जरा इनकी भी सुनें…

उस समय भारतीय सरकार की घोषित नीति ही थी- राजा और संसदवादी दोनों शक्ति को साथ में लेकर माओवादी को निषेध करना चाहिए। लेकिन वैसा नहीं हो सका। इसीलिए भारत की चाहना से नेपाल में गणतन्त्र आया नहीं है। बाध्य होकर भारत ने नेपाल के गणतन्त्र को स्वीकार किया है।
– डा. बाबुराम भट्टर्राई -अनलाइन खबरडटकम से)

लडकपन में मैं खूब बदमास था। अनेक खुराफत दिमाग में उमडÞते रहते थे। सैर-सपाटे के लिए पैसों की जरुरत होती थी। घर में मांगने पर कभी मिलता कभी न मिलता। बहाना होता स्कूल में शुल्क देने का और किताब-काँपी खरीदने का। लेकिन मिला हुआ पैसा मटरगस्ती में उडÞा देते थे। कभी-कभार पिता जी की जेब भी मैं साफ करदेता था।
– उपेन्द्र यादव, -सौर्य दैनिक से)
‘एक मधेश एक प्रदेश’ के नाम में देश में उच्च जातियों द्वारा जो आन्दोलन छेडÞा गया, उस में आदिवासी, मैथिल, थारु, राजवंशी, अवधी और भोजपुरी भाषा तथा संस्कृति के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया गया। मधेश शक्ति के सुदृढीकरण और राजनीतिक समीकरण के नाम में खास कर ब्राहृमण, भूमिहार, कायस्थ और राजपूतों ने नेतृत्वदायी भूमिका निर्वाह की, जिससे मधेश समस्या को सम्बोधन नहीं किया जा सकता था।
– युवराज घिमिरे, -सेतोपाटी डटकम से)
गरीब देश के धनी व्यक्ति के रुप में मैं परिचित होना नहीं चाहता, ऐसा करना मेरे लिए लज्जास्पद बात होगी। मैं चाहता हूँ- वैसा दिन आवे, जिस रोज कहा जा सके, नेपाल विकास के पथ पर आगे बढÞ रहा है। उस समय अपने को अमीर कह सकता हूँ। इसलिए जब तक देश गरीब है, तब तक मैं अपने आप को धनी कह कर कैसे पेश कर सकता हूँ –
– उपेन्द्र महतो, -२३ मई, अनलाइन खबर से)
हरामीपनकी भी हद होती है। रात में नेता सम्झौते में दस्तखत करते हैं। और उसी पार्टर्ीीे कार्यकर्ता दिन में बन्द करते हुए सामान्यजन को तकलीफ देते हैं। अरे ओ छात्र नेता ! यदि तुम्हारे पास असली साहस हो तो अपने नेता को उसीके घर में बन्द करके दिखाओ। – विजयकुमार पाण्डे र्-मई ११, कान्तिपुर से)
आजकल पत्रकार ऐसे प्रश्न पूछकर मुझे परेशान करते हैं, जिस के कारण मैं डा. बाबुराम भट्टर्राई की श्रीमती हूँ या एमाओवादी पार्टर्ीीी नेतृ, मंै खुद कन्फ्युज्ड हूँ।
– हिसिला यमी, नेतृ, एमाओवादी। -१९, मई, डडेलधुरा में)
मुझे कोई भारतीय दूत कहता है। मगर वैसा आरोप लगानेवाले पागल हैं, वे लोग मानसिक रुप में कमजोर हैं। विदेशी शक्ति राष्ट्र मुझ को अन्य नेताओं की तुलना में ज्यादा विश्वास करते हैं। और उस शक्ति को मैं नेपाल के हित में ही प्रयोग करता हूँ।
– अमरेशकुमार सिंह, -१९ मई, अनलाइन खबर से)
राजनीति को मार्गदर्शन करते हुए समय में हीं साहसिक विचार पेश न करना वौद्धिक क्षेत्र की कमजोरी है। जिस के कारण अभी देश में अस्थिरता और अनिश्चिता है। – चन्द्रकिशोर झा, -फेशबुक में)
इस सरकार की जिम्मेवारी स्वतन्त्र और धाँधली रहित निर्वाचन कराने की है। लेकिन खिलराज रेग्मी सत्ता में चिपके रहने के लिए चुनाव कराने के बजाय राजनीति करने में ज्यादा अभिरुचि दिखा रहे हैं। राजनीति ही करनी हो तो वे पार्टर्ीीोल कर बैठ जाएँ।
– देवेन्द्र पौडेल, -वन्सन्यूज डटकम से)
२०१५ साल के निर्वाचन में वीपी कोइराला ने ‘दूसरे चुनाव में एक मधेशी को पहाडÞ में ले जाकर चुनाव जिताना है’ ऐसा कहा था। आज ५४ वर्षहो गए, किसी मधेशी को पहाडÞ से चुनाव जितने वाला दिन अभी नहीं आया है। वह बात आज तक पूरी न होने में राजनीति का मधेश के प्रति उत्तरदायी न होना ही है। – राजेश अहिराज -फेशबुक में)

