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असली गणतंत्र तो अभी बाकी है :डॉ. श्रीगोपाल नारसन

 

हिमालिनी, अंक फरवरी 2021 । भारतीय संविधान लागू होने की वर्षगांठ को भले ही हम हर्षोल्लास के साथ मना रहे हो । लेकिन यह भी सच है कि भारतीय संविधान की मूल भावना के अनुरूप अभी देश नही बन पाया है । सच कहा जाए तो असली गणतंत्र आना अभी बाकी है । हालांकि हमारा संविधान जाति धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नही करता, लेकिन देश मे शिक्षा से लेकर राजनीति तक कोई भी काम बिना जाति और धर्म के नही होता । नवजात शिशु के जन्म प्रमाण पत्र बनवाने के लिए किए जाने वाले आवेदन तक मे जाति और धर्म का उल्लेख करना पड़ता है । विद्यालय में प्रवेश के लिए भी जाति और धर्म बताना जरूरी है । दरअसल राजनीति से जुड़े लोगो के हाथ मे सत्ता की चाबी आते ही सत्ता में बने रहने के लिए भारतीय संविधान को उसकी मूल भावना से परे जाकर संविधान को अपने अपने स्वार्थ से अलग अलग रूप में परिभाषित करने का प्रयास किया गया है । इसीलिए भारतीय संविधान में एक सौ से अधिक बार संशोधन हो गए है । भारतीय संविधान की वर्षगांठ पर यह विचार करना आवश्यक है कि दुनिया के सबसे बड़े इस लोकतांत्रिक राष्ट्र भारत में क्या सही मायनों में स्वस्थ लोकतंत्र कायम है । आज भी गण का तंत्र होने पर भी गण ही अपने अधिकार से वंचित हो गए है । भारतीय संविधान लागू होने के बाद देश की जनता को लगा था कि अब उनका शासन उनके द्वारा ही किया जाएगा । लेकिन कुछ चुनिंदा पूंजीपतियो की जेब का खिलौना बने राजनीतिक दलों ने आमजनता को व उनके अधिकारों को दरकिनार कर पूंजीपतियों के सहारे देश में सत्ता प्राप्त करने की ऐसी चाल चली कि गणतन्त्र बेचारा धराशाही होकर रह गया । विधायको और सांसदो की कथित खरीद (फरोख्त व किसान–मजदूरों के हितों पर होते कुठाराघात ने देश के गणतंत्र को कमजोर करके रख दिया है ।

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भारतीय गणतन्त्र को इस तरह धराशाही करने की कोशिश की जाएगी, यह किसी ने सोचा तक नही था । तभी तो इस गणतन्त्र में क्या वास्तव में आमजनता को उनका अपना वास्तविक तन्त्र मिल पाया ? इस विषय पर चिंतन होना चाहिए । भारतीय संविधान की मूल भावना पर गौर करे तो क्या जनता पर जनता के द्वारा शासन का सपना वास्तव में चरितार्थ हो पाया ? सन १९छण् में भारतीय संविधान भले ही देश में लागू हो गया हो । भले ही देश के प्रत्येक नागरिक को भारतीय संविधान में समानता का अधिकार देने की व्यवस्था की गई हो,लेकिन गणतन्त्र लागू होने के सात दशक से अधिक बीतने पर भी देश मे नाम मात्र के लोगो का ही गणतन्त्र बन पाया है । देश मे सत्ता वे लोग ही हासिल कर रहे है,जो धन बल से परिपूर्ण है । बेचारे आम लोग तो आजादी के बाद से आज तक धन बल वालो के ही मोहताज बने हुए है ।

यही कारण है कि आम लोग जब असहनीय रूप से शोषित और पीडि़त हो जाते है तो वे अपने अधिकारों के लिए सडकों पर आकर आंदोलन करने को मजबूर होते है । जैसे इस बार किसानों को कृषि कानून वापसी की मांग को लेकर सड़को पर उतरना पड़ा । जिन्हें लाठी डंडे से दबाने की भरपूर कोशिश की गई । वह तो भला हो सर्वोच्च न्यायालय का जिसने किसानों के दर्द को समझा और उक्त मनमाने कानून पर रोक लगा दी । लेकिन इससे यह तय हो गया है कि अब आम आदमी अपने विरूद्ध होने वाले हर अन्याय का प्रतिवाद करने को तैयार हो गया है । आज हालत यह है कि ग्राम पंचायत से लेकर राष्टृपति पद तक के चुनाव में कोई भी आम आदमी चुनाव लडने का साहस नही जुटा पाता । ग्राम स्तर पर गांव के धनाढय वर्ग से जुड़े लोग चुनाव लड़ते है तो क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत, विधान सभा,लोक सभा चुनाव मे भी आम जनता मे से कोई चुनाव लड़ने का साहस नही जुटा पाता है । । क्योकि लाखो करोड़ो रूपयों के बिना अब कोई भी चुनाव लडना सभंव नही रह गया है ।

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राज्य सभा और विधानपरिषद
तो राजनीतिक दलाें की अपनी बपोती बन गई है । शायद ही किसी गरीब और आम आदमी को इन सदनो मे से किसी का सदस्य बनाया जाता हो, बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ अपने चहेतों को राज्य सभा और विधान परिषदो में भेजकर उपकृत करती रही है । इन सीटों पर वे अपने चहेतों को भेजने के लिए संख्या बल के हिसाब से सीटो का आपसी बटवारा कर लेते है ।

जिससे आम जनता हर बार ठगी जाती है । दरअसल ये सीटे उन खास लोगो के लिए संविधान ने दी थी जो देश और समाज के लिए कुछ विशेष करते है । जिन्हें आज भुला दिया गया । इसी कारण इन संसद व विधान मंडल सदनो मे चुनकर जाने वाले नेता अपने क्षेत्र के प्रति जवाबदेह भी नही रहते । उनकी सांसद और विधायक निधि या तो खर्च ही नही हो पाती या फिर उसका जमकर दुरूपयोग किया जाता है । जो राष्ट्रहित में कदापि नही है । पिछले चुनाव मे एक भी ऐसा प्रत्याशी किसी बडे रानीतिक दल से चुनाव मैदान में नही आया जो गरीब की रेखा से नीचे का हो या फिर आमजनता के बीच का हो और किसी बडी राजनीतिक पार्टी ने उसे टिकट दिया हो । जीवन पर्यंत अपने दल के प्रति वफादार रहने वाले भी इसी कारण टिकट से वंचित रह जाते है क्योकि उनके पास धन बल नही होता । जबकि धनबल के सहारे दलबदल कर स्वार्थी नेता हर दल से टिकट पाने मे सफल हो जाते है और करोडो खर्च करके चुनाव जीतकर चुनाव में जो खर्च किया उसे बटोरने में लग जाते है । । ऐसे में वे आम जनता की सेवा कैसे कर पायगे ? चुनाव के दौरान प्रभावित क्षेत्रो से करोड़ो रूपये का काला धन पकडा जाना, चुनाव मे बेताहशा खर्च होने का प्रबल प्रमाण है ।

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स्वतंत्रता प्राप्ति के ७४ साल बाद भी आम आदमी भूख से मर रहा है,युवा रोजगार को तरस रहा है, किसान आत्महत्या कर रहे है । आज जब जो चाहे सड़क जाम कर मरीजो को अस्पताल जाने से रोक सकता है । आज भी कर्मचारी या अधिकारी चाहे तो गरीब को उसके द्वारा घूस न देने के कारण उसे उसके मौलिक अधिकारों से वंचित कर सकते है । आज भी प्राइवेट स्कूलों व प्राइवेट अस्पतालो मे गरीबो के लिए के लिए प्रवेश दिवास्वप्न के समान है । आज भी गरीबो की भूमि पर भूमाफियाओ के कब्जे की शिकायते होना और उन्हें न्याय न मिल पाना आम बात है ।
ऐसे में कैसे भारतीय संविधान की मूल भावना के अनुरूप सभी को उनका अपना गणतन्त्र सुख मिल पाएगा ? यह विचार मंथन हमे आज के दिन करना चाहिए । कोरोना की लंबी महामारी और किसान आंदोलन ने सन २०२० में अनेक दुःख दिए,कई अपने हमेशा के लिए बिछड़ गए तो आर्थिक तंगी और बढ़ती महंगाई ने मध्यम व निम्न वर्ग के लोगो को खूब रुलाया । सन २०२१ के इस गणतंत्र दिवस से हम उम्मीद कर सकते है कि आमजन के लिए कुछ अच्छा हो । इसके लिए सरकार को राजनीतिक चश्मा उतारकर समान भाव से देश के आमजन के हितों का ख्याल रखना ही गणतंत्र का मूल मंत्र है ।


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

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