हिमाचल में वैदिक कालीन परम्परा का निर्वहन कुशा ग्रहणी अमावस्या पर बनाए गए “द्रभ”
हिमाचल में वैदिक कालीन परम्परा का निर्वहन कुशा ग्रहणी अमावस्या पर साल भर की पूजा के लिए बनाए गए “द्रभ”:-
आज का युग बदलती हुई मान्यताओं का युग है।विज्ञान के माध्यम से देश-विदेश की सँस्कृति मे नये-नये बदलाव आने लगे हैँ।ऐसे मे भारतवासी भी अपनी सनातन सँस्कृति और परँपराओँ को तेजी से भूल रहे हैं।आधुनिकता के इस दौर में जीवन की दिशा भी मुड़ चली है और मानव सम्बन्धो की परिभाषा भी वो नही रही जिस पर हम कभी गर्व करते थे।लेकिन गाँव मे सँस्कृति और परँपराएँ मान सम्मान और पहचान अभी भी कुछ बाकी बची है।ऐसे मे वर्ष भर के त्योहार, धार्मिक कृत्य सभी विक्रमी सँवत, मास, प्रविष्टे, “पूण्या-अवाँस”, सौर-चन्द्र के विचार, आधार पर आज भी पूरी श्रद्धा और विश्वास से मनाये जाते है।लेकिन शहरों मे ऐसा नही।पड़ोसी साथ के फ्लैट मे रहने वाले पड़ोसी को नहीं पहचानता।जीवन की गति ही इतनी तीव्र है कि उत्सवो के स्थान पर ईर्ष्या, द्वेष और “मतलब” तक के लिए जान पहचान शेष बची है।परन्तु दुख की बात है कि ऐसी दशा मे हम अपने धर्म, आदर्श, मान-मर्यादा, पवित्र सँस्कारो, व्रत-त्योहारों को भूलकर भगवान और माँ-बाप को भी भूलते जा रहे हैँ।क्षमा करेँ विषय से भटकने के लिए।लेकिन जीवन के मार्गदर्शन की समृद्ध परँपराओँ मे कुशा ग्रहणी का पूण्य मुहूर्त मंगलवार पाँगणा मे शास्त्रोक्त विधि से सँपन्न हुआ।कुशा (द्रभ) का हिन्दू धर्म मे विशेष स्थान है।ऐसा विश्वास है कि कुशा के बगैर देवी-देवताओं, पितरो की पूजा निश्चय ही निष्फल होती है।आज स्नानादि कार्यों से निवृत्त होकर ब्राह्मण परिवारो द्वारा कुशा की झाड़ी के पास पूर्वाभिमुख होकर “हुँ फट” मन्त्रोचारण के साथ कुशा रूपी पवित्र घास को आदर सहित उचित मात्रा मे उखाड़ कर घर लाया गया।फिर कटी-फटी कुशा को छाँट कर स्वस्थ हरी-भरी नोकदार कुशा से कलापूर्ण ढँग से ‘बाटकर’ “द्रभ”बनाए गये।द्रभ बनकर तैयार होने के बाद इन्हें अपने यजमानो को वितरित किया गया।कुछ द्रभ पूजा स्थल पर सुरक्षित रखे गये ताकि भविष्य मे आवश्यकता पड़ने पड़ने पर इन्हें यजमानो को पूजा कार्य की सफलता हेतु प्रदान किया जा सके।कुशा ग्रहण कर “द्रभ”बनाने के लिए साल मे केवल यही “कुशा ग्रहणी अमावस्या का दिन और मुहूर्त ही शुभ माना जाता है।
राज शर्मा (संस्कृति संरक्षक)
आनी कुल्लू हिमाचल प्रदेश
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