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तू हार नहीं,तू धीरज रख : अनिल कुमार मिश्र,

 

तू हार नहीं,तू धीरज रख
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जीवन के झंझावातों में
तूफानों में बरसातों में
अपनों के प्रतिपल धोखे में
तू हार नहीं तू धीरज रख।

ऊपर की सीढी में नीचे
गर फिसलें दो पग भी तो
हिम्मत बटोरकर फिर उठना
बढ़ते रहना बढ़ते रहना।

लगे कभी दिल टूट रहा
मन बैठ रहा,है शक्ति नहीं
बढ़ नही सकूँगा एक कदम
तू हार नहीं तू धीरज रख।

जीवन से प्रतिपल सीख विजय
हर पल जीतो होकर निर्भय
फिर भी मन विचलित कभी लगे
तू हार नहीं तू धीरज रख।

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जो मिले दर्द धोखा और छल
तो अपनों से बचकर रहना
गर दूजे भी छलें कभी
तू हार नहीं तू धीरज रख।

लक्ष्य तुझे दिख रहा वहाँ
मन बढ़ा रहा है पग दो पग
गर खींच रहा कोई पीछे तो
तू हार नही तू धीरज रख।

विकट काल,परिवर्त्तन तय है
निर्भय जीवन मे सदा विजय है
डग-डग पग-पग बढ़ते जाना
आगे बस तेरी ही जय है।

देखो नयनों से नयी किरण
खुश है उर भी और प्रमुदित मन
विष बाण व्यंग्य से दूर है मन
खुश हो जा तू पर धीरज रख।

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मन की चंचलता से बचना
उग्र ना होना धैर्य ना खोना
उपहार बहुत हैं काल-कोष में
धीरज रख तू धीरज रख।

-अनिल कुमार मिश्र,
    हज़ारीबाग़, झारखंड,भारत

-अनिल कुमार मिश्र,
हज़ारीबाग़, झारखंड

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