बेरोजगार हैं – पार्टी खोलिए
मुकुन्द आचार्य:लोग बेकार बेरोजगारी का रोना रोते हैं। आंकडेÞ तो कुछ भी बताते रहते हैं। लोगों को दहला देते हैं- बेरोजगारी इतनी बढÞी, उतनी बढÞी कह कह कर। ये सब बेकार की बातें हैं।
वैसे भी हर काम का एक खास मौसम होता है। अपने ही देश में, चुनाव का कितना सुहाना मौसम आया है। क्या आप को नजर नहीं आता – देश के तमाम बेरोजगारों के लिए यह चुनाव का मौसम काफी फायदेमन्द साबित हो सकता है। चुनाव की दरिया में अपनी नाव को बहने दीजिए और देखिए बेरोजगारी कैसे दुम दबा कर भाग खडÞी होती है। लोहा गरम हे, हथौडÞा मारें। नहीं समझे – अरे यार, एक पार्टर्ीीोल लीजिए और ऐश कीजिए !
शायद मेरी बातों पर आप को यकीन न आ रहा हो। एक बार मेरी बात मान लें तो आप के भी वारे न्यारे हो सकते हैं। कुछ महीनों के अन्दर इस बेचारे गरीब देश में एक अदद भव्य और भयानक चुनाव होने जा रहा है। इसके चर्चे और खर्चे के बारे में आपने भी जरूर बहुत कुछ सुना होगा। बहती गंगा में आप भी नंगे उतर जाईए ! गंगा मैया अगर डांटेगी- ओय ! तू नंगा नहा रहा है – तुझे शरम नहीं आती – तो आप उनके मुंह पर करारा जवाब दे सकते हैं- मैं गरीब हूं, इसलिए नंगा हूं, नंगा हूं इसलिए नहा रहा हूं। मैं भी धन्ना सेठ होता तो गंगा जी में ‘स्नान’ करता, अपना पाप धोता ! मैं गरीब हूं न इसलिए सिर्फदेह की मैल छुडÞा रहा हूं। तुम्हें प्रदूषित तो नहीं कर रहा।
खैर, चुनाव दरवाजे पर आ कर दस्तक दे रहा हैं। आप बेखबर सो रहे हैं। गफलत की ऐसी नींद भी किस काम की ! आपके आसपास जितने भी बेकार, नाकारा, धर्ूत बर्ेइमान, दो नम्बरी अपराधी, गुंडे मवाली और इसी तरह के अन्य सज्जन हों-सबों के लिए एक बहुत बडÞा सुनहरा अवसर बन कर चुनाव आया है। दोनों हाथों से इस अवसर का लाभ लूटिए। चिडिÞया खेत चुग ले तो वाद में पछताने से क्या फायदा ! यह मौका जो हाथ से फिसल गया तो आप गाते रह जाएंगे- कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे !
तो इसके लिए हमें क्या करना होगा – आप यही पुछ रहे हैं न – अरे भोलाराम जी, आपको इसके लिए समझिए खास कुछ नहीं करना है। हर्रर्ेेफटकिरी कुछ नहीं लगेगा, फिर भी रंग चोखा आएगा ! जैसे-तैसे किसी उपाय से लोगों को बहला फुसला कर निर्वाचन आयोग में एक पार्टर्ीीर्ता -रिजष्र्टड) करवा लीजिए। बस, उसके बाद पांव पसार कर, मूंछ ऐंठते, लोगों को डांटते, डपटते, चैन की वंशी बजाते, जिन्दगी के मजे मारिए। ऊपर से शेखी बघारिए- मैं तो चुनाव लडÞ कर देश की सेवा करना चाहता हूँ। मगर कुछ असामाजिक तत्त्व मेरे पैर खींच रहे हैं। फिर ‘शोले’ के अंदाज में दहाडिÞए- कुत्ते तेरा खून पी जाउंगा। एक-एक को चुन-चुन कर मारुंगा। वगैरह-वगैरह।
मुझे पता है, आप फिर बेवकूफों की तरह एक घटिया प्रश्न पूछना चाहेंगे तो लोग कहां से लावें, पार्टर्ीीोलने के लिए – यह कौनसी बडÞी बात है। राजनीति में युगों से आजमाया हुआ इसका सहज सरल नुस्खा है- परिवारवाद !
अब मत पूछना कि परिवारवाद क्या है ! फिर भी आप का सामान्य ज्ञान बढÞाने के लिए बता ही दूं। विश्व के अनेक देशों में राजनीति को अपनी पुश्तैनी जमींदारी बनाने की होडÞ सी लगी रहती है। एक ही बाप के तीन लडÞके मातृका बाबू, विश्वेश्वर बाबू और गिरिजा बाबू ये तीनों बारी-बारी से देश के प्रधानमन्त्री बन चुके हैं। सुजाता कोइराला, शशांक कोइराला ये भी राजनीति के अखाडÞे में जोर आजमाईश कर रहे हें। खानदानी राजाओं का दौर नेपाल में शदियों बाद अभी-अभी समाप्त हुआ है। विश्व के अनेक देशों में यह परिवारवाद मजे से फल-फूल रहा है।
आप भी जब देश सेवा के लिए चल ही पडÞे हैं तो अपनी पार्टर्ीीें जान फूंकने के लिए सडÞको में टायर फूंकिए, कुछ गाडिÞयों को फूंक डालिए, किसी भी बहाने से देश में बन्द का आहृवान कीजिए। लोग आपकी गुंडागर्दी से डरेंगे और बाजार-यातायात-स्कूल-काँलेज बन्द करेंगे तो आप सीना तान कर कहें- मुझे जनता का कितना बडÞा र्समर्थन प्राप्त है। मैं कितना बडÞा नेता हूँ ! वाह री मेरी पार्टर्ीीौर वाह रे मैं।
ठहरिए ! ठहरिए ! नेतागीरी और गुंडागीरी में ज्यादा उतावलापन ठीक नहीं होता। सबसे पहले तो आप खुद पार्टर्ीीध्यक्ष बन जाईए। फिर घरवाली को कोषाध्यक्ष, बेटे को पार्टर्ीीहासचिव, बेटी को पार्टर्ीी्रवक्ता, दामाद को पार्टर्ीीें उपाध्यक्ष, साली को अपना खास सचिव बनाईए। साला हो तो उसे दो-चार जिलों का अध्यक्ष बना डÞालिए। तब आप की पार्टर्ीीलेगी नहीं दौडेÞगी। सत्ता की ओर सरपट भागेगी।
बांकी रिस्ते में जितने बचे हैं, सभी को जिलास्तरीय, ग्राम स्तरीय, संगठनों में घुसा दीजिए। राजनीति इसी तरह चलती है। नहीं तो सत्ता और सम्पत्ति के लिए बेटे औरंगजेब ने बाप शाहजहां को कैदखाने में डÞाल दिया था। याद है न – सुनते है, जंग बहादुर ने कर्ुर्सर्ीीे लिए अपने मामू जान को मार डÞाला था। इसीलिए सारी पार्टर्ीीे अहं पदों पर अपने ही लोगों को तैनात रखिए। अपने ही लोगों के हाथों मरना पडÞे तो बडÞा मजा आता है। दिल को सकून मिलता है- चलो गैर के हाथों तो नहीं मरे !
एक बार पार्टर्ीीुनाव आयोग में रजिष्र्टड हो जाय तो समझिए आपकी दशों अंगुलियां घी में और सर कडÞाही में। और पार्टर्ीीा रुआब बरकरार रखने के लिए वक्त वेवक्त बेवजह देश की किसी गली चौराहे को चक्का जाम ‘बन्द’ ऐसा कुछ घोषित कर दें। लोगों का जीना हराम कर दीजिए। देखिए, बच्चे स्कूल जाने न पाएं, कोई गाडÞी न चलावे कोई दूकान न खोले, खबरदार मजदूर के घर में चूल्हा न जलने पावे- ऐसा सुहाना मौसम समय-समय पर आप की पार्टर्ीीजनता को उपहार में दे सके तो आप रातोंरात राजनीति के आसमान में भेपर लाइट की तरह चमकने लगेंगे। लोगों के दिल में दहशत पैदा करने के लिए बन्द के दौरान कुछ गाडियों के शीशे फोडÞ दीजिए, कबाडÞ से पुराने टायर खरीद कर सडकों के सीने पर फूंक डालिए। कोई इस दौरान दूकान खोलने की हिमाकत कर बैठे तो पार्टर्ीीे कुछ चुनिंदे गुंडो को इशारा कर दीजिए। वे दूकान लूट लेंगे और चलते-चलते दूकान को प+mूक भी देंगे। न रहेगा बांस, ना बजेगी बांसुरी।
खुदानखास्ता आपकी पार्टर्ीीो चुनाव में दो चार सिटें मिल गई तो फिर आप के क्या कहने। हमारे देश में हर दो चार महीने में सरकार बदलती रहती है। संयुक्त सरकार में आपकी पार्टर्ीीो भी घुसने का मौका मिल जए तो आप मन्त्री होने के सपने को साकार कर सकते हैं। इसे कहते हैं, राजनीति में पोलिटिक्स, आई बात समझ में –
इसलिए चुनावी मौसम में हर कोई हो सके तो अपनी पार्टर्ीीोले ना हो तो किसी की पार्टर्ीीें घुस जाए। अपना शारीरिक और आर्थिक स्वास्थ्य सुधार ले।
अरे अब भी आप टुकुर-टुकुर देख रहे है – राम-राम कहिए और पार्टर्ीीोलने में जुट जाईए। अभी देखते रहेंगे तो जिन्दगी भर देखते रह जायेंगे। त्र


