प्रशिद्ध प्रकाशक, विद्वान एवं लेखक श्री सुनील भनोट जी नहीं रहे

एस.एस.डोगरा, “आदमी मुसाफिर है ! आता है जाता है ! आते-जाते रस्ते में यादें छोड़ जाता है…. जी निसंदेह यही जीवन का सत्य है। यह सर्वविदित है मानव जीवन में जीवन और मृत्यु का अपना महत्व है और यह शाश्वत सत्य भी है कि जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु भी निश्चित है । लेकिन इस जीवन मृत्यु के दौरान जो भी व्यक्ति अपने इस जीवन काल में कुछ ऐसे कर्म और व्यवहार से लोगों के दिलों में कुछ खास जगह बना जाता है उन्हीं में से एक ऐसे शख्स रहे सुनील भनोट जी। आज सुबह-सुबह उनके करीबी वेद कुमार शर्मा जी के माध्यम से उनके अचानक चले जाने की खबर मने मुझे विचलित कर डाला। सच में विश्वास ही नहीं हो रहा था कि हमारे सुनील जी आज हमारे बीच में नहीं रहे । क्योंकि तीन दिन पहले ही तो मेरी आगामी किताब के पोस्टर-विमोचन आदि सिलसिले पर बात हुई थी। इसीलिए इस दुःखद खबर की पुष्टि के लिए मैंने वेद शर्मा जी, जौली अंकल (प्रसिद्ध लेखक) जी, मुकेश जी व संतोष को फोन पर संपर्क भी किया। सुनील जी के निधन का अभी भी विश्वास नहीं हो रहा।
मैं सुनील जी से पहली बार जौली अंकल जी के माध्यम से मिला था। और पिछले लगभग 3 साल के दौरान सुनील भनोट जी से एक खास रिश्ता कायम हुआ । वे लेखकों-पत्रकारों तथा अपने संपर्क में आए सभी व्यक्तियों को विशेष सम्मान देते थे। चूंकि मैं भी लेखन कार्य से हूं और वे प्रकाशक थे। वे मुझे नियमित तौर पर कुछ न कुछ लेखन कार्य देते रहते थे। मैं जब कभी भी उनके दरिया गंज कार्यालय जाता तो वहां उनके ऑफिस के माहौल को देखता था कि परिवार की तरह सब लोग एक दूसरे को सहयोग करते हुए अपना अपना काम निपटा रहे होते थे।
मैंने पाया कि सुनील जी अपने स्टाफ को सच के अपनी पारिवारिक जिम्मेदारी की तरह समझते थे और कहीं ना कहीं मैं भी उनको अपने भाई की तरह मानता था। उन्हें हम सभी की चिंता रहती थी खुद कितने कष्ट में रहे पहले पत्नी को खो गए उसके बाद उनकी माताजी को।
आज उनके निधन की खबर सुनी सच में दिल को बहुत आघात हुआ और हम सभी उनके मित्र साथी सुनील जी के जाने पर सच में बहुत दुखी एवं असहाय सा महसूस कर रहे हैं।
एक ऐसे शख्स की अनुपस्थिति जो आज भौतिक रूप से हमारे बीच में नहीं हैं लेकिन उनकी मुस्कुराहट उनका व्यवहार उनका संस्कार और अपने जो लेखक मित्र से या स्टाफ से उनके प्रति बड़ा ही दोस्ताना संबंध हर किसी से मुस्कुरा कर बात करना बिल्कुल शांत प्रवृति के धनी थे सुनील जी। हमेशा दूसरों को किस तरह से आरामदायक स्थिति में वे मदद कर सकते हैं हमेशा तैयार रहते थे और मैं सच में ऐसा प्रकाशक मैंने नहीं देखा जो कि ना केवल कुछ लेखकों को बल्कि छोटी उम्र के बच्चों को भी उनकी पुस्तकें प्रकाशित करने के लिए प्रोत्साहित करते रहते थे। सच में सुनील जी ने सभी के दिलों में एक विशेष जगह बनाई। जब भी उनसे मिलना होता था तो सभी का वह विशेष ध्यान रखते थे कि वह दूसरे को किस तरह से आरामदायक स्थिति में वह उनको सपोर्ट कर सकते हैं सहयोग कर सकते हैं इसी प्रवृत्ति ने सुनील जी को आम से खास व्यक्ति बनाया हुआ था । मेरी ही आग्रह पर हिमालिनी पत्रिका समूह से जुड़कर सहयोग भी करते रहे।
लेकिन इस तरह अचानक समय से पहले हमारे बीच में से इस भौतिक दुनिया से चले जाएंगे ऐसे कभी कल्पना भी नहीं की थी। हम उनके उल्लेखनीय योगदान को कभी भुला नहीं पाएंगे और ईश्वर उन्हें अपने चरणों में जगह दे उनके परिवार विशेष तौर पर उनकी बेटी उसको ईशी भनोट को शक्ति प्रदान करें ताकि वो सुनील जी के सुकर्मों को आगे भी जारी रख सके यही कामना करते हैं। अंत में ईश्वर से यही प्रार्थना हैं कि सुनील जी की आत्मा को शांति प्रदान करे। इस दुखद घड़ी में हिमालिनी पत्रिका समूह अपनी ओर से दिवंगत आत्मा को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हैं। ईश्वर-सुनील जी की आत्मा को शांति प्रदान करे।
ऊं शांति ऊं शांति ऊं शांति




