नेपाल में चीनी अभिरुचि
डा. सतीश उपाध्याय:काठमांडू, पोखरा के भीड भरे बाजारों में तमाम दुकानों के ऊपर छोटे-छोटे फ्लैट लेकर इन्स्िटच्यूट चलाते हुए चिनियाँ लोग २०-२५ लडकियों को इकठ्ठा करते हैं। ये लडके-लडकिया चीनियाँ भाषा सीख रहे है, इस में कतिपय पत्रकार भी बताए गए। अध्यापक के आते ही सिर हल्का झुकाकर ‘नही हाव’ एक साथ कहते है। जिसका अर्थ होता है, ‘क्या हाल है -‘ साथ ही स्वागत का भाव ! ऐसे कई इन्स्िटच्युट देश के तमाम हिस्सो में चल रहे हंै। चीन सरकार नेपाल के लोगों को मुफ्त में चीनी भाषा सिखाने के लिए बाकायदा अध्यापकों को चीन से काठमांडू भेजा है। काठमांडौं विश्वविद्यालय के कन्फ्युसियस इन्स्टीच्यूट और अन्तर्रर्ाा्रीय भाषा संस्थान में चीनी भाषा और संस्कृति के बारे में सीखने की व्यवस्था की गई है। 
चीन ने नेपाल के साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान करना शुरु किया है। और चीन में छात्रवृत्ति पानेवाले छात्रों की संख्या भी बढÞरही है। इतना ही नहीं, चीन खुद को दुनियाँ के बडेÞ शिक्षा केन्द्रों के साथ प्रतिस्पर्धा करके उन्ही केन्द्रो में से एक अब्बल केन्द्र बनाने की होडÞ में है। कदाचित् वह दिन दूर नहीं, जब नेपाल के भावी नेता इलाहावाद, काशी वाराणसी, उत्तराखण्ड, पटना में न पढÞकर वीजिंग और संर्घाई से पढकर आवेंगे। अब यहाँ तक तो लोगों की बातचीत में स्पष्ट झलकता है कि चीन और भारत की तुलना करने पर भारतीय मंसूवों पर शक करते है, साथ ही चीन को भी लोग अपना मित्र राष्ट्र मानने लगे हैं। यही कारण है कि आम जनमानस अब दिल्ली और वीजिंग के साथ बराबरी का सम्बन्ध बनाकर चलना चाहता है। इतना ही नहीं, नेपाल की राजधानी काठमांडू में चीनी भाषा सीख रहा एक नौजवान राजू श्रेष्ठ अपनी दिलचस्पी कुछ इस तरह बयान करते हैं- देखिए, चीन की आवादी डेढÞ, पौने दो अरब है, अगर एक प्रतिशत भी टुरिष्ट नेपाल लाने में हम सफल होते हैं तो हमें रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध होंगे। इससे स्पष्ट होता है कि नेपाल का नौजवान अपने देश में चीन की बढÞते प्रभाव को एक अवसर के रुप में देख रहा है।
दशकों-दशकों से भारत के आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक महिमा से बँधे नेपाल अब वाहें फैलाकर हिमालय के पार चीन से गले मिलने को तत्पर है। इधर चीन ने नेपाल में अपनी भूमिका प्रभावकारी रुप से बढÞाने की मुहिम तेज कर रखी है। फलतः वह बडÞी-बडÞी परियोजनाओं में अपनी सक्रियता बढÞा रहा है। साथ ही बडी-बडÞी परियोजनाओं मे निवेश भी कर रहा है। बकौल बी.बी.सी. नेपाल के उद्योग विभाग के महानिर्देशक ध्रुव राजवंशी ने स्वीकार किया है कि अब तक भारत से नेपाल में निवेश होता रहा है, पर परियोजनाओं की संख्या के दृष्टिगत चीन दूसरे नम्बर पर आ चुका है। भविष्य में चीन की हाइड्रो पावर में निवेश बढाने की तत्परता एवं तैयारी यह प्रदर्शित करता है कि वह नेपाल में काफी निवेश करने को तैयार ही नहीं अपितु भारत के निवेश के समतुल्य दर्जा लेने के लिए तैयार है। आम तौर पर चीन का निवेश अब तक रेस्टोंरंेट के क्षेत्र में ही रहा है, पहली बार वह हाइड्रोपावर क्षेत्र में आने की कोशिश में है। पश्चिम सेती में १.६ अरब डालर यानी ९६ अबर ४० लाख रुपये की लागत से ७५० मेगावाट विद्युत परियोजना में निवेश को तैयार है। इसके अतिरिक्त अपर तामाकोशी में ६५० मेगावाट की हाइड्रो पावर परियोजना के निर्माण का ठेक्का चीन की ही एक कम्पनी को मिल चुका है। यद्यपि इस में पैसा नेपाल सरकार एवं नेपाली उद्योगपतियों का लगा है। नेपाल में सीधे निवेश में ४६ प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ कूल ५२५ परियोजनाओं में शमिल है, जबकि सीधे विदेशी नीति के १० प्रतिशत हिस्सेदारी के माध्यम से चीन ४७८ परियोजनाओं में संलग्न है। इस साल निवेश के आँकडे बडÞे ही दिलचस्प हैं। नेपाली साल जुलाई में खत्म होगा। पर अब तक भारत के निवेश जहाँ, ४५.५ करोडÞ रुपये का है, वही चीन का निवेश ६१.३० करोडÞ तक पहुँच गया है।
तिब्बत में गियरोंग और नेपाल में स्याप्रु बेसी के बीच की कच्ची पगडंडी को चीन दो करोडÞ डाँलर की लागत से पक्की सडÞक में बदल रहा है। नेपाल और चीन के तिब्बत स्वायत्त शासित क्षेत्र के बीच १४०० कि.मीं लम्बी सीमा है। इस कठिन हिमाली क्षेत्र के दोनों ओर रहनेवाले लोगों के बीच प्रगाढÞ सम्बन्ध व सर्म्पर्क बढÞाने हेतु चीन और नेपाल मिलकर कई नये मार्ग बना रहे हैं, ताकि व्यापार और संस्कार बढÞाने में आसानी हो सके। ल्हासा से तिब्बत के दूसरे बडÞे शहर शिगात्से तक की रेल पटरी को काठमांडू तक बढÞाने की योजना भी है। कुल मिलाकर हिमालय की दीवार को भेदकर चीन अपनी व्यापारिक पैठ दक्षिण एशिया तक बनाना चाहता है।
नेपाल के कतिपय राजनीतिक विश्लेषक यह मानते हैं कि हिमालय अब चीन और नेपाल के बीच कोई रुकावट नहीं रह गया है, किसी जमाने में नेहरु और चाउ एन लाई के बीच एक अघोषित सम्झौता माना जाता था कि नेपाल हिमालय के दक्षिण में है, इसलिए भारत के प्रभाव क्षेत्र में रहेगा, पर अब नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से चीन की दिलचस्पी बढÞ गई है। भारत अब चीन की सक्रियता पर अपनी पैनी नजर गडÞाए हुए है, कयोंकि अब वह नेपाल को मात्र अपना प्रभाववाला देश नहीं मानता है। चीन राजनीतिक दलों से भी अपने सर्म्पर्क बनाए हुए है, उसकी दिलचस्पी वीजिंग ओलम्पिक के दौरान नेपाल में तिब्बतियों के पर््रदशनों के कारण विशेष रुप से बढÞ गई है। यह दिलचस्पी अब थोडÞे दिनों के लिए नहीं, अपितु अगले २५-३० सालों तक कायम रह सकती है। त्र

