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कहाँ से आती है सड़कों पर ये सड़कछाप जाति ? : निशा अग्रवाल

 

सड़कछाप

निशा अग्रवाल ।वो अधनंगे, वो बड़े – छोटे गंदे कपड़ों में लिपटे, गंदा बदन, भूरे मटमैले बेतरतीब बाल, दो अलग-अलग चप्पलें या नंगे पैर, कुछ बीनते सड़कों पर या किसी के साथ बदतमीजी करके हंसते, गंदी गालियाँ बकते, कभी किसी से कुछ छीन कर भागते, वो शक्ल और सूरत से इंसान की तरह दिखने वाले बच्चे ही सड़कछाप या ‘ खाते ‘(नेपाल में) कहलाते हैं। कहने को इंसान के बच्चे पर इंसानी नजरों में इनके लिए सिर्फ घृणा होती है। हाँ कुछ ऐसे लोग भी हैं जो सत्य को स्वीकार करना जानते हैं, उन्हें इनपर दया भी आती है।

सत्य???? कौन सा सत्य?? सत्य वो जो इंसानी स्वार्थ का आईना है। अच्छा एक बात बताइए। कहाँ से आती है सड़कों पर ये सड़कछाप जाति? सड़कें तो पैदा करती नही। इंसान से दिखते हैं तो यह तो निश्चित है कि ये किसी न किसी इंसान की पैदाइश हैं। वो इंसान जिनसे अपनी भावनाओं का ज्वार भाटा काबू में रखा न गया और उसकी परिणिति को संभाला ना गया। इंसान का अपनी क्षुद्र आकांक्षाओं की पूर्ति करना सहज है पर उसके परिणाम का बोझ उठाया नहीं जाता। तो यह मांस के जीते जागते लोथडे़ फेंक दिए जाते हैं, कचरे के डिब्बों में, नालों में, गलियों में। सौभाग्य से ज्यादातर तो लड़ ही नहीं पाते इन विषमताओं से और दम तोड़ देते हैं। पर दुर्भाग्य से कुछ जी भी लेते हैं। हांँ, कुछ हो सकते हैं जिनके मां बाप न हों या फिर कुछ शायद घर की मारपीट की डर से भागे हुए बच्चे जो अपने सौतेले मां बाप के द्वारा सताए हुए होते हैं, पर ज्यादातर बच्चे इंसान की कामुक स्वार्थता का नतीजा होतें हैं। और इन्हीं से बनती है यह सड़कछाप या खाते जाति।

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विडंबना देखिए,जिन्होंने इन्हें जन्म दिया वो आराम से इज्जत से अपनी जिंदगी जी रहे होते हैं और जिनका अपने जन्म पर कोई वश नहीं उन्हें समाज दया नहीं दुत्कार देता है।

हम अपने बच्चे को जन्म से या यूं कहें गर्भ में आते ही पूरी देखभाल देते हैं। उन्हें अच्छे बुरे का ज्ञान देते हैं। सही खानपान, सही शिक्षा, सही वातावरण में हम अपने बच्चों को पालते पोषते हैं। फिर भी कुछ उनमें से उद्दंड या बदतमीज या गलत आदतों के शिकार हो ही जाते हैं। जरा सोचिए जिन बच्चों को इनमें से कुछ ना मिला हो जिन्हें मां क्या होती है? पिता कैसा होता है? या परिवार घर किसे कहते हैं? यह तक पता ना हो। जिन्हें कभी प्यार के दो बोल ना मिले हो, ना कभी सही गलत की शिक्षा मिली हो। जिन्हें गालियों और घृणा के अलावा अगर कभी कुछ मिला है तो यह एहसास कि वो सामाजिक बहिष्कृत है। उनके अंदर कैसे भावना पनपती होगी? कैसा रूदन, कैसा हाहाकार मचता होगा उनके अंदर? कहीं उनकी बदमाशियां उनकी उद्दंडता उसी हाहाकार से बचने का साधन तो नहीं है? वो अपने बेशर्म अट्टहास में अपने रुदन को छुपा तो नही रहा। मां-बाप की उंगली थामे बाजार में अपनी मनपसंद चीजों के लिए मनपसंद खाने के लिए मचलते बच्चों को देखकर या उनका हृदय शोर मचाता ना होगा। स्कूल जाते बच्चों को देखकर उनका मन करता न होगा पढ़ने का। अच्छे साफ-सुथरे कपड़ों में घूमने का मन तो उनका भी करता होगा। उनकी नजरें भी प्यार भरी नजरों को तलाशती होंगी।

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आप कैसे अपेक्षा कर सकते हैं उनसे किसी भी सभ्य व्यवहार की?? कैसे सोच सकते हैं हम की वह चोरी ना करें, वह नशा ना करें? जिन्होंने कभी जाना ही नहीं कि क्या गलत है क्या सही। उसे तो इतना पता है कि उसका भूखा पेट भोजन मांग रहा है और उसके पास कोई नहीं जो उसे प्यार से या डांट से या दुत्कार के भी दो निवाले खिलाएगा। उसे पता है उसे खुद ही व्यवस्था करनी है अपनी क्षुधा की। तो आड़े तिरछे जिस रास्ते से हो वह उसकी पूर्ति में लग जाता है। ज्यादा पैसे पा लिए तो खाना खरीद कर खा लिया और पैसे थोड़े हैं तो नशा कर लिया। ‘नशा’जो भुला देता है उनके शरीर की मांग को। सुन्न कर देता है उस दिमाग को जो कहता है तुझे भूख लगी है। उफ ¡कितना भयावह, कितना दर्दनाक और साथ ही कितना तिरस्कृत जीवन।

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नहीं कर सकते तो मत करो इनसे प्यार। इंसानियत के लिए इन से घृणा मत करो। ये ऐसे हैं इसमें इनका कोई दोष नही अगर दोष है हमारे तथाकथित सभ्य समाज का। जहां लोग दो चेहरे लिए जीते हैं।

गर्मियों में जलते बदन, बरसात में भीगते भागते और सर्दियों की सर्द रातों में ठंड से बेचैन हो नशे का सेवन करके बोरियों में घुसकर एक हाथ बाहर निकाल उस बोरी के मुंह अपने हाथों से भींच ठंड से बचने का भरसक प्रयास करता, वह निरपराध सड़कछाप केवल और केवल दया का पात्र है, घृणा का कदापि नहीं कदापि नही।।। ।

निशा अग्रवाल
धरान

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