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नेपाल के परिप्रेक्ष्य में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी युद्ध : सरिता गिरी

 


हिमालिनी  अंक जुलाई 2020 ।झापा विद्रोह से शुरु होकर माओवादी जनयुद्ध के एक दशक का टेढ़ा मेढ़ा सफर तय कर २०६२–६३ के जन आन्दोलन के बाद निरन्तर सत्ता साझेदारी करते हुए नेपाल कम्युनिट पार्टी २०७४ साल में बहुमत की सरकार बनाने में कामयाब हुई है । सरकार अपने बहुमत का प्रयोग कर पार्टी तथा देश की विदेश नीति परिवत्र्तित करने के लिए उद्दत है । इसके लिए नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी और चीनी कम्युनिष्ट पार्टी के बीच गत साल चीनी राष्ट्रपति शी के भ्रमण के दौरान दूरगामी महत्व वाले समझौते हुए हैं । अगर उन समझौतों को गहराई से मनन किया जाए तो इस बात की सहज अनुभूति हो जाती है कि समझौता देश में सत्ता संचालन के लिए निर्देशन के समान भी हैं । चीनी कम्युनिष्ट पार्टी के साथ समझौता और अभी का नक्शा संशोधन प्रकरण देश की विदेश नीति मे परिवत्र्तन की दिशा को स्पष्ट करता है । अभी की सरकार ने निश्चित रूप से यह निर्णय नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी के निर्देशन अनुसार लिया है ।

नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी के दस्तावेजों से स्पष्ट होता है कि पार्टी वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धान्तों का अवलम्बन करती है, अर्थात पार्टी के इस निर्णय के पीछे माक्र्सिज्म, लेनिनिज्म, माओइज्म से सम्बन्धित कोई न कोई सैद्धान्तिक अवधारणा और तदनुसार का अभ्यास जुडा हुआ है । हाल विदेश नीति में परिवत्र्तन के लिए वह सैद्धान्तिक अवधारणा क्या हो सकती है, उसको समझने का प्रयास करना होगा । तभी हम अपने अपने सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक धरातल से सरकार के कदम के बारे में अपना दृष्टिकोण तय कर सकते हैं । इसको समझने के लिए इतिहास में बहुत दूर नहीं बस ७० सत्तर साल पीछे की विश्व राजनीति के पन्नों को पलटाना होगा ।

सन् १९१७ में सबसे पहले सोवियत संघ में और उसके बाद चीन मे १९४९ में जनवादी क्रांति सफल हुई । उसके बाद बेजिंग और मास्को के बीच फरवरी १९५० में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संधि सम्पन्न हुआ था । वह युग मूलतः एशिया और अफ्रीका में कम्युनिष्ट आंदोलन का युग था । उस युग में चीन ने सोवियत संघ को अपना नेता स्वीकार किया था । संधि के बाद चीनी कम्युनिष्ट पार्टी में चीनी विदेश नीति के बारे मे विचार विमर्श हुआ । पार्टी ने चीन की परम्परागत वेदेशिक नीति को त्याग कर नये विदेश नीति को अंगीकार करने का निर्णय लिया और वह निर्णय उस समय विश्व राजनीत मे विद्दमान दो मुख्य खेमों मे से एक खेमे की तरफ झुकने का था । अंग्रेजी में इसे (भिबलष्लन तय यलभ कष्मभ – कहा गया ।

चीन इस निर्णय के बाद सोवियत संघ के नेतृत्व में रहे समाजवादी खेमे में शामिल हो गया और अगले दो दशकों तक इस खेमे में रहा । वह युग शीत युद्ध का भी युग था । माओ ने अमेरिका को अपना प्रमुख शत्रु घोषित कर साम्राज्यवादी अमेरिका के विरुद्ध अभियान का नेतृत्व स्वयं किया । चीन का ध्यान उस वक्त एशिया में अपना नेतृत्व स्थापित करने पर केन्द्रित था । उसी समय जब कोरिया में युद्ध शुरु हुआ तब चीन उस युद्ध में पूर्वीय एकता और क्रान्तिकारी राष्ट्रवाद के नारों के साथ संलग्न हुआ । माओ का यह मानना था कि चीन का उस युद्ध में प्रवेश करना चीनी, कोरिया और पूर्वीय हितों की रक्षा के लिए अपरिहार्य है । शुरु में तो सोवियत संघ ने चीन को युद्ध में सहयोग करने में आनाकानी की थी लेकिन बाद में सहयोग किया था ।

उस युद्ध में बहुत अधिक चीनी नागरिकों की जान गयी थी लेकिन युद्ध का प्रयोग चीन ने देश के भीतर तेज गति में जन परिचालन के लिए किया था । युद्ध के लिए किए गये जन परिचालन के दौरान चीनी कम्युनिष्ट पार्टी ने समाज के कोने–कोने में अपनी पहुँच और पकड़ बनायी । दो खेमों में विभाजित विश्व में चीनी संलग्नता के बाद कोरिया उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया में विभाजित हो गया । वह विभाजन आज भी कायम है । चीन की नयी विदेश नीति का असर उसकी आन्तरिक राजनीति पर भी पड़ा ।
क्रांति के दौरान चीन में चीनी कम्युनिष्ट पार्टी और च्यांग काई शेक की क्युमिनटांग पार्टी के पक्षधरों के बीच भी युद्ध जारी था । च्यांग काई शेक अमेरिकन खेमे के थे और चीन सोवियत संघ खेमा में था । दोनो पक्ष अलग अलग साम्राज्यवादी जापान से युद्ध लड़ रहे थे ।
चीनी कम्युनिष्ट पार्टी को उस समय एक तरफ साम्राज्यवादी जापानी से तो दूसरी तरफ च्यांगकाई शेक और उनके पक्षधर के साथ लड़ना पड़ रहा था । सन् १९३६– ३७ में च्यांग काई शेक का अपहरण माओ की पार्टी ने किया और तब चीनी कम्युनिष्ट पार्टी और च्यांग काई शेक की क्यूमिनटांग पार्टी के बीच जापान के विरुद्ध एक जुट हो कर लड़ने के बारे में सहमति हुई । जापानियों को चीन ने युद्ध में हराया और उसके लिए अमेरिका से भी सहयोग लिया । लेकिन १९४६ से चीनी कम्युनिष्ट पार्टी च्यांग काई शेक पर भारी पड़ते जा रहे थे । माओ के नेतृत्व में चीनी क्रांति की सफलता के बाद च्यांग काई शेक को मेनलैंड चीन छोड़कर ताइवान की तरफ भागना पड़ा ।

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उस वक्त माओ ने अन्तराष्ट्रीय राजनीति में इंटरमीडिएट जोन के सिद्धान्त को लागू किया था । इन्टरमीडिएट जोन से माओ का तात्पर्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच की प्रत्यक्ष दूरी के बीच के जोन में अवस्थित देश और लोग थे । माओ का इंटरमीडिएट जोन सिद्धान्त के तहत यह मान्यता थी कि जब समाजवादी सोवियत संघ और साम्राज्यवादी अमेरिका के बीच विश्व राजनीति मे द्वन्द जारी है तब सोवियत संघ की रक्षा इंटरमीडिएट जोन ही कर सकता है । अमेरिका सोवियत संघ पर तब तक आक्रमण नहीं कर सकता है जब तक अमेरिका इंटरमीडिएट जोन पर नियन्त्रण नहीं कर ले । माओ की रणनीति में इन्टरमीडिएट जोन की रक्षा का बहुत ही महत्व रहा । माओ की परिकल्पना के इन्टरमीडिएट जोन में एक तरफ चीन, चीनी जनता और चीनी पक्षधर देश थे तो दूसरी तरफ अमेरिकी शासक वर्ग के लोग थे । इंटरमीडिएट जोन में होने वाला संघर्ष इन दोनों पक्ष के बीच का संघर्ष था । माओ देश के भीतर भी इस रणनीति पर कायम रहे । इसीलिए क्रांति की सफलता के बाद च्यांग काई शेक को चीन मेनलैंड छोड़कर भागना पडा । माओ ने उसके बाद देश के अन्दर समाजवाद का आधार बनाने के लिए भी उसी नीति का अनुसरण करते हुए देश के अन्दर असहमति रखने वालों के उन्मूलन का कार्यक्रम जारी रखा ।
आज नेपाल में जो हो रहा है, उसको समझने के लिए चीन के सन १९५० के पहले और बाद के समय को समझना होगा । इंटरमीडिएट जोन की परिकल्पना को आज चीन, नेपाल, भारत और अमेरिका के सन्दर्भ मे देखा जाए तो कुछ रोचक दृश्य उभर कर आते हैं । आज सोवियत संघ की जगह समाजवादी चीन ले चुका है और समाजवाद उन्मुख नेपाल की विदेश नीति चीन की ओर झुकती जा रही है । माओ के इन्टरमीडिएट जोन के सिद्धान्त के अनुसार अमेरिका, भारत और चीन तथा नेपाल के स्वार्थ की टकराहट के बीच नेपाल इन्टरमीडिएट जोन है । भौगोलिक रूप से अमेरिका दूर है लेकिन भारत साथ का पड़ोसी है । इसीलिए प्रधानमंत्री ओली की नजर में समाजवादी नेपाल और साम्राज्यवादी भारत के बीच इन्टरमीडिएट जोन में मधेश पडता है । मधेश जो १८१६ और १८६० की संधि के अनुसार नेपाल का हिस्सा बना लेकिन भौगोलिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, पारम्परिक और सामुदायिक तौर पर आज भी भारत के नजदीक है । नेपाल में समाजवाद के आधार का निर्माण करने के लिए वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धान्त के अनुसार प्रधानमंत्री ओली और उनकी पार्टी की आवश्यकता है कि वे मधेश और मधेशी पर कठोर नियंत्रण कायम करें

साम्राज्यवादी भारत को परास्त करने के लिए उनको मधेशीपन को समाप्त करना होगा । लेकिन यह काम वह स्वयं अकेले नहीं कर सकते हैं । इसके लिए उनको कांग्रेस के सहयोग की आवश्यकता है, ठीक उसी प्रकार से जैसे माओ को जापान को परास्त करने के लिए च्यांग काई शेक के सहयोग की आवश्यकता पड़ी थी । सरकार ने नेपाल के नक्शा के संशोधन का जो विधेयक संसद में दर्ज कराया है उसे पारित करा कर कालापानी क्षेत्र से भारत को पीछे धकेल चीन को आगे लाने की मंशा नेपाल सरकार का है । नहीं तो कालापानी क्षेत्र में नेपाल और भारत के प्रत्यक्ष स्वार्थ के बीच किसी प्रकार की टकराहट नहीं दिखती है । लेकिन चीन की इसमें अभी सहमति नहीं दिख रही है लेकिन भविष्य के बारे में अभी कुछ कहा नहीं जा सकता है । इस क्षेत्र मे द्वन्द का कारण क्षेत्रीय या वैश्विक ही होगा । लेकिन यदि फिलहाल नया नक्शा पास हुआ तब सामाजिक और राजनीतिक इंजिनियरिंग की शुरुआत मधेश पर होगी ।
ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने १९४७ में भारत को स्वतंत्र किया और १९४९ तक आते–आते चीन भी जापान को अपने देश से भगाने में सफल रहा । चीन में चीनी कम्युनिष्ट क्रांति भी सफल हुई लेकिन उसके बाद क्युमिनटांग पार्टी के नेता च्यांग काई शेक, जो कम्युनिष्ट नहीं थे, को मेनलैड चीन छोड़कर ताइवान भागना पड़ा । अमेरिका के सहयोग और संरक्षण में च्यांग काई शेक ने वहाँ अपनी सरकार बनाई । भारत को ब्रितानियों ने भी आनन–फानन में ही छोड़ा था । जब भारत का धर्म के नाम पर दो देशों में विभाजन होना निश्चित हो गया तब ब्रिटिश सरकार ने जल्दबाजी में एक ब्रिटिश नक्शा विज्ञ को बुला कर भारत और पाकिस्तान का नक्शा बनाने का कार्य सौंपा । उस विज्ञ को मात्र तीन महीने का समय दिया गया था । उपलब्ध कराए हुए दस्तावेजों के आधार पर भारत और पाकिस्तान की सीमा रेखा कागज पर खींची गयी । जब ब्रितानी सरकार ने उस नक्शे को स्वीकार किया और भारत और पाकिस्तान के लोग अलग होने लगे तब दोनों देशों में हत्या और हिंसा का दर्दनाक और दुर्दान्त दौर चला । उस दौर की घटनाओं की स्मृति आज भी दोनों देशों में जीवित है और उसके प्रभाव से भारत और पाकिस्तान की मानसिकता और राजनीति आज भी मुक्त नहीं हो पायी है ।
उस समय घटी हत्या, हिंसा और जन विस्थापन के कारण नक्शा बनाने वाले ब्रिटिश विज्ञ अपने आप को कभी भी दोष भाव से मुक्त नहीं कर पाए । उनको जीवन पर्यन्त लगता रहा कि जल्दबाजी में जो नक्शा उन्होंने बनाया , हत्या और हिंसा का एक कारण वह भी है । बाद में पाकिस्तान का भी विभाजन हुआ और तीसरा देश बांग्लादेश बना । हिंसा, युद्ध और विस्थापन की वृहद और दुर्दान्त घटनाएँ उस समय भी घटी । बांग्लादेश के निर्माण में भारत की सेना ने भी अहम भूमिका का निर्वाह किया । विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तब से आज तक चार बड़े युद्ध हो चुके हैं ।
चीन और नेपाल भी भारत की सीमा पर अवस्थित देश हैं और आज भी बहुतेरे जगहों पर देशों की सीमा अनिर्णित है । जिस ढंग से ये देश स्वतंत्र हुए हैं और जिस प्रकार की कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ सीमाओं पर विद्यमान हैं, जगह–जगह पर सीमाओं का अनिर्णित होना कोई अस्वाभाविक बात नहीं है । भारत और नेपाल का नक्शा भी शुरु में ब्रितानियों ने ही बनाया था । दक्षिण एशिया के इस भूभाग में देशों के बीच आज का सीमा विवाद ब्रिटिश साम्राज्यवादी शासन की ही देन है । पहले यह भूभाग युरोप के जैसा था । इस भूभाग में बड़े या छोटे राजा रजवाड़े और जमींदार थे । उनके बीच द्वन्द और युद्ध की समस्याएँ उस दौरान भी थी, लेकिन शायद आज जैसी जटिल और कठोर नही थी । देशों, रजवाड़ों और जमींदारियों की सीमा बदलती रहती थी । युद्ध या द्वन्द के मैदान में जिसका पलड़ा भारी रहता था उसके आधिपत्य को दूसरा पक्ष सहर्ष ही स्वीकार कर लेता था । लेकिन स्थायी सत्ता या सीमा जैसा उस वक्त कुछ भी नहीं था । स्वामित्व या सीमाएँ बदलती रहती थीं । देशों और राजा रजवाड़ों के बीच युद्ध अन्तराष्ट्रीय स्वार्थ का विषय भी नहीं होता था । लेकिन इस भूभाग पर साम्राज्यवादी शक्तियों के उदय ने परिस्थितियाँ बदल दी । साम्राज्यवाद के युग में एशिया में चीन को भी जापान और मंगोलिया के साथ बार–बार युद्ध लड़ना पड़ रहा था । भारत की जनता को भी ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्ति के लिए दो सौ वर्षो तक संघर्ष करना पड़ा था ।
सन् १९१७ में सोवियत क्रांति की सफलता के बाद चीन में जब चीनी कम्युनिष्ट पार्टी का जन्म हुआ तब माक्र्स और लेनिन के सिद्धान्त के अनुसार पहले वह पार्टी अन्तरराष्ट्रीयवाद को मानती थी और लेनिन की बोलशेविक पार्टी के नेतृत्व में ही चीनी कम्युनिष्ट पार्टी काम करती थी । कम्युनिष्ट अन्तरराष्ट्रीयवाद का तात्पर्य पूरे विश्व में एक ही पार्टी के नेतृत्व में समाजवाद की स्थापना का था । लेकिन जापान के साथ युद्ध लड़ने के लिए अन्तरराष्ट्रीयवाद पर आधारित कम्युनिष्ट सिद्धान्त चीन के काम नहीं लग रहा था । तब माओत्से तुंग ने चीनी कम्युनिष्ट पार्टी को कम्युनिष्ट अन्तरराष्ट्रीयवाद से अलग कर क्रान्तिकारी राष्ट्रवाद और समाजवाद को आधार मानकर अपने लेखन और संघर्ष को आगे बढ़ाया । नव जनवाद और क्रांतिकारी राष्ट्रवाद माओवादी विचार धारा के नये स्तम्भ थे । माओ त्से तुंग की विचारधारा को माओइज्म के नाम से जाना जाने लगा । माक्र्सिज्म , लेनिनिज्म और माओइज्म के प्रभाव में भारत और नेपाल में भी कम्युनिष्ट पार्टी का गठन हुआ । २००६ साल में स्थापित नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी ने माओ का अनुसरण करते हुए नौलो जनवाद तथा क्रान्तिकारी राष्ट्रवाद की अवधारणा को अंगीकार किया ।
चीन की अवधारणा को नेपाल के परिप्रेक्ष्य में व्याख्या करने और लागु करने की जिम्मेवारी अब नेपाल के कम्युनिष्ट नेताओं के लिए चुनौती थी । माओवादी सिद्धान्त को नेपाल में लागू करने के लिए नेताओं ने शत्रु साम्राज्यवादी शक्ति ंके रुप में भारत की पहचान की । यह विडम्बना ही है कि दो शताब्दियों तक ब्रिटिश साम्राज्यवादी शक्ति के विरुद्ध संघर्ष करने वाला भारत स्वतंत्र होने के साथ ही नेपाल के लिए शत्रु साम्राज्यवादी देश बन गया । लेकिन सिद्धान्त की आवश्यकता के लिए यह करना नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी की आवश्यकता थी । देश के अन्दर सामन्तवाद का प्रतीकं राजा, सामन्त और प्रजातांत्रिक समाजवादी कांग्रेस बन गये । और अब आवश्यकता थी क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की भावना को पार्टीवृत और राजनीतिक वृत में जगाने की और इस आवश्यकता को पूरा करने के नेपाल में कम्युनिष्ट नेताओं ने नेपाली राष्ट्रवाद को भारत विरोधी राष्ट्रवाद के रूप में प्रचारित किया । प्रारम्भ से लेकर अभी तक देश के पहाड़ी भूभाग में कम्युनिष्ट राजनीति को उर्जा देने के श्रोत के रूप में भारत विरोधी राष्ट्रवाद की भावना को ही जगाया जाता रहा है ।
कम्युनिष्ट पार्टी से पहले भी राणा शासन के पक्षधरों ने राणा शासन का अन्त भारत के हस्तक्षेप के कारण होने की बात को आधार बनाकर भारत विरोधी राष्ट्रीय भावना को प्रचारित किया था । उसके बाद जब २०१५ साल में जब नेपाली कांग्रेस की जन निर्वाचित सरकार बनी तब राजावादी तथा कम्युनिष्ट भारत और कांग्रेस के विरुद्ध में लग गये । २०१७ साल में जब राजा महेन्द्र ने जन निर्वाचित संसद को भंग कर शासन अपने हाथ में लिया तो सबसे पहले विभेदकारी नागरिकता कानून बनाकर तथा हिंदी भाषा को प्रतिबंधित कर और देश में एक भाषा तथा एक भेष का अभियान चलाकर मधेशी पहचान और अधिकार पर आक्रमण किया ।
राजा के प्रत्यक्ष शासन सहित की पंचायती व्यवस्था के ढलने के बाद जब प्रजातंत्र की पुनर्बहाली हुई तब मधेश आन्दोलन से जन्मी नेपाल सद्भावना पार्टी को भारत का पक्षधर बनाकर नेपाली शासक वर्ग ने नेपाली राष्ट्रवाद के शत्रु के रूप में मधेशी समुदाय को प्रचारित किया । २०४६ साल के बाद के इस अभियान में नेपाली कांग्रस और नेकपा एमाले दोनों साथ रहे । नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी तोे माओ और राजा महेन्द को अपना आदर्श मानकर काम करने लगी ।
लेकिन नेपाल में राजनीतिक इतिहास का विकास चीन के जैसा नहीं हुआ । चीन में क्रान्तिकारी राष्ट्रवाद का आधार चीनी जापान युद्ध था । लेकिन नेपाल को सन् १८१६ और १८६० की संधि के बाद भारत के साथ कोई युद्ध लड़ना नहीं पडा है । राष्ट्रवाद की भावना को अंतिम उत्कर्ष तक पहुँचा कर घृणा और हत्या की राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए राष्ट्रवाद के नाम पर शत्रु देश से युद्ध आवश्यक होता है । भारत और नेपाल के बीच युद्ध न होने के कारण नेपाल में भारत विरोधी राष्ट्रवाद अंध राष्ट्रवाद की सीमा तक नहीं पहुँचा है । वह अब तक सैद्धान्तिक अवधारणा और नारों तक ही सीमित है । लेकिन इस बार भारत से एक बार भी औपचारिक संवाद किये बिना नेपाल की कम्युनिष्ट सरकार ने जिस प्रकार से नये नक्शे को स्वीकार किया है, उसके पीछे भारत विरोधी राष्ट्रवाद के नाम पर व्यापक जन परिचालन का लक्ष्य और आवश्यकता पड़ने पर सरकार की भारत के साथ युद्ध में टकराने की आकांक्षा भी छिपी हुई है । यह वृति तो पहले भी उजागर हुई थी जब माओवादी जनयुद्ध के दौरान आखिर भारत के साथ सुरंग युद्ध की घोषणा माओवादी पार्टी ने किया ही था ।

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