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होती नहीं मुराद पूरी, गम को गले लगाना ही आदत महसूस सी होती : लालिमा

 

 

 

आंख मिचौली
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कलम से नहीं हूं
मैं तो कोई कवि
फिर भी दो चार कलम
चाहत है लिखने की
भावनाओं में घिरना
ये आदत है हमारी
कभी-कभी लगती
दुनियां दारी अजीब सी
जिंदगी तो बहती हुई
‌‌ बस एक धार है नदी की
सलिल की लहरों में कस्ती
‌ देखा मस्ती से बहाते भी
भयंकर तूफान में फिर तो
बदल कर रूप उफनती
नदी की भांति सफर जिंदगी की
बहुरूप रंग बदलती
चाहत बन कर भी तो
होती नहीं मुराद पूरी
गम को गले लगाना ही
आदत महसूस सी होती
कभी अनचाहे दस्तक दे जाती
कुछ सुकूनभरी खुशियां मस्ती
खेल है यह आंख मिचौली
यूं ही धूप छांव मे सांझ ढलेगी।

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लालिमा

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