आखिर क्या हुआ आधी रात को !!
पंकज दास:अख्तियार दुरूपयोग अनुसंधान आयोग के प्रमुख आयुक्त के पद पर लोकमान सिंह कार्की की नियुक्ति शुरू से ही विवादों से घिरी रही। जिस दिन से चार दलों के उच्च स्तरीय राजनीतिक समिति में कार्की के नाम का प्रस्ताव किया गया उसी दिन से यह प्रकरण विवादों से घिर गया। इस पूरे मामले में राजनीतिक दल, नागरिक समाज और मीडिया दो धडÞों में बंट गया था। एक वो जो लोकमान सिंह कार्की का र्समर्थन करते नजर आए तो एक धडÞे में विरोध में सडÞक जाम से लेकर बन्द तक की घोषणा की। लेकिन तमाम विरोधों के बावजूद आखिरकार लोकमान सिंह कार्की के नाम पर पहले संवैधानिक परिषद और बाद में राष्ट्रपति ने भी मुहर लगा दी। लेकिन उच्च स्तरीय समिति की तरफ से सिफारिश से लेकर संवैधानिक परिषद् के द्वारा उनकी नियुक्ति और राष्ट्रपति के द्वारा उसपर अपनी मुहर लगाने से लेकर प्रधान न्यायाधीश के द्वारा शपथ दिलाए जाने तक यह मामला विवादों और अनिश्चितताओं से भरा रहा। यह पूरी घटना नाटकीय रही। नाटकीय ढंग से कार्की का नाम उच्च स्तरीय समिति में प्रस्तावित किया गया। नाटकीय तरीके से ही उसका र्समर्थन हुआ। नाटकीय ढंग से ही उसका विरोध भी किया गया। नाटकीय अंदाज में संवैधानिक परिषद् ने कार्की के नाम की सिफारिश की और नाटकीय तरीके से ही राष्ट्रपति ने उस पर अपनी मुहर लगा दी।

उच्च स्तरीय राजनीतिक समिति में आर्श्चर्यजनक तरीके से कार्की के नाम का प्रस्ताव किया गया। इस समिति में शामिल एकीकृत माओवादी, नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले और मधेशी मोर्चा के नेता अब तक इस बात का खुलासा नहीं कर पाए हैं कि आखिर कार्की का नाम किसने और क्यों प्रस्तावित किया। इस संबंध में सभी दलों की अपनी-अपनी धारणाएं हैं और सभी इसके लिए एक दूसरे पर आरोप लगाते नजर आए। जैसे-जैसे कार्की के नाम का विरोध होने लगा वैसे वैसे यह आरोप का सिलसिला और अधिक तेज होता गया। माओवादी ने कांग्रेस एमाले पर तो कांग्रेस एमाले ने माओवादी और मधेशी मोर्चा पर कार्की के नाम का प्रस्ताव करने का आरोप लगाया है। जब कार्की के नाम पर एमाले की पार्टर्ीीे भीतर से ही विरोध के स्वर उठने लगे तो एमाले ने पलटी मारी और अपने ही नेताओं के द्वारा किए गए समझौते पर किए गए हस्ताक्षर का विरोध करने का स्वर कुछ इस तरह उठा कि एमाले की स्थाई समिति और पोलिटब्यूरो तक में कार्की के नाम को वापस लेने की मांग की गई। अब यह तो एमालेके नेता ही बता पाएंगे कि इसके पीछे वाकई में उनकी मंशा क्या थी –
एमाले के भीतर चली विरोध की आंच की तपीश से कांग्रेस भी नहीं बच पाई। कांग्रेस के भीतर से भी कार्की के खिलाफ आवाज उठने लगी थी। पार्टर्ीीे आला नेताओं की किरकिरी होते देख सभापति सुशील कोइराला को मानना पडÞा कि हां उनसे गलती हर्ुइ है। हालांकि उन्होंने कार्की के शपथ लेने के बाद इस पर और अधिक विवाद नहीं करने की अपील भी की। उधर नागरिक समाज और मीडिया के एक बडÞे तबके द्वारा कार्की के खिलाफ लगातार विरोध पर््रदर्शन होता देख एकीकृत माओवादी के अध्यक्ष प्रचण्ड भी अपने आपको दोषमुक्त बताने में पीछे नहीं रहे। प्रचण्ड ने कार्की का विरोध करने वाले एमाले और कांग्रेस की पोल खोल कर रख दी। प्रचण्ड ने ही इस बात का सबसे पहले खुलासा किया कि कार्की के नाम का प्रस्ताव एमाले की तरफ से ही आया था और कांग्रेस ने उसका र्समर्थन किया। हालांकि प्रचण्ड के इस बयान का एमाले और कांग्रेस के शर्ीष्ा नेताओं ने खण्डन करते हुए माओवादी पर कार्की के नाम का प्रस्ताव करने और मधेशी मोर्चा पर उसका र्समर्थन करने का आरोप लगाया। लेकिन ये सब बातें जनता को गुमराह करने के लिए की जाती रही। दरअसल कार्की की नियुक्ति के समय इन सभी दलों की भूमिका को देखते हुए बाद में यह स्पष्ट हो गया कि कार्की की नियुक्ति में सभी शर्ीष्ा नेताओं की भूमिका एक जैसी ही थी। यानी सभी की सहमति से ही कार्की को यह जिम्मेवारी दी गई।
लोकमान सिंह कार्की को लेकर अदालत में अर्जी दी गई थी। लेकिन उस समय उनके नाम की सिफारिश सिर्फउच्च स्तरीय राजनीतिक समिति के द्वारा ही की गई थी। अदालत में जिस दिन कार्की के बारे में फैसला आना था, उस दिन भी अजीब वाकया हुआ। इस मामले की सुनवाई करते हुए न्यायाधीश गिरिशचन्द्र लाल ने ऊपर का प्रेसर कहते हुए आज ही हर हाल में फैसले की बात बताई। फैसला कार्की के पक्ष में ही आया। हालांकि अदालत ने यह कहते हुए मामले को रफा दफा कर दिया कि यह मामला अभी तक सिर्फविचारणीय है और इसका कोई भी संवैधानिक और कानूनी आधार नहीं था। क्यों कि उच्च स्तरीय राजनीतिक समिति के द्वारा सिफारिश को कानून के अधीन नहीं माना जा सकता है। इस क्लीन चिट के बावजूद अदालत ने संविधान की परिभाषा के तहत ही अख्तियार के प्रमुख की नियुक्ति करने का अपना सुझाव अवश्य दे दिया।
एक तरफ अदालत का यह फैसला आना और दूसरी तरह इसके खिलाफ विरोध के स्वर का बढÞते जाना। इसके विरोध में नागरिक समाज और नेकपा माओवादी सहित का ३३ दल भी था। इतना ही नहीं जिन पार्टियों ने कार्की को अख्तियार का प्रमुख बनाने की हामी भरी थी, उनके भातृ संगठन भी सडÞकों पर थे। दलों के साथ साथ सरकार पर भी कार्की को अख्तियार का प्रमुख नहीं बनाने के लिए लगातार दबाब दिया जा रहा था। उधर चार प्रमुख पार्टियां सरकार पर कार्की की जल्द नियुक्ति के लिए दबाब डÞाल रही थी। मामले को और अधिक तूल पकडÞता देख अन्तरिम सरकार के प्रमुख खिलराज रेग्मी ने आनन-फानन में संवैधानिक परिषद की बैठक बुला ली। एमाले का आरोप है कि जिस दिन मंत्रिपरिषद के अध्यक्ष रेग्मी ने संवैधानिक परिषद की बैठक बुलाई उस दिन भी हमने सरकार पर कार्की को नियुक्त ना करने और उच्च स्तरीय संयंत्र की बैठक बुलाकर इस पर पुनर्विचार किए जाने का आग्रह किया था। लेकिन एमाले का यह बयान गले से नीचे नहीं उतरा क्योंकि उनके नेता एक तरफ कार्की का विरोध कर रहे थे और दूसरी ओर कार्की की नियुक्ति के लिए भीतर ही भीतर अपनी भूमिका भी निर्वाह कर रहे थे। कार्की को संवैधानिक समिति की बैठक से सिफारिश करने का फैसला किया गया। इस बैठक के दौरान भी यह खबर बाहर आई कि सरकार के एक मंत्री इस फैसले से नाराज हैं और उन्होंने इस्तीफे तक की धमकी दी है। ऐसे ही कार्यवाहक प्रधान न्यायाधीश दामोदर शर्मा की भी असहमति की खबर आई थी। लेकिन रेग्मी ने सभी विरोधों को चीरते हुए संवैधानिक परिषद से कार्की के पक्ष में फैसला सुना दिया।
संवैधानिक परिषद् के इस फैसले के बाद अब सबकी निगाहें राष्ट्रपति की ओर घुमी। नागरिक समाज का विरोध लगातार बढÞता जा रहा था। नेकपा माओवादी सहित ३३ दल इसके विरोध में पर््रदर्शन कर रहे थे। मीडिया इसके खिलाफ थी। सभी तरफ से राष्ट्रपति को यह संदेश भेजा गया कि कार्की की नियुक्ति ना करें। उधर एमाले के नेताओं ने भी राष्ट्रपति से मिलकर अपनी पार्टर्ीीे ताजा फैसले से अवगत करा दिया। कई लोगों को यह लग रहा था कि राष्ट्रपति शायद सरकार की बात ना मानें। और सरकार को पुनर्विचार के लिए लौटा दंे। दो दिनों तक राष्ट्रपति ने संवैधानिक परिषद के फैसले को लटकाए रखा। इसी बीच विरोध में चक्का जाम बन्द घेराव सभी हुए। नागरिक समाज और ३३ दल आन्दोलित ही हो गए। सभी ने बारी-बारी से राष्ट्रपति से मुलाकात कर कार्की को नियुक्त ना करने का आग्रह किया। राष्ट्रपति ने सभी को आश्वासन दिया कि वो जनभावना के विपरीत कोई भी कदम नहीं उठाएंगे। ऐसा लग रहा था कि कटुवाल प्रकरण की एक बार फिर से पुनरावृत्ति होगी। इसी बीच कार्यकारी अधिकार सहित सरकार चलाने की राष्ट्रपति की मंशा भी शायद इसी प्रकरण से पूरा होने का अर्थ भी लगाया जा रहा था। जिस दिन सभी ने राष्ट्रपति से मिलकर कार्की को अख्तियार प्रमुख नहीं बनाने का आग्रह किया था उसी मध्यरात को राष्ट्रपति ने कार्की की नियुक्ति संबंधी अपनी फाईल पर मुहर लगा दी और अगली सुबह शपथ भी दिला दी। सभी को आर्श्चर्य लगा कि आखिर रात भर में ऐसा कौन सा जादू चल गया कि राष्ट्रपति को कार्की की नियुक्ति करने की मजबूरी हो गई।
दरअसल जिस शाम को ऐसा लग रहा था कि राष्ट्रपति इस फाईल को स्वीकृत नहीं करेंगे। उसी शाम को सरकार के प्रमुख खिलराज रेग्मी ने राष्ट्रपति से मुलाकात की और उन्हें दो टूक बता दिया कि उनके पास कार्की की नियुक्ति के अलावा कोई विकल्प नहीं है। जब राष्ट्रपति ने कार्की की नियुक्ति पर संविधान और कानून की बाधा के बारे में जानना चाहा तो रेग्मी ने इस बार भी राष्ट्रपति से कहा कि इस बात की वो चिन्ता ना करें क्योंकि संवैधानिक परिषद के अध्यक्ष की हैसियत से वो खुद एक प्रधानन्यायाधीश हैं और परिषद के सदस्य भी कार्यवाहक प्रधान न्यायाधीश ही हैं इसलिए कानून और संविधान की चिन्ता वो ना करें। पहली बार ऐसा लग रहा था कि रेग्मी देश के राष्ट्रपति से सीधे सीधे आदेश दे रहे थे और उन्हें बता रहे थे कि उनका दायरा क्या है। रेग्मी बार बार यह कहना नहीं भूल रहे थे कि उनकी सरकार का गठन चार दलों की सहमति से हुआ है और कार्की के नाम की सिफारिश भी उन्हीं चार दलों के द्वारा की गई है। राष्ट्रपति भवन से बाहर निकलने के बाद भी रेग्मी को लग रहा था कि शायद राष्ट्रपति नहीं मानेंगे। उधर राष्ट्रपति भी इस संबंध में चार दलों के प्रमुख नेताओं से अलग अलग विचार विमर्श कर मामले को और अधिक खींचना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने चार दलों के शर्ीष्ा नेताओं को मिलने के लिए राष्ट्रपति भवन बुलाया था। खनाल जो कि कार्की की नियुक्ति का विरोध कर रहे थे उन्होंने राष्ट्रपति डा. यादव से मुलाकात भी की। लेकिन सुशील कोइराला, प्रचण्ड और बिजय कुमार गच्छदार ने राष्ट्रपति से मिलने तक से इंकार कर दिया। प्रचण्ड ने साफ कहा कि कार्की की नियुक्ति पर वो कोई बात नहीं करना चाहते हैं। गच्छदार की भी कमोबेस यही धारणा थी। कोइराला ने खुद को बाहर रहने का बहाना बनाकर राष्ट्रपति से मिलने से भी इंकार कर दिया। तब जाकर राष्ट्रपति डा. यादव को लग गया कि इस मामले को अधिक खींचने से उनकी ही फजीहत होने वाली है। इसी बीच उसी शाम को खिलराज रेग्मी ने चार दलों के शर्ीष्ा नेताओं को बालुवाटार में डिनर पर बुलाया और राष्ट्रपति की मंशा से उन्हें अवगत करा दिया। बालुवाटार से ही दलों के नेताओं ने राष्ट्रपति को सुझाव दिया कि उनके पास कार्की की नियुक्ति के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। वो जितनी जल्दी उस फाईल पर अपना हस्ताक्षर कर देंगे उतनी ही जल्दी मामला शान्त किया जा सकता है। चार दलों के नेताओं के सामने राष्ट्रपति की एक भी ना चली। इन्हीं सब घटना के बीच राष्ट्रपति ने अपने सलाहकार को बुलाया और कहा कि वो इस समय बिलकुल अकेला महसूस कर रहे हैं। उनका साथ देने वाला कोई नहीं है। उस दिन देर शाम तक राष्ट्रपति भवन के कर्मचारी वहीं पर रुके थे। चार दलों के नेताओं से टेलीफोन पर हर्ुइ बातचीत के बाद राष्ट्रपति ने तय कर लिया कि वो कार्की की फाइल पर हस्ताक्षर कर देंगे। देर रात ग्यारह बजे उन्होंने उस पर हस्ताक्षर कर दिया और करीब मध्य रात को १२ बजे उन्होंने राष्ट्रपति कार्यालय के सचिव को फोन कर अगले दिन सुबह ९ बजे लोकमान सिंह कार्की को अख्तियार के प्रमुख आयुक्त के तौर पर शपथ ग्रहण की तैयारी करने का निर्देश दिया। मध्यरात में ही सचिव ने भी अपने मातहत के सभी अधिकारियों को इस बात की जानकारी दी। कार्की को सुबह ७ बजे इस बात की जानकारी दे दी गई। सुबह ९ बजे शपथ ग्रहण की तैयारी भी की गई। लेकिन शीतल निवास के बाहर विरोध पर््रदर्शन की वजह से प्रधान न्यायाधीश को आने में देरी हो गई। इस खबर के फैलते ही विरोध के स्वर और तीव्र हो गए थे। राष्ट्रपति भवन के आसपास बडे पैमाने पर सुरक्षा बलों को तैनात किया गया। और भारी सुरक्षा बन्दोबस्त के बीच कार्की को कार्यवाहक प्रधान न्यायाधीश दामोदर शर्मा ने शपथ दिलाई।
अब जबकि उनकी नियुक्ति हो गई है जनता का गुस्सा शान्त करने के लिए इनको नियुक्त करने वाले राजनीतिक दल अपनी-अपनी सफाई देते नजर आ रहे हैं। प्रचण्ड कहते हैं कि संविधान सभा के निर्वाचन के बाद उन्हें हटाया जा सकता है। सुशील कोइराला ने कार्की की नियुक्ति कर पार्टर्ीीे द्वारा भारी भूल होने की बात कबूल की है। झलनाथ खनाल इसमें भी विदेशी हस्तक्षेप देखने लगे हैं। यानी चुनाव से पहले सभी इस मामले से खुद को अलग करने या इसके दाग धोने की कोशिश में जुट गए हैं। त्र

