भारत नेपाल की सांझी विरासतः वृहत्तर एकता के संदर्भ में- डॉ. कामिनी वर्मा

हिमालिनी अंक अक्टूबर 2020 |‘माता भूमिः पुत्रोअहं पृथिव्याः’ अर्थात पृथ्वी हमारी मां है और हम सब जीव इसकी संतान हैं । तथा ‘अज्येष्ठासोअकनिष्ठासः सम् भ्रातरो वावृधु सौर्भगाय’ हम सब प्रभु की संतान एक दूसरे के भाई हैं । हम में ना कोई छोटा है और ना कोई बड़ा है । भारतीय संस्कृति ऐसी उत्कृष्ट उद्दात्त और सर्वातमवाद की जगत व्यापी भावना अनादिकाल से अपने अंतस में सँजोये अद्यतन विद्यमान है । वसुधैव कुटुंबकम हमारा आदर्श ना होकर यथार्थ है ।
संपूर्ण बसुधा को एक कुटुंब मानकर सब के साथ परिवारी जनों जैसा व्यवहार करने के पीछे हमारी पौराणिक मान्यता है, कि मनु हमारे आदि पुरुष हैं और उनके वंशजों ने ही आर्य अनार्य में विखंडित होकर समूहों में संपूर्ण भूभाग पर विस्तारित होकर विभिन्न प्रकार के धर्म और संस्कृति को विकसित किया । ब्रह्मा से उत्पन्न होने के कारण इन्हें स्वयंभू की संज्ञा से भी अभिहित किया जाता है । विष्णु पुराण में विवेचित है मनु के दो पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपाद में प्रियव्रत के दस पुत्र थे । दस पुत्रों में अग्निबाहु, मेधा और पुत्र नामक तीन पुत्र योग पारायण और पूर्व जन्म के वृत्तांत जानने के ज्ञाता थे । बाकी सात पुत्रों में पृथ्वी के साथ दीप बांटे गए थेः १ आग्नीध्रः जम्बूद्वीप, २ मेधातिथि प्लक्षद्वीप, ३ वपुष्मान शाल्मलद्वीप, ४ कुशद्वीप, ५ द्वितिमान क्रौंचद्वीप, ६ भव्य शकयद्वीप, ७ सवन पुष्कर द्वीप । अतः विभिन्न भूखण्डों में विभाजित भूमि पर मनुवंशज ही विस्तारित होकर समाज व सभ्यता को संचालित कर रहे हैं ।
विज्ञान भी यही कहता है कि सभी द्वीप पहले एक पास थे अमेरिका, अफ्रीका और चीन, रूस से जुड़ा था । अफ्रीका भारत से जुड़ा था कालक्रम में भूगर्भीय परिवर्तन और पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण यह भूभाग कई द्वीपों में विभाजित हो गए । मनु के काल में घटित जल प्रलय की घटना का उल्लेख लगभग सभी देशों के साहित्य में मिलता है । ब्रिटेन और अमेरिका से प्रकाशित इनसाइक्लोपीडिया, द कैम्ब्रिज हिस्ट्री आफ इंडिया, केवल मोटवानी द्वारा रचित मनु धर्मशास्त्र ए सोशियोलाजिकल एंड हिस्टोरिकल स्टडी तथा सत्यकेतु विद्यालंकार द्वारा रचित दक्षिण पूर्वी और दक्षिण एशिया नामक ग्रंथों में मनुस्मृति के विश्व व्यापी प्रभाव का विशद वर्णन प्राप्त होता है । एशिया यूरोप अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के अधिकांश देशों में मनु के नाम व प्रभाव का साक्ष्य मिलता है । बाइबिल और कुरान में भी मनु का नाम मिलता है परन्तु इनका नाम विकृत होकर नूह तथा ब्रह्मा का आदिम अथवा आदम हो गया ।
भारतीय ऋषि परंपरा में मनु को मानव जाति के पिता का स्थान प्राप्त है । ऋग्वेद में २० बार मनु का उल्लेख है तथा ७ बार पिता कहा गया है । तैत्तिरीय संहिता में मानव्यः प्रजा कहकर सभी मनुष्यों को मनु की प्रजा माना गया है । ऋग्वेद में वर्णित है इन्हीं मनु के लिये इंद्र ने धरती जल की रचना की ः
‘अजनयन मनवे क्षामपश्च सत्रा शन्स यजमानस्य तूतोत’
मनु व्यक्तिवाचक में अण प्रत्यय से मानव, यत प्रत्यय और षुक आगम होकर मनुष्य, अत्र प्रत्यय और षुक आगम होकर मानुष, जन धातु के योग में उ, प्रत्यय से मनुज शब्द की रचना हुई है । और यह सभी सन्तान, वंशज अथवा प्रजा के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । निरुक्त में मनोरपत्यं मानवः कहकर मनुष्यों को मनु की संतान माना गया है । इन उद्धरणों से इस विषय की पुष्टि होती है आदिकालीन सामाजिक व्यवस्था को वैश्विक स्तर पर मनु अथवा उनकी सन्तानों ने ही नेतृत्व प्रदान किया था । इस प्रकार पृथ्वी का प्रथम विभाजन मनु के वंशजों में हुआ ।
कालांतर में भारतीय संस्कृति का स्पष्ट प्रभाव विभिन्न देशों की संस्कृतियों में दृष्टिगोचर होता है । भारतीय देवी–देवताओं के मंदिर, स्तूप, ग्रंथ व चिकित्सा पद्धति विदेशों में भी मिलती है । कंबोडिया में अंकोरवाट का विष्णु मंदिर, बर्मा में आनंद मंदिर, जावा का बोरोबुदुर बौद्ध स्तूप तथा जावा की रचना तत्व निंग व्यवहार में ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के समान ब्रह्मा के मस्तक से ब्राह्मण, बाहु से क्षत्रिय, जंघा से वैश्य तथा पैरों से शूद्रों की उत्पत्ति बताई गई है । ब्रिटिश संग्रहालय में ईसा मसीह के सिर पर मोर पंख भारत के बालकृष्ण का प्रतीक है । अरब देश मुस्लिम धर्म का केंद्र माने जाते हैं । अरब वासी इस्लाम धर्म के उदय से पूर्व ही भारतीय धर्म व संस्कृति से परिचित हैं, जिसका प्रमाण हजरत मुहम्मद के ५०० वर्ष पूर्व जरहमबिन ताई की एक रचना में श्रीमद्भागवदगीता के श्लोक परित्राणाय साधूनाम विनाशाय च दुष्कृताम् में वर्णित कृष्ण चरित्र के चित्र में मिलता है । इसी रचना में शिव महिमा का भी वर्णन है । जेरूसलम स्थित हमीदिया पुस्तकालय में सम्राट हारून रशीद के मंत्री फजल बिन याहिया के मुहर अंकित का ताम्रपत्र में भारतीय ज्ञान विज्ञान तथा देवताओं की प्रशंसा मिलती है । मक्का स्थित काबा परिसर में ३६० भारतीय देवी–देवताओं की मूर्तियां थीं, जिन्हें मुहम्मद साहब ने हटवा दिया था । (संगेअसवद) नाम का शिव प्रतीक के रूप में काला पत्थर आज भी विद्यमान है । जिसे हज करने वाला मुस्लिम बहुत सम्मान से चुम्बन करता है । बल्ख में नौ विहार मंदिर में एक मूर्ति की नियमित पूजा होती है ।
संस्कृत भाषा विश्व की प्राचीनतम भाषा है । भाषा वैज्ञानिकों का मत है यह सभी भाषाओं की जननी है । वैश्विक स्तर पर बोली जाने वाली सभी भाषाओं का उद्गम संस्कृत है । भारतीय शिक्षा व चिकित्सा पद्धति का प्रभाव प्राचीन काल से ही विदेशी सभ्यता व संस्कृति में शामिल रहा है ।
भारत–नेपाल संबंधों पर दृष्टिपात करने पर हम पाते हैं, दोनों देशों में भौगोलिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, आध्यात्मिक विषयों में हमारा अटूट संबंध सदियों से रहा है । ऐतिहासिक रूप से दोनों देशों के आपसी संबंध छठी शताब्दी ईसा पूर्व में महात्मा बुद्ध के जन्म से, स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होते हैं । महात्मा बुद्ध का जन्म ५६३ ईसा पूर्व में वर्तमान में नेपाल की तराई की सीमा में स्थित लुंबिनी नामक स्थान में हुआ था । जिसकी पुष्टि रूममिनदेई अभिलेख से हो जाती है । अशोक के अभिलेख से ज्ञात होता है कि देवनाम् प्रिय प्रियदर्शी राजा अपने अभिषेक के बीसवें वर्ष यहां आए थे और शाक्यमुनि बुद्ध का जन्म स्थान होने के कारण इस स्थान की पूजा की थी और एक विशाल दीवार बनाई थी । तथा एक पाषाण स्तंभ खड़ा करवाया था । क्योंकि यहां भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था, इसलिए लुंबिनी गांव को धार्मिक करों से मुक्त कर दिया था । और साथ ही भूमि कर के रूप में उपज का आठवां भाग लेना सुनिश्चित किया था ।
यह अभिलेख नेपाल की तराई में रूममिनदेई नामक स्थान से प्राप्त हुआ है । ऐसा प्रतीत होता है बुद्ध के जन्म स्थान की स्मृति दीर्घकाल तक बनाए रखने के उद्देश्य से इस जगह को पत्थर की दीवार बनवा कर सुरक्षित किया गया, तथा पहचान और यादगार के रूप में एक पाषाण स्तंभ गड़वाया गया । उल्लेखनीय है प्राचीन काल में धार्मिक यात्रा करने वाले लोगों को सीमा में प्रवेश करने पर धार्मिक कर देना पड़ता था । कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इसका उल्लेख बलि नाम से मिलता है । चूंकि अशोक बौद्ध धर्म का अनुयाई था, अतः भगवान बुद्ध की जन्म भूमि के दर्शन करने पर दर्शनार्थियों से यह कर लिया जाना उसे अरुचिकर लगा । अतः उसने यहां से धार्मिक कर समाप्त कर दिया । साथ ही यहां का भूमि कर जो फसल उत्पादन का एक चौथाई या एक तिहाई भाग राजकोष में जमा करना पड़ता था उसे भी कम करके आठवां भाग निश्चित कर दिया ।
नेपाल की तराई में ही निग्लीवा नामक स्थान में एक अन्य पाषाण स्तंभ लेख मिला है जिससे ज्ञात होता है, अशोक अपने राज्याभिषेक के चौदहवें वर्ष इस स्थान पर बुद्ध कोनागमन के द्वितीय स्तूप का विस्तार करवाया तथा बीसवें वर्ष स्वयं इस स्थान पर आकर इसे तीर्थ स्थल का स्वरूप प्रदान कर पूजा अर्चना की थी । अशोक की लुम्बिनी यात्रा का प्रमाण दिव्यावदान नामक ग्रंथ से भी मिलता है । जो उपर्युक्त तथ्यों की पुष्टि करता है ।
नेपाल के काठमांडू में पशुपति नाथ का शिव मंदिर भारत नेपाल दोनों देशों के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास का स्थान है । तृतीय शताब्दी ई.पू. में सोमदेव राजवंश के पशुप्रेक्ष नामक राजा द्वारा निर्मित शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक तथा केदारनाथ मंदिर का आधा भाग है । स्कंदपुराण में पंचकेदार की कथा में वर्णित है, पांडवों के स्वर्गारोहण के समय शिव ने उन्हें भैंसे के रूप में दर्शन देकर पृथ्वी में समाहित हो गए, लेकिन पूरा शरीर धरती के अंदर जाने से पूर्व भीम ने उनकी पूंछ पकड़ ली । जिस स्थान पर उनका मुँह पृथ्वी से बाहर आया उसी स्थान को संज्ञा से अभिहित किया गया । मंदिर पर हिन्दू और बौद्ध वास्तुकला शैली का सुंदर संयोजन है । हिंदुस्तान में भी वाराणसी में विश्वनाथ मंदिर के समीप नेपाली मंदिर स्थित है । जनकपुरी में सीता अवतरण होने से राम और तत्कालीन संस्कृति से दोनों देशों का गहरा नाता है । हमारी सांझी संस्कृति दोनों देशों के नागरिकों को एकता की मजबूत डोर में बांधे हुए है ।
नेपाल भारत का महत्वपूर्ण पड़ोसी देश है । दोनों देशों की सीमाएं बिना किसी प्रतिबंध के एक दूसरे के लिए खुली हैं । आवागमन के लिए किसी पासपोर्ट या वीजा की आवश्यकता नहीं है । नेपाल भारत के ५ राज्य उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, सिक्किम एवं बिहार की सीमा से जुड़े होने से सांस्कृतिक के साथ आर्थिक विनिमय का महत्वपूर्ण केंद्र है । बड़ी संख्या में भारतीय नेपाल में रहते हैं तथा भारतीय सेना में नेपाली सैनिक शामिल हैं । सामाजिक रूप से दोनों देश पारिवारिक रिश्तों में भी आबद्ध हैं । जिसे रोटी बेटी के रिश्ते के नाम से भी जाना जाता है ।
इस प्रकार स्वतन्त्र राजनैतिक इकाई बनने से पूर्व नेपाल भारतीय उपमहाद्वीप के पर्वतीय प्रदेशों का ही एक भाग था औपनिवेशिक काल में १७५७÷७९ में तत्युगीन महाराजा पृथ्वी नारायण शाह ने रियासतों को विजित कर सशक्त नेपाल राज्य की स्थापना की थी । यह राजशाही व्यवस्था अप्रैल २००६ तक चलती रही । २००६ में लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत हुए चुनाव में नेपाली माओवाद की सत्ता स्थापित हुई ।
भौगोलिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, भाषागत और धार्मिक एकता के मजबूत बंधन में बंधे भारत और नेपाल के राजनीतिक रिश्तों में कभी एकरूपता नहीं रही । सत्ता परिवर्तन के साथ दोनों देशों में हुये युद्ध में नेपाल की पराजय के बाद २८ नवम्बर, १८१६ में हुई सिंगौली की संधि में दोनों देशों की सीमाओं को निश्चित काट दिया गया था । जिसके तहत ब्रिटिश सरकार को गढ़वाल और कुमायूं के जिले तथा तराई का अधिकतर भाग प्राप्त हो गया था । नेपाल ने सिक्किम के सारे अधिकार खत्म कर लिये । इस संधि ने उत्तरी सीमा के विवाद को समाप्त करने के साथ साथ नेपाल को हमेशा के लिए अंग्रेजों का मित्र बना दिया था । नेपाल प्रसन्नता के साथ अपने बहादुर और लड़ाकू सैनिक सैनिक अंग्रेजों की सेवा में भेजता रहा । १८२७ में एक अन्य सन्धि करके इसे अपने अधीन मित्र राज्य बना लिया । १८५७की क्रांति में नेपाल के गोरखा सैनिकों ने ब्रिटिश सेना में सहयोग दिया तथा भारतीय नेतृत्वकर्ताओं को भी अपने देश में शरण दी । कानपुर में आंदोलन के नायक नाना साहब और अवध की नायिका बेगम हजरत महल ब्रिटिश सेना से पराजित होकर यहीं आये थे और अपने जीवन का अंतिम समय यहीं व्यतीत किया था ।
वर्तमान में भारत नेपाल में विवाद का कारण भारत द्वारा तिब्बत में मानसरोवर जाने वाले तीर्थ यात्रियों की सुविधा के लिए सीमा सड़क संगठन की निगरानी में लिपुलेख तक एक सड़क का निर्माण करवाया जाना है । पहले इन तीर्थयात्रियों को सिक्किम के नाथुला दर्रे से होकर जाना पड़ता था । इस मार्ग से जाने पर दूरी बढ़ जाने पर यात्रा में छः दिन का समय अधिक लगता था । इस मार्ग को भारत ने अपनी सीमा में बनवाया है । परन्तु नेपाल का मानना है यह राजमार्ग उसके क्षेत्र से होकर जाता है । लिपुलेख से भारत, नेपाल तथा चीन तीनों देशों की सीमायें जुड़ी हैं । २०१५ में भारत के प्रधानमंत्री मोदी जी की चीन यात्रा के दौरान धारचुला से लिपुलेख (चीनी सीमा तक) सड़क बनाने का समझौता किया गया था । नेपाल ने उस समय विरोध किया था । उसका कहना है यह क्षेत्र उसका है, इस तरह से बिना उसकी सहमति से भारत चीन से समझौता करके सड़क का निर्माण नहीं कर सकता ।
दोनों देशों के संबंधों में कड़वाहट का आरंभ सितंबर २०१५ में नेपाली संविधान निर्माण के समय ही आरंभ हो गया था । संविधान का निर्माण भारत की इच्छानुरूप न होने से भारत ने इसका खुले दिल से स्वागत नहीं किया । १९५० में हुई सन्धि के अनुसार भारत द्वारा नेपाल को सार्वभौमिक स्वतंत्र देश स्वीकार करने व एक दूसरे के आंतरिक विषयों में हस्तक्षेप न करने के आश्वासन के बाद नवम्बर २०१५ में जिनेवा में भारतीय प्रतिनिधि द्वारा नेपाल ने राजनीतिक परिवर्तन को लेकर मानवाधिकार परिषद के मंच पर कठोर रुख अपनाया । तथा २०१५ में ही मद्धेशियों द्वारा चलाए गए नागरिकता आंदोलन में मद्धेशियों के समर्थन में भारत द्वारा नेपाल की आर्थिक घेराबंदी से नेपाली राजनीति में असंतोष आया ।
इधर भारत नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभाव से असंतुष्ट है । २०१७ में चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना में भारत की अनिच्छा के बाद भी नेपाल का इसमें शामिल हो जाने से नेपाल भारत द्वारा हस्तक्षेप करने व नेपाल द्वारा भारत की इच्छा को सम्मान न मिलने से दरार बढ़ी । नवंबर २०१९में भारत द्वारा प्रकाशित किए गए मानचित्र में केंद्र शासित प्रदेश के रूप में जम्मू कश्मीर, लद्दाख के साथ कालापानी को शामिल किए जाने से विवाद और बढ़ गया । प्रतिक्रिया स्वरुप नेपाल सरकार ने १३जून २०२० को संविधान में संशोधन कर भारतीय क्षेत्र लिंपियाधुरा, लिपुलेख और काला पानी को अपने मानचित्र में शामिल कर लिया । नेपाल इन क्षेत्रों को अपना मानता है । नेपाल द्वारा जारी इस संशोधित मानचित्र को भारत ऐतिहासिक साक्ष्यों से इतर मानता है ।
भारत नेपाल की सीमा रेखा के निर्धारण का आधार १८१६ में ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में सिंगौली की संधि है । सिंगौली संधि से काली और राप्ती नदी के बीच का संपूर्ण मैदानी भाग ब्रिटिश भारत को देना पड़ा था । नेपाल में भारत के राजदूत रह चुके जयंत प्रसाद ने २३मई को द हिन्दू में लिखा था, इस संधि के अंतर्गत नेपाल दोबारा इन क्षेत्रों पर अधिकार का दावा नहीं कर सकता था । लिपुलेख दर्रे का प्रयोग भारत तिब्बत और चीन के साथ व्यापार में करता था । १८७० के दशक में सर्वे आफ इंडिया के नक्शे में लिपुलेख से कालापानी तक का भूभाग ब्रिटिश भारत का है । भारत के स्वतंत्र होने के बाद भी नेपाली शासकों ने इन पर अपना अधिकार प्रकट नहीं किया था ।
जबकि नेपाल का मानना है कि यह इलाका उसका है क्योंकि इस सीमा में पड़ने वाली नदियों के प्रवाह में काफी परिवर्तन आ चुका है अतः दोनों देशों की सीमा में भी बदलाव हुआ है । अतः नेपाल कुटी नदी को सीमा मानता है । नदी के दूसरी ओर गुंजी, नाबी और कुटी गांव है । कुटी की ओर ही चीनी सीमा से लगा हुआ लिम्पियाधुरा भी है । कुटी नदी गुंजी में काली नदी से मिलती है । यहां से नौ किलोमीटर दूर कालापानी तथा दस किलोमीटर लिपुलेख है । नेपाल के नक्शे में कालापानी से लेकर नाविढांग और लिपुलेख से लेकर लिम्पियाधुरा तक का क्षेत्र अपनी सीमा में दिखाया गया है ।
नेपाल भारत का सदियों पुराना मित्र राष्ट्र है । सामाजिक, सांस्कृतिक पक्ष से दोनों देशों का मजबूत भावनात्मक संबंध होने के साथ साथ यह भारत के लिए सामरिक और राजनैतिक दोनों दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है । जिस तरह से चीन अपनी विस्तार वादी नीति से संपूर्ण विश्व को प्रभावित कर रहा है, नेपाल भी इससे अछूता नहीं है । चीन के लिए भी यह देश सामरिक और व्यापारिक रूप से उपयोगी तथा किसी भी विषम परिस्थिति में चीन से भारत की मार्ग दूरी को कम करने वाला भी है । अतः चीन इसे हर तरह से लुभाने में लगा हुआ है । बड़े बजट वाली कई परियोजनायें नेपाल में आरम्भ करने के साथ नेपाली स्कूलों में चीनी भाषा मंदारिन को पढ़ना अनिवार्य करने तथा इस भाषा को पढ़ाने वाले शिक्षकों का वेतन भी चीनी सरकार की ओर से दिए जाने की व्यवस्था की जा रही है । आज के परिवेश में नेपाल, चीन और भारत के साथ एक व्यवसायी का किरदार निभा रहा है । और नेपाल चीन की ओर आकर्षित हो रहा है ।
अतः ऐसे में भारत को कूटनीतिक को ध्यान में रखते हुए समझदारी व सूझबूझ से दोनों देशों के बिगड़े रिश्तों में सामंजस्य बैठाने की आवश्यकता है । बड़े भाई की सोच से बाहर निकल कर उसके साथ आर्थिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों के विकास पर ध्यान देना चाहिए । भारत और नेपाल चिरकाल से सांझी विरासत का हिस्सा रहे हैं इस भावनात्मक संबंध को राजनीति से ऊपर रखना होगा क्योंकि भारत और नेपाल की सांझी सांस्कृतिक धरोहर के ध्वजवाहक शिव, राम, सीता और बुद्ध सार्वभौमिक एकता अखंडता का मार्ग विश्व को दिखाते हैं । समुद्र मंथन के पश्चात सागर से निकले विष का पान करके देवताओं और असुरों में संघर्ष को खत्म करने वाले शिव तथा मर्यादा की रक्षा तथा लोक कल्याण के लिए राज महल का त्याग करने वाले राम व सीता दोनों देशों में सदैव से पूज्य हैं । उनके कृत्य सभी के लिए अनुकरणीय हैं । आज जरूरत है प्राचीन विरासत को स्मरण करने की और विवादों का समाधान हृदय पक्ष से करने की ।

