिड़क दिया था, ‘‘पूरी जिंदगी मैं आपकी अंगुली पकड़
कर नहीं चलती रहूंगी। अब मैं अपने जीवन के पफैसले लेने में सक्षम हूं, इसलिए अब आप मेरे बारे में सोचना-समझाना और कुछ भी
कहना-सुनना बंद कर दें।’’
बेटी की इन बातों से रजनीकांत ने स्वयं को बहुत अपमानित महसूस किया था। इससे दुखी होकर उससे बोलचाल बंद कर दी थी।
कभी-कभी प्रकाश का मन करता कि सारा कुछ बेचकर भाई के पास विदेश चला जाये, लेकिन उसने बड़ी मेहनत से अपना यह
कारोबार जमाया था। अपने इस कारोबार से भी उसे उतना ही प्यार था, जितना अंजना से था। इसके अलावा उसे एक उम्मीद यह भी
थी कि आज नहीं तो कल, अंजना जरूर वापस आ जायेगी। एक ही शहर में रह कर वह उसे मना सकता था। बाहर चले जाने पर सारी
उम्मीद खत्म हो जायेगी।
जैसे-जैसे दिन बीतते रहे, उम्मीद खत्म होती गई। प्रकाश पत्नी की बेवपफाई सहन नहीं कर सका और ध्ीरे-ध्ीरे टूटने लगा। थका-मांदा
देर रात वह घर लौटता तो नशे में होता। तब कोई यह पूछने वाला नहीं होता था कि वह खायेगा या ऐसे ही सो जायेगा। सुबह कोई प्यार
से नाश्ता कराने वाला भी नहीं था। नौकर से जितना हो सकता था, वह अपने हिसाब से देखभाल करने की पूरी कोशिश करता था। लेकिन
पत्नी की बराबरी भला नौकर कहां कर सकता था। उसका जो मन होता बना कर रख देता, उसी में से प्रकाश का जितना मन होता खा
लेता। अक्सर नशे में होने की वजह से वह बिना खाये ही सो जाता था। तब नौकर यह भी नहीं कह पाता था कि थोड़ा-बहुत ही खा
लो। इस सबका नतीजा यह निकला कि वह बीमार रहने लगा। अंजना के न रहने से इलाज में भी खूब लापरवाही हुई।
मामला बिगड़ गया तो शहर के अच्छे से अच्छे से डाक्टरों को दिखाया गया, लेकिन मामला इतना बिगड़ चुका था कि शहर के अच्छे
से अच्छे डाक्टरों को दिखाने के बावजूद बीमारी कम होने के बावजूद बढ़ती ही गई। बीमार आदमी सिपर्फ दवा से ही नहीं इच्छाशक्ति से ठीक होता है। लेकिन प्रकाश में अब जीने की इच्छा ही नहीं रही थी। वह सोचने लगा था कि अब जिया ही किसके लिया जाय। वह इलाज सिपर्फ लोगों के कहने पर करा रहा था। ध्ीरे-ध्ीरे हालत यह हो गई कि वह बिस्तर पर पड़ गया। उसे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। ऐसे में उसे अपनों की खास जरूरत थी, लेकिन अपना तो कब का पराया हो चुका था। नौकर ने कितनी बार कहा कि मैडम को पफोन कर दूं, लेकिन प्रकाश ने सापफ मना कर दिया था। उसने अंजना को ही नहीं, अपने किसी को भी पफोन करने मना कर दिया था। इसके बावजूद नौकर नहीं माना और उसने अंजना के यहां पफोन कर ही दिया। उसके पास अंजना का मोबाइल नंबर तो था नहीं, इसलिए उसने घर के लैंडलाइन नंबर पर पफोन किया था। संयोग से उस समय अंजना घर में नहीं थी, इसलिए पफोन रजनीकांत ने उठाया। नौकर ने उनसे बता दिया कि साहब की तबीयत बहुत ज्यादा खराब है? वह अस्पताल में भर्ती हैं, कुछ भी हो सकता है। 3 यह सुनकर रजनीकांत सन्न रह गये थे। उन्हें यह तो पता था कि अंजना प्रकाश को छोड़ कर चली आई है, लेकिन बात यहां तक पहुंच गई है, यह उन्होंने नहीं सोचा था। अंजना से वह बातचीत नहीं करते थे, पिफर भी उसके घर लौटने पर उन्होंने उससे प्रकाश के बारे में बता दिया। वह इस बात को इस तरह टाल गई, जैसे उसने कुछ सुना ही न हो। तब उन्होंने झुंझला कर कहा, ‘‘बेटा, आदमी होने के
नाते तुम्हारा ध्र्म बनता है कि इस स्थिति में तुम प्रकाश के पास रहो। वह तुम्हारा पति है। तुम्हारा प्यार पाकर वह ठीक हो सकता है। पिफर
तुम्हारे अलावा उसका है ही कौन?’’
कुछ देर तो अंजना इस तरह खड़ी रही, जैसे कुछ सोच रही हो, पिफर व्यंग्यात्मक हंसी हंसते हुए बोली, ‘‘मैंने उसका ठेका ले रखा
है क्या? इस दुनिया में न जाने कितने लोग बीमार पड़े हैं। अब मै सबके पास जाकर प्यार दूं कि वे ठीक हो जाएं। मैं किसी के लिए
अपनी खुशियों का गला क्यों घोटूं। प्रकाश से अब मेरा कोई संबंध् नहीं है। उसे कल मरना है, वह आज ही मर जाए। आप उसकी देखभाल
की बात कर रहे हैं, मैं उसे देखने भी नहीं जाऊंगी।’’
रजनीकांत को चक्कर सा आ गया। गुस्सा जब्त करने के वह आदी बन चुके थे। पिफर उनके मन में आया कि उसका गला दबा दें।
ऐसी औलाद के जीने से मर जाना ही ठीक है। वह उठे और अपने कमरे में चले गये। उन्होंने सोच लिया कि अब उसकी ओर देखेंगे
भी नहीं। वैसे भी उनके सारे काम नौकरानी काशी करती थी। 22 वर्षीया काशी गरीब घर की तो थी ही, बेचारी पति से भी दुखी थी।
रजनीकांत से जितना हो सकता था, वह उसके लिए करते थे, इसीलिए तो वह उन्हें बाप की तरह मानती थी।
आखिर वही हुआ, जिसका रजनीकांम को डर था। प्रकाश यह दुनिया छोड़ कर चला गया। खबर सुनकर रजनीकांत की आंखों में आंसू
आ गये। लड़खड़ाते हुए वह यह खबर बताने अंजना के पास पहुचे। डबडबाई आंखों से उन्होंने अंजना को घूरते हुए रफंध्े गले से कहा,
‘‘अंजना, प्रकाश नहीं रहा।’’
इतना कह कर रजनीकांत अपनी रफलाई नहीं रोक सके और पफपफक कर रो पड़े। लेकिन अंजना ने जैसे कुछ सुना ही नहीं। उस पर
कोई पफर्क नहीं पड़ा। उसका चेहरा उसी तरह भावशून्य बना रहा। स्वस्थ होने का प्रयास करते हुए रजनीकांत ने कहा, ‘‘बेटा, प्रकाश के
मरने से तुम्हें आनंद हुआ या दुख, यह मैं नहीं जानना चाहता, लेकिन मौत की इज्जत तो आदमी को करनी ही चाहिए। मुझे तुमसे कुछ
कहना नहीं है। मरने वाले के लिए तुम्हारे मन कुछ भी रहा हांे, लेकिन इस समय तो तुम्हें उसे संभालना ही होगा। मौत शाश्वत है और
यह भी निश्चित है कि एक न एक दिन सभी को आनी है। मैं जानता हूं कि तू पिफर से शादी करेगी, इस बारे में मुझे कुछ भी नहीं कहना।
लेकिन इस समय तो तुझे जाकर उसके नाम का सिंदूर पोंछना पड़ेगा। दुनिया को दिखाने के लिए ही सही, मेरे कहने पर ही सही, इतना
तो तुझे करना ही पड़ेगा।
अंजना कुछ देर शांत बैठी सोचती रही, पिफर अचानक गंभीरता से बोली, ‘‘पापाजी, मैं पुराने रीतिरिवाजांे को बिलकुल नहीं मानती चूड़ियां
और सिंदूर मेरे लिए सुहाग की निशानी नहीं हैं। इन्हें मैंने कभी पहना भी नहीं है। इन्हें मैं सिपर्फ एक गहना मानती हूं, जिन्हें पहनने से स्त्राी
की सुंदरता बढ़ती है। इसीलिए जब मेरा मन होता है, चूड़ियां पहन लेती हूं और जब मन होता है उतार कर पफेंक देती हूं। सिंदूर का भी मेरे लिए कोई महत्व नहीं है। उसे भी मैं सिपर्फ अच्छा लगने के लिए जब मन होता था लगा लेती थी। जरूरी नहीं था कि उसे मैं लगाउफं ही। प्रकाश के जाने से मेरा सुहाग चला गया, मैं यह कतई नहीं मानती, बल्कि उसके जाने से मुझे सौभाग्य ही प्राप्त हुआ है। आपके अनुसार
मुझे उसके अंतिम संस्कार में जाना तो होगा ही, चूड़ियां भी उतारनी होंगी और सिंदूर भी पोंछना होगा, रोने का नाटक भी करना होगा,
क्योंकि उसकी सारी संपत्ति पर कब्जा जो करना है। आखिर अभी तो मैं उसकी पत्नी ही हूं।
अंजना उठी और कपड़े बदल कर गाड़ी लेकर निकल गई। रजनीकांत ने सिर पीट लिया, ‘आज के बच्चों की सोच कैसी हो गई है,
क्या हो गया है इन्हें? ये स्वार्थ में इतने गिर गए हैं कि अपने संस्कार तक भूल गए हैं। इन्हें मां-बाप और समाज का भी लिहाज नहीं रहा।’
यह सब सोच कर उन्हें गुस्सा तो बहुत आया, पर अब वह कर ही क्या सकते थे। उनके आंसू धरा बन कर बह निकले। वह आकर चुपचाप
अपने कमरे में लेट गए। जाना तो उन्हें भी चाहिए था प्रकाश के अंतिम संस्कार में, लेकिन अंजना ने जो बरताव किया था, उससे उन्हें
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लगा कि अगर वह वहां जाते हैं तो लोग यही कहेंगे कि वह भी उसके साथ मिले हैं।
प्रकाश का अंतिम संस्कार हो गया। रजनीकांत ने सोचा था कि अंजना उसका शांति पाठ वगैरह करा कर ही लौटेगी, लेकिन वह तो
उसी दिन शाम को घर आ गई थी। उसके चेहरे पर न कोई दुख न कोई चिंता, बल्कि वह पहले से ज्यादा खुश नजर आ रही थी। अगले
दिन वह टाइट जींस और लो-कट टाप पहन कर निकलने लगी तो उसे देख कर रजनीकांत ने मुंह पफेर लिया।
रजनीकांत ने देखा एक लड़का बाहर सड़क पर कार लिए खड़ा उसका इंतजार कर रहा था। उसे देख कर उनका कलेजा पफट गया।
उन्होंने नौकरानी को आवाज दी, ‘‘बेटा काशी।’’
‘‘आई बाबूजी।’’ कहने के साथ ही काशी उनके पास आकर खड़ी हो गई।
तभी उनके कानों में अंजना के ये शब्द पड़े, ‘‘प्रकाश की मौत से संबंध्ी कागज बनवाने जा रही हूं, क्योंकि उसकी सारी प्राॅपर्टी और
बैंक खातों एवं एलआईसी वगैरह के लिए क्लेम भी तो करना पड़ेगा न।’’
रजनीकांत ने उसकी बात पर ध्यान न देकर काशी को तैयार देखकर उससे पूछा, ‘‘तू भी जा रही है क्या?’’
‘‘जी बाबूजी जाना तो पड़ेगा ही, उनकी तबीयत बहुत खराब है।’’ काशी ने लाचारी व्यक्त की।
‘‘जो आदमी दूसरी औरत के पीछे भाग रहा है, उसके लिए तुझे इतना मारता भी है। इतनी मार खाने के बावजूद भी तू उसके लिए
इस तरह परेशान है।’’
‘‘कुछ भी हो बाबूजी वह मेरा पति है। जब तक वह है, मैं सुहागन हूं, समाज में इज्जत है, वह नहीं रहेगा तो लोग सुबह-सुबह मेरा
मुंह भी नहीं देखना चाहेंगे।’’ काशी ने नम आंखों से कहा।
काशी की इन बातों से रजनीकांत का दिल भर आया। उन्होंने कहा, ‘‘जा बेटा, सुखी रह।’’
काशी चली गई। रजनीकांत की समझ में यह नहीं आ रहा था कि पढ़ी-लिखी अंजना ज्यादा अच्छी और समझदार है या पिफर अनपढ़
और गंवार काशी? उन्हें लगा दुनिया कितनी भी पढ़-लिख जाए, युग नहीं बदलेगा।

वीरेंद्र बहादुर सिंह
जेड 436ए, सेक्टर 12ए नोएडा,गौतम बु( नगर, पिन: 201301

 

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